‘दुर्घटनावश प्रधानमंत्री’ या ‘घातक प्रधानमंत्री’

कल ही कहा था कि इस देश के दो सबसे बड़े अपराधी ‘दुर्घटनावश हिंदू’ जवाहरलाल और ‘दुर्घटनावश प्रधानमंत्री’ रहे मौनमोहन सिंह रहे।

महात्मा गांधी हमेशा कहा करते थे – You are honest, that is not enough… honesty must be demonstrated…

मौनमोहन ईमानदार अगर थे भी (हालांकि, मुझे इस बात पर बहुत यकीन नहीं है) तो उनको यह अधिकार नहीं मिल जाता कि इतालवी महिला की खड़ाऊ को इस देश के सर्वोच्च पद पर रखकर गिद्धों और भेड़ियों को पूरे देश को नोचने और खसोटने के लिए छोड़ देते।

चलिए, वेबसाइट्स की भाषा में बताता हूं, वे सबसे बड़े कारण इस फिल्म के बहाने से, जो मौनमोहन को सबसे बड़ा दोषी बनाती है…

  • फिल्म छोटी है। इसे कम से कम 50 मिनट और लंबा होना चाहिए, तब इतालवी माफिया के पूरे कुकर्म फिल्मी परदे पर सामने आ पाते। साथ ही, जो विद्वान यह कहते हैं कि यह फिल्म तो संजय बारू की है, तो भैए किताब ही उन्होंने लिखी है, तो फिल्म उनके नज़रिए को ही दिखाएगी। दूसरे, ज़रा याद कीजिए कि 10 वर्षों तक देश का प्रधानमंत्री रहने के बावजूद क्या आपको अचानक से मौनमोहन देश के पीएम के तौर पर याद आते हैं या इतालवी महिला ही याद आती है? सच-सच बताइएगा, दिल पर हाथ रखकर…।
  • फिल्म का शुरुआती दृश्य गड़बड़ है, जिसमें उसी झूठ को स्थापित किया गया है कि इतालवी महिला की अंतरात्मा जाग गयी और उसने पीएम पद को ठुकरा दिया। (हा हा हा हा हा… इतना सफेद झूठ। वही अंतरात्मा जो सीताराम केसरी को घसीट कर निकलवाती है, धोती खुलवा देती है, जो नरसिंह राव को दो गज ज़मीन भी मरणोपरांत नहीं लेने देती है- दिल्ली में… जो सुपर प्रधानमंत्री बनकर अपने कुछ रसोइयों, चमचों और दोस्तों को एनएसी में भर्ती करवा कर पूरे देश को दस वर्षों तक चींथती है…वही अंतरात्मा न!) उस अंतरात्मा का सच बताने का पूरा मौका था, निर्देशक के पास।
  • इतालवी माफिया और कुकर्मी कांग्रेसियों के इको-सिस्टम की बलिहारी है कि जहां भी इस देश को लूटनेवाले प्रथम परिवार की महिला का नाम आया है, उसे बीप कर दिया गया है, कपिल सिब्बल का नाम बीप किया गया है। हालांकि, आप जितनी बार वह बीप सुनते हैं, सबकुछ और भी स्पष्ट हो जाता है।
  • स्क्रिप्ट खासी कसी हुई है। पहला हाफ तो पता ही नहीं चलता कि कब खत्म हो गया। एक राजनीतिक फिल्म के लिहाज़ से यह बड़ी बात है। हालांकि, जिस तरह रेनकोट पहनकर नहाने वाले पीएम को इस फिल्म में महिमामंडित किया गया है, वह ग़लत बात है। मौनमोहन दरअसल एक लिजलिजे, कमज़ोर, कायर औऱ बेहद आज्ञापालक नौकरशाह मात्र थे, जो इतालवी मैडम और उसके बेटे के हाथों में इस देश को लुटने छोड़ गए। बस्स…।

जिन्होंने एक बिगड़ैल 35 वर्षीय ‘बालक’ को इतनी हिम्मत दी कि वह देश की संसद द्वारा पारित अध्यादेश के टुकड़े कर दे, देश के पीएम को पर्सनल पीएस की तरह ट्रीट करे और संविधान से इतर सारे अधिकारों का मज़ा उठाते रहे।

  • अक्षय खन्ना छा गए हैं। हालांकि, संजय बारू कहीं से वैसे नहीं है, हो ही नहीं सकते। जो आदमी पीएमओ में काम कर चुका हो, उसकी रीढ़ की हड्डी इतनी सीधी नहीं हो सकती।

इतालवी महिला के रोल में बर्नेट ने कमाल कर दिया है। कलाकारों में बस ‘बाबा’ का चयन ठीक नहीं है। किसी ने मानो मेरी ही बात लिख दी थी – फिल्म में ‘बाबा’ के चेहरे से उतनी बेवकूफी नहीं टपक रही, जितना वह सचमुच में है।

पुनश्च – किसी भी फिल्म पर लगातार दो बार मैंने कभी नहीं लिखा, तो समझ सकते हैं कि यह कितनी अच्छी लगी है, मुझे!

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