एक खत शाह फ़ैसल के नाम

जनाब शाह फ़ैसल साहेब,

अस्सलाम वा अलैकुम।

कश्मीर की ज़ुबां आती नहीं और उर्दू में हाथ तंग है फिर भी ये अदना हिन्दुस्तानी आपको 2009 की यूपीएससी की इम्तेहान में अव्वल आने वाले पहले कश्मीरी नौजवान के तौर पर मुबारकबाद देता है और आपके सुनहरे मुस्तकबिल की दुआ उस परवरदिगार से माँगता है।

हफ़्ता नहीं गुज़रा होगा एक उड़ती उड़ती सी खबर सुनी कि आपने आम कश्मीरी मुसलमानों पर होने वाले ज़ुल्म से बेचैन होकर आइएएस की नौकरी छोड़ने का फ़ैसला लिया है और इंशाअल्लाह हो सकता है कि नेशनल कान्फ़्रेन्स की तरफ़ से अवाम की नुमाइन्दगी का मौका भी ये सियासत आपको फ़राहम कराये।

आठ साल लग गये आपको यह जानने में कि कश्मीरी मुसलमान मुसीबत में हैं! और आपने मान लिया कि लोकसभा, विधानसभा या राज्यसभा में आपकी सियासी मौज़ूदगी कश्मीर की मासूम रियाया की तमाम मुसीबतों को दूर करने के रास्ते ढूंढेगी और जिन मसाइल का हल आप एक नौकरशाह बन कर नहीं कर पाते, एक सियासतदाँ होकर चुटकी बजाते कर लेंगे।

आपके इरादों ने तो नेताजी सुभाष चन्द्र बसु की याद दिला दी जिन्होंने आइसीएस का इम्तेहान पास किया, माकूल ट्रेनिंग पाई पर आखिर में अंग्रेज़ों की गुलामी करने से इनकार कर दिया और हिंदोस्तान की ज़ंग ए आज़ादी में अपने इसी तजुर्बे का फ़ायदा उठा कर अपनी हैसियत हिटलर और मुसोलोनी जैसे बेहतरीन सदर ए रियासत के बराबरी की बना ली। पर अफ़सोस शायद हिन्दुस्तान ने आपसे कुछ बेज़ा और औकात से बाहर की उम्मीदें पाल लीं।

जनाब, आपको जिस बात को जानने में 8 कीमती साल ज़ाया करने पड़े और हिन्दुस्तानी हुकूमत के लाखों रुपये आप की ट्रेनिंग पर फूँके गये, इतना जनरल नॉलेज तो यूपी बिहार की 12वीं मे पढ़ने वाला बच्चा आइएएस बनने का ख्वाब देखने के 8 मिनट के अंदर हासिल कर लेता है।

लाल बत्ती वाले चार चकिया वाहन की ज़रूरत अगर हिन्दी बोलने वाली पट्टी का एक आम स्टूडेण्ट महसूस करता है तो बस यह सोचकर कि वह एक बार अगर आइएएस बन गया तो यहाँ का सिस्टम तो सुधर ही जायेगा पर उसका पहला काम अपने मादर ए वतन हिन्दुस्तान की खिदमत करना है।

इसी लिये कोई हिन्दी बोलने वाला भा. प्र. से. का ट्रेनी ऑफिसर कभी भी अपने राज्य का कैडर अपने मन से सिलेक्ट नहीं करता। मुल्क की खिदमत में जिस भी सूबे का कैडर उसे मिलता है वह उसे बेहिचक कबूल करता है और ता-उम्र अपने आपको सिर्फ़ अपने सूबे का न मान कर खुद को पूरे मुल्क की जिम्मेवारियों में बावस्ता मानता है।

पर अफ़सोस आपको 8 साल लग गये। हिन्दोस्तान ने आप पर यकीन कर के शायद गलत किया। आप तो दिल से कश्मीरी बन कर रह गये कभी हिन्दोस्तानी बनने का जज़्बा और हिम्मत आप नहीं जुटा पाये।

