क्यों जल रहा है असम?

पीछे कई दिनों से मित्रों के सन्देश आ रहे थे कि पूर्वोत्तर के लोगों को सिटीज़नशिप संशोधन बिल से आखिर समस्या क्या है सरकार ने NRC पर इतना कुछ किया है तो लोग अचानक से सरकार की मुखालिफत में क्यों उतर आये हैं?

क्यों जल रहा है असम?

उत्तर जानने के पहले जान लीजिये कि सरकार तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों पर कार्य करती है, जो निम्नानुसार हैं –

  • ट्रांसपेरेंसी
  • ओपेननेस
  • अकाउंटबिलिटी

असम ही नहीं, कहीं की भी जनता में अगर आक्रोश पैदा हो तो ये तय है सरकार ने इन तीनो पॉइंट्स में कहीं न कहीं लोचा पैदा किया है। ये नियम परिवार, समाज और राष्ट्र तीनों पर लागू होता है।

अब तीनों सिद्धांतों में सरकार कहाँ है और लोगों को उससे दिक्कतें क्यों हुई, ये जान लीजिये।

ट्रांसपरेंसी :

सरकार द्वारा NRC जारी होने के बाद पाए गए आंकड़े जिसमें बंगलादेशियों की संख्या करीब 40 लाख पाई गयी, वो AASU और स्थानीय समाचार पत्रों के अनुसार जो 70 से 80 लाख थी, उससे काफी कम है। क्यों?

NRC के दम पर ही सरकार यहाँ अस्तित्व में आई है। इसके बावजूद लापरवाही का आलम ऐसा है कि जाने कितने असमिया लोग NRC में नहीं है। या फिर ऐसे ही बांग्लादेशियों की एक बड़ी संख्या NRC में जगह बनाने में सफल रही।

‘असम समझौता 1985’ को तवज्जो न दिया जाना… इसके अनुसार बांग्लादेशियों में से उन्हीं लोगों को नागरिकता दी जानी थी जो 1971 के पहले यहां आये।

ओपननेस :

70-80 लाख की जगह पर NRC महज 40 लाख बंगलादेशी घुसपैठियों को डिटेक्ट कर सकी। उसके बाद रि-स्क्रूटिनी का प्रावधान आया, जिसमें NRC में नाम न होने की दशा में यहाँ रहने का सबूत पेश करने पर नाम जोड़ जाएगा।

बेस इयर और एविडेंस डॉक्यूमेंट के नियमों में शुरू में तो काफी सख्ती थी लेकिन बाद में काफी लचीलापन आया। आप परिवार रजिस्टर जमा करिये आप का नाम शामिल। भारत में परिवार रजिस्टर या फिर बाकी डॉक्यूमेंट कैसे बन जाते हैं… इसके बारे में बताना ज़रूरी नहीं।

ऐसे में मुश्किल से दस लाख को छोड़कर बाकी सारे नाम NRC में आ जाने की सम्भावना है।

बांग्लादेश में आप कैसे भेजेंगे? ऐसा कौन सा समझौता है बांग्लादेश के साथ, कि उनके नागरिकों को यहाँ से भेजा जायेगा? अगर बांग्लादेश ने उन्हें अपना नागरिक मानने से इनकार किया तो? ऐसे न जाने कितने सवाल हैं जिनका कोई जवाब नहीं। विश्वास कैसे हो यहाँ की जनता को?

ओपननेस में धुंधलापन एक बड़ा इशू है।

अकाउंटबिलिटी :

सबसे पहले तो सिटीज़नशिप बिल में सुधार की अभी क्या ज़रूरत थी? पहले बांग्लादेशियों को हटा देते यहाँ से… फिर ला सकते थे।

सरकार ने NRC की पहल नहीं की, बल्कि ये सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर उसकी निगरानी में चल रहा है।

दूसरे देशों में बसे हिन्दू रिलिजिअस माइनॉरिटी के वेलफेयर की बात करना जायज है लेकिन इससे सीधा नुक्सान असम को है। यहाँ जंगलों में मिशनरीज़ का प्रकोप है। वो एक बड़ी मायनोरिटी को प्रश्रय देते हुए धार्मिक घुसपैठ को बढ़ावा देते हैं। लेकिन इस बिल के बाद सिर्फ मुस्लिमों को ही बाहर भेजे जाने का प्रावधान है।

तो बचे कितने?

संभावित सत्तर अस्सी लाख घुसपैठियों में से सीधे आपने 40 लाख को डिटेक्ट किया। उसमें भी डॉक्यूमेंट सबमिट करने बाद मुश्किल से जो बारह पंद्रह लाख बचेंगे उसमें से ज़्यादातर सिटीज़नशिप बिल का सहारा लेते हुए भारतीय नागरिक बने रहेगें। इस घुसपैठ मामले को हल करने से पहले ही सिटीज़नशिप बिल को लाना, क्या ये नहीं दर्शाता है कि आप सिर्फ नाखून कटाकर शहादत का तमगा लेना चाहते हैं?

तो बंगलादेशी घुसपैठी बचे कितने? और भेजे जाने को लेकर भी कोई स्पष्ट कानून या समझौता नहीं है, तो जायेंगे कितने? ये तो घुसपैठियों को लीगलाइज़ करना हुआ न!

ये अकाउंटबिलिटी है? ये समाधान है आपका? ये तो कुछ यूं है कि किसी सूखाग्रस्त रेगिस्तान में एक टैंकर पानी भेजना और उसे हरा भरा कहते हुए क्रेडिट ले लेना, जबकि समस्या ज्यों की त्यों है।

प्रधानमंत्री मोदी सिलचर आये थे। उनके भाषण ने और आग में घी का काम कर दिया। जमाना आईटी का है।आज हर कोई जानकार है। आप लोग भी पढ़ते देखते ही होंगे।

आपको हिन्दू या किसी से भी प्रेम है तो उसे पहले वाले सिटीज़नशिप के प्रावधानों से भी ला सकते थे। एक बार ये मामला हल हो जाता तो बाद में देश के बाहर के हिन्दुओं और अन्य रिलिजियस माइनॉरिटी के वेलफेयर के लिए काम कर सकते थे। उससे भी ज़रूरी था कि यहाँ के हिन्दुओं के लिए कुछ करते। मंदिर मुद्दे के लिए ही कुछ करते।

जो भी हो इस नादानी भरे निर्णय ने नॉर्थ-ईस्ट में सरकार द्वारा किये गए तमाम विकास कार्यों से उपजी सारी सहानुभूति को मटियामेट कर डाला है।

इस सबके बाद भी कुल मिलाकर एक अच्छे भले राजनीतिक मामले को धार्मिक रंग दे दिया गया। अगर यहाँ सिटीज़नशिप बिल का विरोध होता है तो बाकी लोगों को ये लगेगा कि हम हिन्दुओं की नागरिकता के खिलाफ हैं।

मां कामख्या की धरती जिसने सदियों से सनातन परम्परा और मूल्यों को जीवित रखा, वही अब हिन्दू विरोधी घोषित की जा रही है… वाह मोदी जी वाह।

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