Substance over form

अब आप पूछेंगे, ये substance over form क्या बला है?

जब आप 10वीं के बाद 11वीं में कॉमर्स (वाणिज्य) लेंगे, तो एक विषय एकाउंटिंग (लेखांकन) का भी होता है। लेखांकन या एकाउंट्स के काफी सारे मूल नियम होते हैं, basic concepts कहिए। उन्हीं में से एक है, substance over form.

मेरे सबसे पसंदीदा रहे इस concept को सीधी भाषा में समझाऊं तो ‘बॉडी में क्या रखा है, भावनाओं को समझो’। जी हाँ, ये कॉन्सेप्ट कहता है कि कोई भी बात हुई हो, कोई भी transaction हुआ हो, उसके लीगल या कानूनी रूप (form) को ही मत देखो, बल्कि उसके पीछे intent क्या है, उसका substance क्या है, उसे भी देखो। ऐसा समझाना मुश्किल है, ये उदाहरण लीजिए।

एक मशीन जो एकदम नई है, जिसकी उम्र 10 साल है (मतलब 10 साल के बाद वो भंगार है) और आप वो मशीन पूरे 9 या 10 साल के लिए उसके मालिक से किराए पर ले लेते हो। यहाँ, आप वो मशीन खरीदते नहीं, क्योंकि शायद पूरा पेमेंट एक बार में आपके किये संभव नहीं। इस कारण आप उसे long-term lease पर ले लेते हो।

हिसाब से मशीन के लिए हर महीने किये गए पेमेंट को आपको अपने खातों में मशीन के किराए के रूप में दिखाना चाहिए, पर यहां substance over form बीच में आ जाता है। और आते ही कहता है, कि हो सकता है मशीन आज भी उसके मालिक के नाम में हो, कानूनन उसका हक़ है, पर चूंकि एक substantial period of its life (मशीन के संभावित जीवन के अधिकतर अवधि) के लिए वो आपने उपयोग की है, या आपके अधिकार में रही है, तो इस तरह से एकाउंटिंग की जाए कि जैसे आप ही की थी।

अब जो पेमेंट आप देंगे, वो इस तरह से दिखाया जाएगा कि मशीन उधार पर खरीदी थी, हर साल लेनदारी और ऊपर का ब्याज चुकाया है। इस पूरी transaction को विस्तारित करते हुए कई standards और नियम हैं, मैं उन सब में नहीं जाऊंगा।

सौ बातों की एक बात, दिखता चाहे कुछ भी हो, तह में जाओ और उस हिसाब से खातों में एंट्री करो। ‘बॉडी में क्या रखा है, भावनाओं को समझो’।

भारत में Constitutional Democracy है, संवैधानिक लोकतंत्र। राष्ट्रपति head of state होते हैं, प्रथम नागरिक। कहीं भी जाएंगे, तो हर कोई झुकेगा। पर इसी लोकतंत्र में असली ताकत प्रधानमंत्री के पास होती है। पूरे देश के लिए नीति निर्धारण से लेकर नीति क्रियान्वयन, अगर गौर से देखा जाए तो प्रधानमंत्री के अधिकार-क्षेत्र में है।

नरेंद्र मोदी भारत के 15वें प्रधानमंत्री हैं। इससे पहले 10 साल डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री रहे। 2004 के अप्रेल मई के गरम महीनों में हुए चुनावों में अधिकांश हिन्दू मध्यम वर्ग के ‘इतनी गर्मी है यार, अपन एक वोट नहीं देंगे तो क्या हो जाएगा’ वाले असीम आलस्य की परिणति अटलजी की अप्रत्याशित हार में हुई।

खुद कांग्रेस ने भी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ होगा। खैर जोड़-तोड़ से सरकार बनी, और सोनिया गांधी ‘टेक्निकल’ कारणों से प्रधानमंत्री नहीं बन पाई, तो उन्होंने डॉ मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री ‘नियुक्त’ किया।

