जस्टिस सीकरी बनाम दोगले

दिसम्बर 2010 में रिटायर हुए CBI के तत्कालीन डायरेक्टर अश्वनी कुमार को तत्कालीन यूपीए की कांग्रेसी सरकार ने 26 महीने बाद मार्च 2013 को नागालैंड का गवर्नर बना दिया था।

18 अप्रैल 2013 को सुप्रीम कोर्ट के जज पद से रिटायर हुए आफ़ताब आलम को तत्कालीन यूपीए की कांग्रेसी सरकार ने केवल डेढ़ महीने बाद जुलाई 2013 में Telecom Disputes Settlement and Appellate Tribunal (TDSAT) (दूरसंचार विवाद एवं अपील अधिकरण) का चेयरमैन बना दिया था।

Telecom Industry से सम्बद्ध उद्योगपति भलीभांति जानते हैं कि यह कितने जलवे वाला मलाईदार सरकारी पद होता है।

अब यह भी जानिए कि अपने रिटायरमेंट से पहले यह दोनों महानुभाव क्या कर रहे थे…

12 जनवरी 2010 को कुख्यात आतंकवादी सोहराबुद्दीन के एनकाउंटर की CBI जांच का आदेश तत्कालीन न्यायाधीश आफ़ताब आलम ने दिया था।

ठीक 6 महीने बाद CBI ने 23 जुलाई 2010 को गुजरात के तत्कालीन गृहमंत्री अमित शाह तथा राजस्थान के तत्कालीन गृहमंत्री गुलाबचंद कटारिया के खिलाफ सोहराबुद्दीन की हत्या की साज़िश रचने के आरोप में कोर्ट में चार्जशीट दाखिल की थी।

इसके दो दिन बाद 25 जुलाई 2010 को अमित शाह को गिरफ्तार कर लिया गया था। (अमित शाह की जांच करने, चार्जशीट दाखिल करने तथा उनको गिरफ्तार करने वाली CBI का डायरेक्टर अश्वनी कुमार ही था।)

तीन महीने बाद 29 अक्टूबर 2010 को अमित शाह को ज़मानत मिली और वो बाहर आए। लेकिन दूसरे ही दिन जस्टिस आफ़ताब आलम ने अमित शाह पर प्रतिबंध लगा दिया कि वो गुजरात में प्रवेश नहीं कर सकते।

फिर जस्टिस आफ़ताब आलम ने 2012 में अमित शाह के मुकदमे की सुनवाई गुजरात से बाहर मुम्बई की अदालत में करने का आदेश भी दे दिया। परिणामस्वरूप अमित शाह 2 वर्ष तक अपने घर नहीं जा सके थे।

हालांकि 30 दिसम्बर 2014 को मुम्बई की विशेष CBI अदालत ने अमित शाह को बाइज़्ज़त बरी कर दिया था और साफ शब्दों में कहा था कि यह केस राजनीतिक व्यक्ति को फंसाने के उद्देश्य से ही दायर किया गया था। CBI ने निष्पक्ष और सही जांच नहीं की है।

यही कारण है कि CBI द्वारा खड़ी की गई 210 गवाहों की फौज के 92 गवाहों ने अदालत में खुलकर कहा था कि हम पर ज़बरदस्ती दबाव डालकर हमें गवाह बनाया गया है। यह पूरा घटनाक्रम सबूत है कि तत्कालीन CBI डायरेक्टर अश्वनी कुमार के नेतृत्व और मार्गदर्शन में CBI क्या और किस उद्देश्य से किस के लिए काम कर रही थी।

आफ़ताब आलम के कुछ और फैसले भी जानिए। आफ़ताब आलम ने गुजरात के कुख्यात पुलिस अधिकारी संजीव भट्ट के खिलाफ मुकदमा चलाने पर रोक लगा दी थी जो आजकल जेल काट रहा है, तीस्ता सीतलवाड़ के खिलाफ़ कार्रवाई पर भी रोक लगा दी थी।

अतः अमित शाह पर फ़र्ज़ी आरोप मढ़कर गिरफ्तार करने वाले CBI डायरेक्टर अश्वनी कुमार को रिटायरमेंट के बाद जिस कांग्रेसी यूपीए की सरकार ने गवर्नर बनाकर पुरस्कृत किया…

फ़र्ज़ी मुकदमों में फंसाए गए अमित शाह के खिलाफ अपने फैसलों से नाक में दम करने, तथा मोदी विरोधियों को बचाने वाले जिस आफ़ताब आलम को उसके रिटायरमेंट के तत्काल बाद जिस कांग्रेसी यूपीए की सरकार ने Telecom Disputes Settlement and Appellate Tribunal (TDSAT) का चेयरमैन बनाकर पुरुस्कृत किया…

उस कांग्रेसी यूपीए के नेता और उनके मीडियाई चाटुकार चमचे अब वरिष्ठता क्रम में सुप्रीम कोर्ट के दूसरे नम्बर के न्यायाधीश जस्टिस सीकरी पर भद्दे अश्लील आरोपो का कीचड़ इसलिए उछाल रहे हैं क्योंकि उन्होंने भ्रष्टाचार के गम्भीर आरोपों से घिरे भ्रष्ट CBI डायरेक्टर का बचाव नहीं किया।

इसलिए अपने लेख को शीर्षक दिया है ‘जस्टिस सीकरी बनाम दोगले’

ध्यान रहे कि सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एके सीकरी ने कल रविवार को सरकार की ओर से लंदन स्थित कॉमनवेल्थ सेक्रेटरिएट आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल (सीएसएटी) में भेजे जाने के सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया।

हालांकि मोदी सरकार ने दिसंबर में जस्टिस सीकरी को लंदन स्थित कॉमनवेल्थ सेक्रेटरिएट आर्बिट्रल ट्रिब्यूनल में भेजे जाने का प्रस्ताव रखा था। उस समय सीकरी ने इस प्रस्ताव को स्वीकार कर के प्रस्ताव पर अपनी सहमति भी जताई थी।

लेकिन 2 दिन पूर्व CBI के भ्रष्ट निदेशक आलोक वर्मा को पद से हटाने के जस्टिस सीकरी के निर्णय को इस प्रस्ताव से जोड़कर कांग्रेस और लुटियंस मीडिया के कुख्यात दलालों ने जस्टिस सीकरी पर भद्दे आरोपों का कीचड़ उछालना शुरू कर दिया था।

परिणामस्वरूप जस्टिस सीकरी ने उस प्रस्ताव को ही नकार दिया। लेकिन कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी अब भी उन आरोपों की माला जप रहे हैं।

राहुल गांधी को यह याद दिलाना ज़रूरी है कि… कांग्रेसी यूपीए की सरकार द्वारा 2013 में देश के 11 राज्यों के गवर्नर पद पर CBI/ IB सरीखी जांच एजेंसियों तथा IAS/ IPS काडर के रिटायर्ड अफसर तैनात किए गए थे तथा 1950 से अबतक 44 रिटायर्ड जज सरकारी पद पर तैनात किये गए हैं।

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