भारत, राष्ट्रवाद व हिन्दू विरोधी शक्तियों के संरक्षक

वर्ष 2014, भारत के भविष्य निर्धारण का वर्ष रहा है। इसी वर्ष भारत में जहां नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में पहली बार राष्ट्रवादी सरकार बनी, वहीं नरेंद्र मोदी द्वारा भारत की मूलभूत समस्याओं को समूल नष्ट करने के प्रयास के कारण स्थापित तंत्रों, व्यवस्थाओं व बौद्धिकताओं को अपनी केंचुलों को छोड़ अपने अपने मूल चरित्र में जनता के सामने आना पड़ा है।

जैसे जैसे 2014 आगे बढ़ता हुआ 2015, 16, 17, 18 पार करता रहा है वैसे वैसे, भारत में पल रहे व पाले जा रहे भारत विरोधी एवं कांग्रेस द्वारा दशकों से पोषित भ्रष्ट व्यवस्था के तत्वों को अपने अपने मुखौटों को उतार कर, भारत की जनता के सामने सार्वजनिक रूप से नग्न होना पड़ा है।

इस पूरे उपक्रम में इन तत्वों की जहां धर्मनिर्पेक्षता व ईमानदारी की सबसे ज्यादा अर्थी उठी है, वहीं भारत के समाज में दशकों से आदर्श के रूप में स्थापित प्रतीकों का विध्वंस हुआ है।

इसी श्रृंखला में 2019 की शुरुआत में ही भारत में आदर्श के रूप में स्थापित प्रतीक, जो विश्व में भारत का ही एक प्रतीक बन गया है, वह भरभरा कर गिर गया है। मेरे लिए यह घटना व्यक्तिगत रूप से बड़ी पीड़ादायक है।

यह तो सभी जानते है कि भारत, उसकी राष्ट्रवादी सरकार व हिन्दुओं के विरुद्ध विषवमन करने, प्रपोगंडा चलाने व भारत की जनता को फ़र्ज़ी समाचार परोसने वाले तमाम मीडिया व सोशल मीडिया नामों में सिद्धार्थ वर्धराजन का वेब न्यूज़ पोर्टल ‘द वायर’ सबसे शीर्ष पर है।

यह वेब न्यूज़ पोर्टल 2015 में सामने आया था और उस वक्त यही सार्वजनिक हुआ था कि इसको आर्थिक मदद ‘द इंडिपेंडेंट एंड पब्लिक स्पिरिटेड मीडिया फाउंडेशन’ (IPSMF) नाम के ट्रस्ट द्वारा मिली थी। इस फाउंडेशन को जिन लोगों ने उस वक्त प्रमुखता से दान दिया था उनका नाम सार्वजनिक किया गया था और आज भी उनकी वेबसाइट पर सारे नाम लिखे हुए हैं।

इस फाउंडेशन के आज जो वित्तीय दस्तावेज़ सामने आए हैं उससे यह बात सामने आई कि रतन टाटा की ‘टाटा ट्रस्ट फण्ड’ ने वर्ष 2017-18 में इस IPSMF ट्रस्ट को जो राष्ट्र विरोधी ‘द वायर’ का आर्थिक स्रोत है, को 1 करोड़ 16 लाख रुपये दिए हैं।

यह तथ्य यही बतला रहा है कि रतन टाटा परोक्ष रूप से ‘द वायर’ के सबसे बड़े आर्थिक संरक्षक हैं। रतन टाटा द्वारा भारत व हिन्दू विरोधी मंच को आर्थिक आधार दे कर यही साबित किया गया है कि रतन टाटा के लिए टाटा नमक को दिया गया ‘देश का नमक’ नारा सिर्फ एक छद्म भारतीयता का नारा है।

यह कितना विस्मयकारी है कि इसी टाटा समूह के जेआरडी टाटा ने टाटा को विश्व में स्थापित कर भारत व उसके मूल्यों को स्थापित किया था, आज उनकी विरासत को संभालने वाले रतन टाटा, जो जेआरडी के कंधों पर चढ़ कर पीठिका पर स्थापित हुये थे, वे आज भारत को ही बेचने वालों को स्थापित करने में योगदान दे रहे हैं।

आज यह बात सच लग रही है कि टाटा की आभा से चमकने वाले रतन टाटा, वास्तविकता में उतने ही काले है जितना कांग्रेस द्वारा पल्लवित किया गया भ्रष्टाचारी व राष्ट्रविरोधी तंत्र है।

रतन टाटा का पहले भी नाम नीरा राडिया टेप, अगस्ता घोटाले में सामने आया था लेकिन भारत की मीडिया व जनता में, टाटा की छवि के कारण कभी भी चर्चा में नकारात्मक रूप से नहीं आया। लेकिन आज यह स्पष्ट है कि रतन टाटा, सोनिया गांधी व कांग्रेस की ही टीम के हैं। वे आज तक टाटा के नाम के पीछे छद्म रूप से छिपे थे लेकिन अब ये मुखौटा भी उतर गया है।

मुझे यह लिखते हुए बेहद कष्ट हो रहा है लेकिन फिर भी लोगों से यही आह्वान करूँगा कि ‘टाटा’ के उत्पादों का बहिष्कार कीजिये। टाटा को रतन टाटा की ज़रूरत हो सकती है लेकिन भारत को टाटा की ज़रूरत नहीं है।

मेरा मानना है कि पूर्व में भारत के लिए किसी ने भी कोई भी सार्थक योगदान दिया हो लेकिन वर्तमान में राष्ट्र व उसकी जनता की भावनाओं से किया गया द्रोह, उसको न किसी भी तरह का संदेह का लाभ और न ही क्षमादान के योग्य बनाता है। मेरे लिए राष्ट्र व धर्म से बड़ा कोई भी नहीं है। जो उसके शत्रुओं के साथ खड़ा है वह मेरा ही शत्रु है।

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