2004 तक अटलजी के गांव गांव तक सड़क पहुँचाने, बिजली और पानी पर मूलभूत काम करने और GDP बढ़ाते हुए fiscal deficit कम करने का लाभ सिंह को मिला, और 2009 में विपक्ष से कोई मजबूत दावेदार ना होने की वजह से वो फिर से प्रधानमंत्री बने।

सरकारी रिकार्ड्स से लेकर विकिपीडिया तक उन्हें भारत का 14वां प्रधानमंत्री बताते हैं, जबकि सही मायनों में सियासत पूर्णतया सोनिया गांधी के हाथों में थी। इसकी बानगी ये देखिए कि 22 मई 2004 को सिंह के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेते ही 15 दिन के अंदर 4 जून 2004 को National Advisory council (राष्ट्रीय सलाहकार परिषद) का गठन हुआ, जिसकी इन पूरे 10 सालों में अध्यक्ष सोनिया गांधी रही।

शिक्षा, मीडिया और NGO लॉबी में फैले परिवार के पालतुओं से भरा ये परिषद (NAC) सही मायनों में सिंह के कैबिनेट के समकक्ष या कहीं-कहीं तो उनसे ज्यादा शक्तिशाली था, क्योंकि ये परिषद अगर कोई नीति निर्धारित करता था, तो उसे अमल में लाना डॉ सिंह या उनके कैबिनेट के लिए किसी आकाशवाणी से कम नहीं था, जो उन्हें हर हाल में पूरा करना था।

इन दस सालों में राष्ट्रीय सुरक्षा, राष्ट्रीय सुराख़ बन कर रह गयी जब दिल्ली, मुम्बई, बैंगलोर, हैदराबाद, अहमदाबाद, वाराणसी, पुणे, जयपुर – लगभग हर बड़े शहर में बम धमाके हुए, असंख्य लोग मारे गए, पर कुछ भी नहीं हो पाया। सोनिया के इशारे पर गृह मंत्री चिदंबरम/ शिंदे हिन्दू आतंकवाद का कथानक गढ़ते रहे, उसे साबित करने पर तुले रहे पर कभी भी वोट बैंक नाराज ना हो जाए इसलिए हमलों की जड़ पर कुछ कड़ा कदम नहीं उठाया गया।

(इसी बात को प्रूव करने के लिए एक fact आपके सामने रखता हूँ – मोदी कार्यकाल के पिछले साढ़े चार साल में कश्मीर से बाहर पूरे देश में एक भी बम धमाका नहीं हुआ, जबकि अस्थिरता और भय फैलाने की कोशिश इस दौरान उन 10 सालों से 10 गुना ज्यादा हुई होगी – इस बात से आप भी सहमत होंगे। UPA के वक़्त 15-15 दिन में एजेंसियों के पकड़े सिमी के आतंकवादी ‘सबूत के अभाव’ में छूट जाते थे, और उसके अगले कुछ महीनों में वो कोई नया शहर दहला देते थे।)

ये 10 साल भारत को रक्षा, कौशल विकास, अर्थव्यवस्था में कितना पीछे ले आये, इसका आंकलन कठिन हैं। आज जो हम बैंकों की बुरी थकी हालात देख रहे हैं, ये मनमोहन सिंह के मंत्रियों द्वारा सरकारी बैंकों को अंधाधुंध बंटवाये लोन की वजह से हैं।

Lanco, Essar ग्रुप, माल्या, कितनों के बारे में तो लिख चुका हूं। और करोड़ों, अरबों क्या, खरबों के उन घोटालों को कौन भूल सकता हैं जिन्हें zero loss कहकर कार्पेट के नीचे सरकाने की बहुत कोशिश हुई।

अभी दिसंबर 2018 में कोयला सचिव एच सी गुप्ता को अरबों रुपये के coal mine allocation scam में 3 साल की कैद हुई। पर उस दौरान कोयला प्रभार अपने पास रखने वाले मनमोहन सिंह पर कोई आंच ना आई। सिर्फ सचिव बिना मंत्री के सहमति से इतना कुछ कर लें, ये संभव ही नहीं।

