विरोध का माहौल बनाने वाले, अज्ञानी हैं या धूर्त!

कुछ दिनों पहले एक फ़ॉर्वर्डेड व्हाट्सएप मैसेज आया था। कई आते रहते हैं बिना नाम के। इसका शीर्षक था ‘दीमक’ और इसमें इसाइयों की गतिविधियों पर प्रकाश डाला गया था।

संदेश के अंत में टिप्पणी थी – “अब ये मत पूछना कि क्या इस ‘बौद्धिक धोखाधड़ी’ के खिलाफ सरकार स्वेच्छा से कोई कठोर कदम नहीं उठा सकती? ये भी मत पूछना कि हिंदूवादी संगठनों-संस्थाओं-पार्टियों द्वारा पाले-पोसे गए मोटे-ताज़े वकील ऐसे मामलों में FIR एवं मुक़दमे दायर क्यों नहीं करते?

वैसे और भी कई लोग हैं जो इन मुद्दों पर लिखते हैं और ऐसा ही अज्ञान प्रदर्शित करते हैं। कोई अज्ञानी होते हैं, कोई धूर्त होते हैं जो एक विरोध का माहौल बना रहे होते हैं।

आज इस पर कुछ ठोस बात करते हैं। आप सब को एक बात तो पता होगी ही कि इन मिशनरियों में अधिकतर संस्थाएं अमेरिकन हैं।

अब कृपया यह भी बताएं कि क्या आप IRFA 1998 के बारे में भी जानकारी रखते हैं?

इस विषय पर मैंने एक विस्तृत नोट लिखा था 29 मार्च 2015 को, जिसका लिंक यहाँ नीचे दे रहा हूँ।

[मिशनरियों का विरोध किया तो क्या कर सकता है अमेरिका?]

इस नोट में आप को मूल एक्ट की डाउनलोड लिंक भी मिलेगी। नोट में भी उन सभी भयंकर कदमों का उल्लेख किया है जो अमेरिका किसी भी देश के विरुद्ध उठा सकता है जो वहाँ मिशनरियों को धर्म प्रसार को मना कर दें।

ये कदम उठाए जाएं, या न उठाए जाएं, यह अमेरिका का शासन तय करेगा। प्रत्यक्ष युद्ध उसमें अन्तर्भूत नहीं है लेकिन बाकी कदम कम दमघोंटू नहीं हैं।

एक बात जानिए, भारत में कई राज्यों में धर्मांतरण के विरोध में पुख्ता कानून हैं। लेकिन कानून सब से पहले शिकायतकर्ता मांगता है और वो कोई होना नहीं चाहता।

दूसरी बात यह भी है कि इन सभी लोगों की जो सर्वत्र पैठ है उसका उपयोग वे बेझिझक किया करते हैं, यह सब जानते और उससे भी अधिक मानते हैं।

इसलिए उनसे कोई वकील आदि पंगा लेना भी नहीं चाहता क्योंकि उसे विश्वास होता है कि उसके बाकी केसेस में रोड़े अटकाए जाएँगे। इस बात का सबूत नहीं मिल पाएगा लेकिन कोई रिस्क लेना भी नहीं चाहेगा। ये तो वही बात हुई कि आप किसी आदमी को कहें कि केप्सूल के अंदर सायनाइड है या नहीं यह केप्सूल खाकर ही वो पता कर ले।

बतौर एक मुख्यधारा का, और वह भी सत्तासीन पक्ष होकर भाजपा स्वयं ऐसे मुकदमे नहीं कर सकती। इंटरनेशनल इमेज का दबाव भी रहता है। लेस्ली उडविन नामक महिला ने ‘India’s Daughter’ नामक फिल्म बनाई थी उसके बाद एक जर्मन युनिवर्सिटी ने भारतीय छात्रों को प्रवेश नकार दिया था कि आप के देश में महिलाएं सुरक्षित नहीं। फिर सरकार ने दबाव डाला तो अपने स्टेटमेंट के लिए माफी मांग ली लेकिन जगह भर जाने का बहाना बनाकर एडमिशन नहीं दिया तो नहीं ही दिया।

दबाने के लिए नसें बहुत हैं, बहुत सारे सरकारी बाबुओं की बच्चाकम्पनी वहीं सेटल होती है, सब से पहले वे ही फड़फड़ाने लगे तो भी बहुत हो जाएगा। और एक बात गिनानी ज़रूरी हो गई है जबकि अच्छा नहीं लगता फिर भी – आज मिशनरियों का सर्वाधिक विरोध करनेवाले हिन्दू ब्राह्मण हैं और अमेरिका में बुद्धि के कारण सेटल्ड सर्वाधिक हिन्दू भी ब्राह्मण ही हैं।

नसें दबाना बहुत आसान है, तरीके गिनाना नहीं चाहता। बाकी बातें गिनते जाएँ तो हैरान रह जाएँगे, जरा IRFA के प्रावधानों का अध्ययन तो कीजिये।

इनमें एक प्रावधान यही भी है कि Transnational कंपनियाँ – जिन्हें हम MNC या कॉरपोरेट्स कहते हैं – वे ऐसे नियमों को लागू करें जहां धर्म की स्वतन्त्रता अबाधित रहे – अब कंपनियाँ कुछ लागू करती हैं उसका मतलब समझाना होगा? “अर्थस्य पुरुषो दास:” तो महाभारत में कहा गया है।

जिसका हल नहीं हो, यह ऐसी समस्या नहीं है लेकिन लड़ाई लंबी और महंगी है। और इसकी कीमत भी हमें ही चुकानी होगी, सरकार यह कीमत दे नहीं सकती। हिन्दू इकॉनमी और इकोसिस्टम से ही इसका शाश्वत इलाज संभव है। बिलकुल सावरकर जी की ‘मोपला’ जैसी ही परिस्थिति से सामना है।

आप को यह बात विदित है कि मेरे पाठकों में कई विधि विशेषज्ञ भी हैं। जो भी लिखा है हवाई बात नहीं है। कई लोगों से कई बातें कर चुका हूँ, उजागर कर के लाभ नहीं इसलिए इससे अधिक कुछ नहीं कह रहा।

आम लोगों को बरगलाने के लिए इससे पहले नोटा से काम लिया, अब भड़काने के लिए यह बहाना चल रहा है शायद! इन लोगों ने काम किया ही क्या है इस विषय में?

2019 के लिए एक रहें। उसके बाद देखते हैं, तब तक लक्ष्य से विचलित न हों।

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