हूवर बांध और मानव श्रम घंटे

अमेरिका के दक्षिणी हिस्से में बहती कोलोराडो/ कोलोरेडो (Colorado) नदी पर सबसे बड़ा बांध हूवर बांध है।

रॉकी माउंटेन्स से शुरू होकर कैलिफोर्निया की खाड़ी में समाने वाली लगभग 2,300 किलोमीटर से भी ज्यादा लंबी कोलोरेडो नदी और उसकी सहायक नदियों पर 100 से ज्यादा छोटे मोटे बांध हैं।

ये कोलोरेडो नदी प्रणाली (river system) के हिस्से हैं, जो दुनिया के सबसे विकसित नदी प्रणालियों में से एक मानी जाती है। इन सब बाँधो में सबसे बड़ा हूवर बांध (Hoover Dam) है।

31वें राष्ट्रपति हर्बर्ट हूवर के कार्यकाल में सन 1931 में शुरू किये गए इस बांध का निर्माण सन् 1936 में रूज़वेल्ट के कार्यकाल में सम्पन्न हुआ। निर्माण के समय ‘बॉल्डर डैम’ नामक इस बांध को सन 1947 में अमेरिकी संसद ने नाम बदलकर हर्बर्ट हूवर के नाम पर ‘हूवर डैम’ किया। (जी हाँ, अमेरिका में भी नाम बदले जाते हैं)

इतनी सारी भूमिका देने की वजह यह भी कि अपने वक़्त में ये दुनिया के सबसे बड़े बांधों में से एक होता था, और ये उन अंतिम बांधों में से एक है जहाँ बड़ी मशीनों के बावजूद भी अच्छी मात्रा में मानव श्रम भी लगा था।

सन 1931 से 1936 तक चले इस निर्माण में लगभग 3000 से ज्यादा लेबर लगी, जो कुछ दिनों में 5200 से ज्यादा भी लगी। अगर आप औसत 4000 मजदूर, 6 साल के लिए 10 घंटे का काम पकड़े, तो 8 करोड़ 76 लाख मानव श्रम घंटे लगे, जिसे हम मोटामोटी 9 Crore man-hours कह सकते हैं। अपने वक़्त में दुनिया का सबसे बड़ा बांध बनाने में 9 करोड़ man-hours लगे थे।

सन 2011 की जनगणना के अनुसार भारत में लगभग 25 करोड़ परिवार (household) थे। 2018 आते आते इनकी संख्या बढ़ी ही होगी। 2014 तक इन 25 में से 10 करोड़ परिवारों के पास गैस कनेक्शन नहीं था।

इन 10 करोड़ परिवारों की औरतें या तो जंगल से लकड़ी बीनने जाया करती थी, नहीं तो गोबर के कंडे बनाती थी। घर की औरत और बेटी अगर रोज़, घर से दूर अपनी सुरक्षा को खतरे में डाल जंगलों से लकड़ी लेने जाए तो बड़े आराम से 2 घंटे लग ही जाते हैं।

इन 10 करोड़ परिवारों (जिनकी संख्या आराम से 11 करोड़ से ऊपर पहुँच गयी है), में से 6 करोड़ गरीब परिवारों को 2016 में शुरू हुई उज्ज्वला योजना में गैस कनेक्शन मिल चुका है। अगला लक्ष्य बाकी के 4 या 5 करोड़ परिवारों को भी इसमें कवर करने का है। पर आज की तारीख में 6 करोड़ परिवारों से लकड़ी का धुंआ गायब हो चुका है।

जी हां, 6 करोड़ परिवार। अगर ये औरतें (हर घर की सिर्फ एक औरत मानते हुए) गैस के बजाय आज भी लकड़ी बीनने या कंडे बनाने में लगी रहती तो डेढ़ घण्टे के हिसाब से भी ‘हर दिन’ के 9 करोड़ घंटे हुए। वे 9 करोड़ घंटे, जिनमें अपने जमाने का सबसे बड़ा बांध बन जाता है।

आपका अगला प्रश्न होगा कि बांध में सिर्फ 4000 आदमी या उनके 9 करोड़ man-hours ही थोड़े लगे थे, बड़ी मशीनें भी थी। वाजिब सवाल है।

ये जो 6 करोड़ औरतें हैं, ये उन परिवारों से हैं जिन्हें सही मायनों में शोषित, वंचित, दलित समाज माना जा सकता है। सुबह के खाने के बाद इनके सामने सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न, शाम को कैसे बनाना है, यही होता है।

ये खाली बैठने पर व्हाट्सएप्प का स्टेटस नहीं डालती, या ‘ससुराल सिमर का’ या ‘बिग बॉस’ नहीं देखती। आज जब इनकी रसोई से धुआं दूर कर इन्हें ये समझ आया है कि इतना वक़्त और है इनके पास।

आज जहां वक़्त हो पाया है, तो कल को इन्हें कुछ हुनर सिखाकर, बड़ी मशीन नहीं तो कुछ छोटा औज़ार देकर परिवार की उन्नति के लिए चार पैसे कमाने को प्रोत्साहित किया जा सकता है। और शायद सरकार उस दिशा में भी काम कर रही है।

दुनिया के सबसे बड़े बाँधो में से एक को बनाने जितना वक़्त अगर एक देश के पास हर रोज़ निकल आये तो करोड़ों लोगों को समृद्ध करने के लिये उनके हाथों को मुफ्तखोरी के विषाणु से मुक्त कर उन्हें हुनर और औजार देकर क्या कुछ नहीं किया जा सकता।

इसी उज्ज्वला योजना के साथ हर गांव हर घर में शौचालय ने करोड़ों औरतों की जिंदगी आसान की है।

बाकी, किसी क्रिकेटर के ‘नारी-विरोधी’ वाक्यों पर उद्वेलित ये देश जो बिशप फ्रैंको के 13 बार रेप किया जाने की खबर या तीन तलाक और हलाला पर चुप्पी साध लेता है, उसे ये भी बताने की ज़रूरत है कि हमारे ‘प्रदेश के सबसे बड़े’ अखबारों के 14वें पन्ने पर आने वाली एक छोटी सी खबर ‘खाने के लिए लकड़ी बीनने गयी औरत से दुष्कर्म’ या ‘शौच के लिए निकली बच्ची से बलात्कार’ वाली खबरें दिनोंदिन कम होती जा रही है।

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