‘क्या भारतीय मीडिया को कोई शर्म नहीं है’

सीबीआई के पूर्व निदेशक आलोक वर्मा को पद से हटाए जाने को लेकर कांग्रेस समर्थक और पोषित मीडिया ने झूठे समाचारों द्वारा सरकार के विरूद्ध मुहिम शुरू कर दी है।

दो दिन से मीडिया के कुछ लोगों ने प्रधानमंत्री और जस्टिस ए के सीकरी के विरुद्ध मुहिम चला दी कि उन्हें वर्मा को हटाने के लिए इतनी शीघ्रता क्या थी? वर्मा को अपना पक्ष रखने का अवसर क्यों नहीं दिया?

इंडियन एक्सप्रेस ने हेडलाइन चलायी कि ‘जस्टिस ए के पटनायक, जिन्हें सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्रीय सतर्कता आयुक्त (CVC) द्वारा वर्मा की इन्क्वायरी को सुपरवाइज़ करने की जिम्मेवारी दी, को वर्मा के विरुद्ध भ्रष्टाचार का कोई सबूत नहीं मिला; जस्टिस पटनायक ने यह भी कहा कि CVC का कहा अंतिम शब्द नहीं हो सकता तथा CVC रिपोर्ट के निष्कर्ष उनके (पटनायक) के नहीं है।

यह तो भला हो जस्टिस काटजू का कि उन्होंने जस्टिस पटनायक से बात करके फेसबुक एवं ट्विटर के माध्यम से स्पष्ट किया कि जस्टिस पटनायक से सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस की एक महिला पत्रकार ने उनसे फोन पर एक मिनट से कम “perfunctory” (हाल-चाल जानने जैसी) बातचीत की और ढेर सारी स्टोरी लिख दी।

जस्टिस पटनायक और सीकरी, दोनों ने मना किया कि उनसे ना तो बरखा दत्त, ना ही मनीष छिब्बर, ना ही भूपेंद्र चौबे ने बात की, लेकिन बिना जांच-पड़ताल के मसालेदार स्टोरी लिख दी।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नहीं पढ़ा, जिसमें कहा गया था कि प्रधानमंत्री, जस्टिस सीकरी और काँग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे वाली समिति को वर्मा के बारे में एक हफ्ते में फैसला करना होगा।

जस्टिस सीकरी के अनुसार सीवीसी ने वर्मा को सुनवाई का अवसर दिया था। सीवीसी की रिपोर्ट और साक्ष्यों के आधार पर जस्टिस सीकरी का मत था कि जब तक आलोक वर्मा पर लगे आरोपों की जांच पूरी नहीं हो जाती है तब तक उनका तबादला उनकी रैंक के समान की ही किसी दूसरी रैंक पर कर दिया जाए।

जहां तक वर्मा को सुनवाई का अवसर न दिए जाने का सवाल है, यह एक स्थापित सिद्धांत है कि किसी आरोपी को सुनवाई का मौका दिए बिना निलंबित किया जा सकता है, और निलंबित होने के बाद भी जांच होते रहना बहुत सामान्य सी बात है।

फिर जस्टिस काटजू ने जस्टिस सीकरी से बातचीत करके लिखा कि जस्टिस सीकरी का कॉमनवेल्थ ट्रिब्यूनल के लिए मुख्य न्यायाधीश ने दिसंबर के पहले सप्ताह में नामांकन किया था, जबकि सर्वोच्च न्यायालय का वर्मा के बारे में निर्णय एक महीने बाद आया।

ट्रिब्यूनल के सदस्यों को कोई वेतन नहीं मिलता, ना ही उन्हें लंदन में रहना होता है। जब कॉमनवेल्थ के कर्मचारी का अपनी सेवाओं की शर्तो को लेकर कोई विवाद होता है, तब ट्रिब्यूनल के सदस्य कोर्ट की बैठक में जाते है।

फिर, जस्टिस काटजू पूछते हैं कि कैसे यह एक ‘मलाईदार पोस्टिंग’ हो गयी, जैसा मीडिया लिख रहा है?

अंत में, जस्टिस काटजू लिखते हैं कि यह पूरी तरह से विकृत और फर्ज़ी खबर है और पूछते हैं कि क्या भारतीय मीडिया को कोई शर्म नहीं है?

मेरा मानना है कि झूठी खबरों के द्वारा अभिजात्य वर्ग भारत में अपने विशेषाधिकारों और अस्तित्व को बचाये रखने का पुरजोर प्रयास कर रहा है।

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