यह है हमारा राष्ट्रीय चरित्र!

दिसंबर की रात काली और गहरी हो चुकी थी जबकि अभी अगली कनेक्टिंग ट्रेन के आने में पूरे दो घंटे शेष थे।

बढ़ती हुई ठंड से जवानी की गर्मी का संघर्ष जारी था और हार से बचने के लिए जैकेट में दोनों हाथ डालकर प्लेटफार्म पर चहलकदमी कर रहा था।

कंधे पर लटकाया हुआ बैग हल्का था क्योंकि अकस्मात घर जाना पड़ रहा था। इन सब से बेखबर मस्तिष्क इस बात को लेकर बेचैन था कि आगे की यात्रा के लिए कोई आरक्षण नहीं था जबकि प्लेटफार्म हिन्दुस्तान के किसी महानगर की जनसंख्या की तरह हर जगह से भरा हुआ था।

भीड़ को चीरते हुए प्लेटफार्म के अंतिम छोर पर पहुंचा तो वहाँ एक किनारे कुछ लोगों को आग के चारों ओर बैठे देखा।

गर्मी लेने के लिए उनके बीच अभी बैठा ही था कि बगल वाले ने चिलम का सुट्टा मारकर उसे मेरी ओर बढ़ा दिया था।

चारों और फैली गंध से तब तक समझ आ गया था कि यहां गांजा पिया जा रहा है।

गंजेड़ियों की महफ़िल का अनुभव कॉलेज में एक दो बार हो चुका था जिसका वर्णन जब बाद में मैंने अपने उपन्यास ‘हॉस्टल के पन्नो से’ में प्रमाणिकता से किया तो देश के कई कॉलेज के अनेक छात्रावास से बड़ी मस्त मस्त प्रतिक्रियाएं मिली थीं।

बहरहाल सतगुणी होने का आवेग तब तक नहीं पनपा था, अतः एक सुट्टा मारकर मैंने भी चिलम आगे बढ़ा दी थी।

चिलम के तीसरे चौथे चक्कर पर ही सबसे दोस्ती हो गयी थी, इतनी कि मुझे बोल दिया गया था कि आगे के सफर की कोई चिंता करने की ज़रूरत नहीं है।

और यह वादा ब्रह्मा की लकीर की तरह सच निकला, ट्रेन के आते ही स्लीपर कोच में मुझे इस तरह से चढ़ाया गया था मानो आरक्षित सूची में मेरा नाम प्रथम पायदान पर हो। उस गंजेड़ी गिरोह में से एक का सम्पर्क सूत्र काम आया था, बस टीटीई को दो नोट पकड़ाए गए थे। बात यहां दो नंबर के धंधे की है और इसमें कोई गड़बड़ी नहीं की जाती। आगे की मेरी यात्रा आरामदायक थी और मैं अपने गंतव्य पर सकुशल पहुंचा था।

उपरोक्त घटना करीब तीस साल पुरानी है। आज हो सकता है अनेक कारणों से रेलवे की व्यवस्था में बदलाव आया हो, मगर इसे प्रतीक मानकर देखें तो हमारा मूल चरित्र नहीं बदला।

आज भी दो नंबर के रास्ते से काम आसानी से होते हैं। उपरोक्त गंजेड़ी की तरह ही कोई ना कोई गिरोह हमारी सम्पूर्ण व्यवस्था में हर जगह देखे जा सकते हैं। और इनके प्रभाव को यहां समझा जा सकता है। ये कुछ भी करवा सकते हैं। और हालात इतने खराब रहे हैं कि दिन की भरी दोपहरी में ये काम करते रहे हैं।

मगर क्या आप ने सोचा है कि यह गिरोह क्यों सफल हो पाता है और कैसे ऑपरेट करता है?

इस ‘कैसे’ को समझने के लिए आप अपने कार्यस्थल का विश्लेषण कीजिये। फिर चाहे आप का ऑफिस प्राइवेट हो या फिर पब्लिक।

आप पाएंगे कि आने वाला नया कर्मचारी अगर सिगरेट पीने का शौकीन है तो उसकी दोस्ती अन्य सिगरेट पीने वालों से जल्दी हो जाती है, और अगर आप शराब पीने वाले हैं तो यह दोस्ती पक्की भी होती है। भ्रष्टाचार करने वाला नेटवर्क में जल्दी से शामिल हो जाता है। यह नेटवर्क एक इको सिस्टम की तरह काम करता है।

इस व्यवस्था में कोई ईमानदार आ जाए तो उसके विरुद्ध यह गिरोह किस तरह से ऑपरेट करता है यह किसी फ़िल्म से कम नहीं होता। फिल्म तो ऊपर की घटना भी लग रही होगी मगर यह हिंदुस्तान की हकीकत रही है। अधिकांश ईमानदार ऐसे ही किसी भी गिरोह के षड्यंत्र का शिकार हो जाते हैं। और बेईमान इस गिरोह का हिस्सा बन कर मज़े लूटते हैं।

क्यों?

