The Accidental Prime Minister : क्यों ज़रूरी है यह फिल्म देखना

हाल ही में कहा था कि इस देश के दो सबसे बड़े अपराधी ‘दुर्घटनावश हिंदू’ जवाहरलाल और ‘दुर्घटनावश प्रधानमंत्री’ रहे मौनमोहन सिंह रहे। आज उसमें सुधार कर मौनमोहन को ‘सर्वाधिक घातक’ लिखना है, पर पहले फिल्म The Accidental Prime Minister की बात….

यह फिल्म देखनी ज़रूरी है। क्यों? यदि वेबसाइट्स की भाषा में कहें तो पांच सबसे बड़े ये कारण हैं –

  • हमारे भारत में कायदे से तो विभाजन पर फिल्में नहीं बनी हैं, फिर राजनीतिक फिल्मों की बात ही क्या करना? यह फिल्म बेलागलपेट अपनी बात कहती है और यह बड़ी बात है। जो लोग या मिलेनियल किड्स House of Cards जैसे सीरियल या फिर प्रेसिडेंशियल इलेक्शन जैसी हॉलीवुड की फिल्में देखकर इसको देखने जाएंगे, वे निराश होंगे। हालांकि, 80 के दशक में फरिश्ते और जीने नहीं दूंगा जैसी फिल्में देखकर बड़े हुए हमारे जैसे लोग जरूर मानेंगे कि भारतीय फिल्मों की यात्रा लंबी दूरी की हो चुकी है।
  • इस फिल्म को इसलिए भी देखिए कि यह देखते हुए आपको उद्वेलित करती है, आपको सवाल पूछने को बाध्य करती है, आप तनिक भी संवेदनशील हैं तो आप इस फिल्म के साथ बहेंगे ज़रूर। यह फिल्म राजनीति की कमीनगी और देश को बेचने को तैयार राजनेताओं को पूरी नंगई में दिखाती है, इसलिए भी देखिए।
  • फिल्म को इसलिए देखिए कि आपकी याददाश्त बहुत कमज़ोर है। पांच साल नहीं हुए हैं, लेकिन आप The Lethal Prime Minister के 10 वर्ष भूल गए हैं, आप भूल गए हैं कि इतालवी महिला के हाथों देश को गिरवी रख, एक महाविद्वान डॉक्टर केवल अपनी कुर्सी बचाता रहा, हस्ताक्षर करता रहा और आखिरकार एक मंदबुद्धि को अपनी विरासत सौंपकर चला गया।

आप भूल गए हैं कि वामपंथियों ने किस तरह इस देश को अपनी जागीर बना रखा था, आप भूल गए हैं कि लाखों करोड़ों के घोटाले आपको चौंकाए नहीं, ऐसी बेमिसाल व्यवस्था किसने दी थी, आप भूल गए हैं कि नीरा राडिया नाम की दलाल ने बरखा दत्त, वीर सांघवी, राजदीप सरदेसाई जैसे अगणित दलालों के चेहरों से नकाब नोच दिया था, जो आज भी नैतिकता और पत्रकारिता की दुकान चला रहे हैं।

आप भूल गए हैं कि यूपीए के दस साल में समाज का कोई कोना ऐसा नहीं बचा जिसे भ्रष्टाचार की घुन ने, दलाली की दीमक ने खा नहीं लिया था और आप जिससे बुरी तरह पामाल होकर काँग्रेस को 44 सीटों पर ले आये थे। ये सारी बातें आपको फिर से याद आएं, इसलिए यह फिल्म देखिए, इसीलिए यह फिल्म सफल है।

  • और, यह फिल्म इसलिए देखिए कि महाधूर्त वामपंथी और महाकुकर्मी काँग्रेसी इस फिल्म का विरोध कर रहे हैं। आप जानते हैं न, कि ये दोनों प्रजाति जिस चीज या व्यक्ति का विरोध करें, वह हमारे लिए सही है।
  • इस फिल्म को इसलिए भी देखिए कि कल बुधवार की रात के शो में भी जनता अच्छी तादाद में मौजूद थी, भले ही व्यभिचारी वामपंथी इस फिल्म को कोई स्टार नहीं दे रहे, भले ही कुकर्मी काँग्रेसी इसके परदे फाड़ रहे और भले ही इस फिल्म को अंडरप्ले किया जा रहा, लेकिन जनता इसके साथ है।
  • इस फिल्म को इसलिए भी देखिए कि फिल्म में जब-जब राहुल की एंट्री होती है, तो जनता ठहाका लगा देती है। (ज़ाहिर है, एसी कमरे में बैठकर लाखों रुपए के पैकेज पर जो शहज़ादे को 567वीं बार लांच कर रहे हैं, उसके आगमन की भविष्यवाणी कर रहे हैं, वे जनता और ज़मीन से उतने ही दूर हैं, जितना पृथ्वी से मंगल ग्रह)
  • और, इस फिल्म को अंतिम दृश्य तक देखिए। इसलिए देखिए कि बाबा नागार्जुन की कविता ‘मंत्र’ का जिस शानदार तरीके से उपयोग निर्देशक ने किया है, वह आपको कहीं नहीं मिलेगा। इसलिए, फिल्म को अंतिम स्टिल तक देखिए, तब यह फिल्म आपको बांधेगी, आपके साथ आपके घर तक जाएगी…

ऊं प्रणव, ओम् नाद,
ओम अपनी खुशहाली, दुश्मनों की पामाली,
अपोजीशन के मुंड बने,
तेरे गले का हार…
ऊं हम रचाएंगे, भांग, धतूरा और स्वांग
ऊं शेर के दांत, भालू के नाखून, मरकट का फोता,
हमेशा-हमेशा राज करेगा मेरा पोता…

नोट- लेख बड़ा हो गया है, इसलिए The Lethal Prime Minister पर शायद अगले किसी लेख में…
इस फिल्म को पांच में से पांच स्टार…

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