मेरा मानना है कि आप जैसे आइएएस या कोई आइआइएम, आइआइटी, एनडीए, बार्क, डीआरडीओ, इसरो जैसे साइंन्स सेण्टरों से सरकारी खर्चे पर ट्रेनिंग पाने वाले प्रोफ़ेशनल्स अगर पूरी ट्रेनिंग लेकर हिन्दोस्तान की खिदमत करने से इनकार कर कोई नई राह चुनने की ज़ुर्रत करें तो उनसे ट्रेनिंग का पूरा खर्चा वसूला जाये या उनके तज़ुर्बात से फ़ायदा उठाने वाले शख्स या ऑर्गेनाइज़ेशन को वह खर्च सरकार को वापस करने की पाबन्दी ज़रूर हो, तभी उस ट्रेनी को किसी दीगर असाइन्मेण्ट के लिये पूरा खर्चा चुकाने वाले शख्स या एजेन्सी को सौंपा जाये और वह भी एक हलफ़नामा लेकर कि इस ट्रेनी की सलाहियतों का इस्तेमाल एण्टी नेशनल एक्टीविटी में नहीं किया जायेगा।

खैर अब आते हैं आपके खयाली तिलस्म के टूटने की असली वज़ह पर कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि आपको ये लगा कि आप एक नौकरशाह के तौर पर अपने कश्मीरी भाइयों और दीगर मुसलमान भाइयों की उम्मीदों पर खड़ा नहीं हो पायेंगे।

ये मेरे निजी खयालात हैं पर आज आपके इस्तीफ़े का ज़िक्र आने पर बेवज़ह ज़ुबाँ पर आने को बेताब हैं। दरअसल आप ने ट्रेनिंग के दौरान ही जाना होगा कि कश्मीरी पंडितों की कश्मीर से विदाई की वजह क्या है और यह भी कि ज़्यादातर टेररिस्ट मुसलमान हैं भले ही सारे मुसलमान टेररिस्ट नहीं हैं।

शायद आप आज़ाद कश्मीर की हालत से भी बावस्ता हुए होंगे। आपको पता चला होगा कि हिन्दोस्तान में ही कश्मीरी वोट दे सकते हैं पर पाकिस्तान ऑक्यूपाइड कश्मीर में वोट तो कश्मीरियों की डिक्शनरी में पाया जाने वाला सिर्फ़ एक अदना सा लफ़्ज़ है और कुछ नहीं।

फिर आपको खयाल आया होगा कि अगर मैं एक आला अफ़सर बनकर कश्मीर में पोस्टेड हुआ तो दहशतगर्दों को शरीअत या हदीस के कायदे कानून से सज़ा दिलवाऊँगा या हिंदुस्तानी आईन या जम्मू कश्मीर के स्पेशल कांस्टीट्यूशन के हिसाब से।

हिन्दुस्तान का सेक्युलर कुनबा तो मानता है कि दहशतगर्दों का कोई मज़हब ही नहीं होता, फिर मारे गये दहशतगर्दों को दफ़्न किया जायेगा या नज़र ए आतिश या किसी पहाड़ की चोटी पर लटका दिया जायेगा चील कौवे और जंगली जानवरों की खुराक बनने के लिये।

फिर यह भी खयाल आया होगा – अगर मैं हिन्दुस्तानी आईन की हद में काम करूँगा तो दहशतगर्दों की अदावत मोल लेनी होगी और उनकी सुनी तो हिन्दुस्तान की नाफ़रमाबरदारी होगी और जम्मू कश्मीर की भी।

हो सकता है कि आपको कश्मीर में आए सैलाब के दौरान खूँखार इंडियन आर्मी के कारनामे और अमन के दिनों में पत्थरबाज़ों की मासूमियत भी नज़रों के आगे छा गई होगी।

आपको मुफ़्ती साहेब की बेटी रूबैया सईद की फ़िरौती में छोड़े गये अमनपसंद याद आये होंगे और कंधार का मामला भी आपको जरूर कौंधा होगा। आपने मान लिया होगा कि आपके एक तरफ़ कुँआ है तो दूसरी तरफ़ खाई।