क्योंकि अन्य शरीफ ईमानदार कर्मचारियों को इन सब बातों में कोई दिलचस्पी नहीं होती। वो अपनी दस से पांच की नौकरी में व्यस्त होता है। जबकि यह वर्ग बहुसंख्यक है लेकिन वो सब काले कारनामों को देखकर भी चुप रहता है। इन शरीफों की कोई मंडली नहीं होती तो फिर इनके इको सिस्टम बनने की कोई संभावना भी नहीं हो सकती।

इनकी निष्क्रियता मूर्खता में तब बदल जाती है जब ऑफिस में कोई ईमानदार ऑफिसर आता है और सबको मात्र समय पर आने के लिए कहता है। कभी कभी थोड़ी देर लेट आने की फ्रीडम छिन जाने पर ही ये सामान्य लोग सबसे ज्यादा चिड़चिड़ाते हैं, जबकि बेईमान के राज में इनकी बोलती बंद रहती है और तब ये अपने छोटे छोटे काम के लिए भी उपरोक्त भ्रष्ट गिरोह के सामने नतमस्तक होने से नहीं शरमाते।

यह हमारा राष्ट्रीय चरित्र है।

कैसे?

क्योंकि उपरोक्त विडंबना हर जगह देखी जा सकती है। फिर चाहे वो कोई भी क्षेत्र हो, यहां तक कि राजनीति का भी।

देखा गया है कि चोर डकैतों में भी दोस्ती बड़ी जल्दी हो जाती है। इनका धंधा अपने अपने एरिया में चलता रहता है। अंडरवर्ल्ड में भी आपस में कोई दुश्मनी नहीं होती। यह तभी होती है जब इनके हित आपस में टकराते हैं। लेकिन ये भी किसी ईमानदार और सख्त पुलिस वाले के विरुद्ध एकजुट हो जाते हैं! और उसे खत्म करने की हर संभव कोशिश करते हैं। इसके लिए फिर चाहे उन्हें कुछ भी करना पड़े। ऐसा करते समय ये अपनी आपसी रंजिश भी भुला देते हैं।

सुना है कि जितना बड़ा डॉन उसका इको सिस्टम उतना ही मज़बूत और प्रभावशाली होता है। ऐसे में दो डॉन मिलकर पूरी व्यवस्था को किस हद तक हिला सकते हैं, सहज कल्पना की जा सकती है।

एक ईमानदार और सख्त पुलिस ऑफिसर का फायदा सबसे अधिक सामान्य जन उठाता है, मगर जब नकारात्मक गिरोह का इको सिस्टम उसको हटाने के लिए प्रयासरत रहता है तो यही सामान्य जन अपनी निष्क्रियता की मूर्खता का उदाहरण पेश करता है। और फिर ईमानदार थानेदार के हटते ही मोहल्ले के गुंडे के सामने मुँह झुकाकर निकलता है। ऐसा ही कुछ कुछ हम अपने प्रजातान्त्रिक चुनाव के अधिकार के समय भी करते आये हैं।

उस रात ट्रेन की बोगी में चढ़ते हुए मैंने अनेक परिवारों को परेशान होते देखा था। जबकि उनके पास टिकट भी होगा। उनमें से कइयों को किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए जाना जरूरी रहा होगा। कई ट्रेन में चढ़ भी नहीं पाए थे और अगर चढ़े भी होंगे तो जनरल बोगी में भेड़ बकरी की तरह सफर किया होगा।

मुझ जैसे दो चार और भी थे जिन्होंने अपने अपने तरीके से अंदर घुसने में सफलता अर्जित की थी। ये वे लोग हैं जो हर जगह गलत रास्ते से सफलता अर्जित करते आये हैं। इनको आदत पड़ चुकी है। मगर आज कल इनके सारे रास्ते धीरे धीरे बंद हो रहे हैं। यही कारण है जो नकारात्मक फोर्सेज़ का इको सिस्टम अपनी प्रतिक्रिया के चरम पर है। वो भी क्या करें, उनके अस्तित्व का सवाल आ खड़ा हुआ है।

अब यह आप पर निर्भर करता है कि आप किसे चुनते हैं? उस भ्रष्ट व्यवस्था को, जिसमें किसी गिरोह के सदस्य को यात्रा की प्राथमिकता मिलती है या फिर उस व्यवस्था को जो नियम से चलते हुए हर यात्री को कतारबद्ध नियमानुसार चढ़ने का आग्रह करता है।

मैंने तो उपरोक्त गंजेड़ी गिरोह का रास्ता दशकों पहले छोड़ दिया था क्योंकि घर पहुंचने पर पिता ने अच्छी क्लास ली थी और मां ने दो दिन तक बात नहीं की थी। नशा कोई भी हो, उतरने के बाद कमज़ोरी का अहसास कराता है।

ऐसे में क्या आप किसी उस अव्यवस्था का हिस्सा बनना चाहेंगे जो भ्रष्टता का नशा परोसता है? मुश्किल इस बात की है कि उस रात वे लोग जिन्हे ट्रेन में चढ़ने में तमाम तरह की अड़चनें झेलनी पड़ी थीं, वे अगले दिन तक सब भूल चुके होंगे।

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