हिन्दुस्तान की सरकार की नमकहलाली को कश्मीर की दहशतगर्दी और क्रॉस बॉर्डर टेररिज़्म बर्दाश्त नहीं करेगा और टेररिस्टों के डर से ही सही पर उनके खिलाफ़ कदम ना उठाना हिन्दोस्तानी और सूबाई सरकारों को नाकाबिल ए बर्दाश्त होगा।

इस जद्दो जहद में आपको याद आया होगा कि कश्मीर में सबसे सुकून से बस लीडर जीते हैं। किसी भी दहशतगर्दाना हरकतों में आज तक किसी लीडर को खरोंच तक नहीं आई है। अगर लीडरों के फ़ैमिली मेम्बर्स को अगवा भी किया गया है तो कुछ सौदों के बाद सब के सब सही सलामत वापिस लौटे हैं।

हिन्दुस्तानी सरकार कुछ एक बकरों की फ़ौरी सलामती के नाम पर आदमखोर शेरों को आज़ाद करने तक का सौदा खुशी खुशी कर लेती है और दरिंदों के सीने में पीतल और बारूद भरने के बदले सरकार का एक नुमाइन्दा उन्हें दूसरे मुल्क में बाइज्ज़त छोड़कर भी आता है।

शाह फ़ैसल साहेब, कभी मौका मिले तो गीता पड़ने का लुत्फ़ उठायें। अर्जुन को भी जब दुश्मनों में अपने दिखाई देने लगे थे तो उन्होंने अपने पास के सबसे निचले दर्ज़े के कारिंदे अपने साईस से पूछा था कि मुझे क्या करना चाहिये, पर आपने तो उससे राय ली जो कश्मीर के हालात पर फ़िक्रमंद होने के लिये दिल्ली में शाहों की ज़िन्दगी गुज़ारता है।

जो कश्मीर के हालात से खुद मुँह छुपाए फिरता है वह आपको माकूल राय क्या देगा? आप एक ज़हीन इन्सान हैं और हिन्दोस्तान के सबसे आला कम्पिटीशन में अव्वल दरज़े से पास भी हो चुके हैं। आप अगर सियासत में आयेंगे तो सियासत का रुतबा बढ़ेगा।

आपकी पॉलिटिक्स में आमद से पहली बार गुण्डे, मवाली, ठेकेदार, बिज़नेसमैन, कॉरपोरेटर, फ़िल्मी सितारे, लीडरों की औलादें या उनकी शरीके हयात या बेवा के बदले एक पढ़ा लिखा शहरी सियासत की ज़मीन पर अपने कदम रखेगा।

हो सकता है कि आपकी आमद पॉलिटिक्स में एन्ट्री के वास्ते पढ़े लिखे नौजवानों के लिये एक रास्ता खोल दे। सरकारी नौकरी और अपना बिज़नेस चलाने के अलावा आज के पढ़े लिखे तबके के पास राजनीति भी एक ऑप्शन हो जायेगा।

पर ज़रा सोचिये कि चुनाव लड़ने के लिये 60 – 70 लाख की सफ़ेद रकम चुनावी खर्चे के तौर पर कहाँ से जुगाड़ेंगे आप? और जो आपको ये रकम मुहैय्या करवायेगा वह क्या रमज़ान के महीने में ज़कात बाँट रहा होगा या इस एवज़ में आपसे कुछ ना कुछ नाजायज़ काम ज़रूर करवायेगा, है कि नहीं? क्या आप फिर से करप्शन के एक नये जाल में फँसने नहीं जा रहे हैं?

पर हम आपके किसी भी फ़ैसले पर अपनी राय थोपने की कोशिश नहीं करेंगे और बस उस परवरदिगार से ये दुआ करेंगे कि आप अपना मनपसन्द कश्मीर के साथ साथ अमनपसन्द कश्मीर बनाने में भी कामयाबी हासिल करें।

आमीन।

आपका एक आम हिन्दोस्तानी।

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