बाकी, ये एक नहीं, ऐसे अनेकों अनेक घोटाले, काण्ड हैं जो प्रधानमंत्री की नाक के नीचे होते रहें, Air India जैसी असंख्य सरकारी कंपनियां खोखली होती रहीं, पर मनमोहन रेनकोट पहन कर नहाते रहे।

इंफ्रास्ट्रक्चर का निर्माण 2010 तक आते आते अटलजी के कार्यकाल से आधा हो गया था। और जो प्रोजेक्ट थे, वो भयंकर मात्रा के भ्रष्टाचार या सरकारी उदासीनता की भेंट चढ़ चुके थे। राफेल राफेल चिल्लाने वालों की सरकार के रक्षा मंत्री ने खुले शब्दों में पैसे ना होने के कारण, विमान या रक्षा उपकरणों की खरीद नहीं हो सकती, ऐसा स्वीकार किया है।

प्रधानमंत्री के मीडिया एडवाइजर संजय बारू ने अपनी किताब में लिखा है कि सिंह, सोनिया के आगे इस तरह से दण्डवत हो चुके थे कि PMO (प्रधानमंत्री कार्यालय) से फाइलें सोनिया गांधी के आवास पर जाती थी, जिन्हें सोनिया की अनुमति के बाद ही आगे बढ़ाया जाता था।

यहां एक बात गौर करने लायक है कि भारत सरकार के कुछ डिपार्टमेंट सिर्फ और सिर्फ प्रधानमंत्री को ही रिपोर्ट करते हैं, और उनके कामकाज में दूसरे, तीसरे या किसी भी नम्बर के मंत्री या किसी अन्य को भी हस्तक्षेप की अनुमति नहीं।

Department of space (अंतरिक्ष विभाग), Department of atomic energy (परमाणु ऊर्जा विभाग), Nuclear Command Authority – ये कुछ ऐसे विभाग हैं जो नाम से ही बहुत महत्त्वपूर्ण लगते हैं और जिनके काम में अत्यंत गोपनीयता की आवश्यकता है।

ये सारे विभाग सीधे प्रधानमंत्री को रिपोर्ट करते हैं और इनके कामकाज या फंडिंग में देखने का अधिकार रक्षा, गृह या वित्त मंत्रालय के मंत्रियों तक को नहीं है। सोचिए, इन सबकी अत्यंत गोपनीय विभागों तक सोनिया और उनकी टोली की सहज पहुँच थी। ये सब रोकने के लिए जब बारू ने सिंह को ये याद दिलाया कि आप प्रधानमंत्री है, सिंह ने पूर्णरूपेण अपनी असमर्थता जाहिर की वो पार्टी और उसकी अध्यक्ष से बढ़ कर नहीं।

सियाचिन भी पाकिस्तान को सौंपने की बातें भी उठी थी, पर सेनाओं के प्रबल विरोध से बात रह गयी। देश की संप्रभुता, सुरक्षा और गौरव को appeasement, incompetence और corruption की परछाई में सिंह इन 10 सालों में छोड़ आये थे।

लालू को बचाने के लिए मनमोहन कैबिनेट द्वारा जब ऑर्डिनेंस लाया गया, तो सिंह के विदेश जाने के बाद सरकार या पार्टी में कोई पद ना लिए हुए सोनिया के ’15 साल में सिंगापुर’ जिले से सांसद पुत्र ने भरी सभा में वो ऑर्डिनेंस तार तार कर दिया। देखा जाए तो वो किसी और सांसद से कुछ बढ़कर नहीं थे, पर उनके नाम के आगे लगे ‘गांधी’ के आगे सिंह नतमस्तक थे। और आज उसी लालू और उसकी औलादों के साथ ’15 साल में सिंगापुर’ जिले के सांसद की गलबहियां है।

ऐसी ही नतमस्तकता उनके कार्यकाल के बाद भी अनेकों बार देखी गयी, उदाहरण- जब श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे, सोनिया और मनमोहन से मिलने दिल्ली आते हैं और मनमोहन को भूतपूर्व प्रधानमंत्री समझते हुए अपने पास बैठाने का सौजन्य दिखाते हैं, सोनिया के एक इशारे मात्र से मनमोहन चुपचाप साइड वाली सीट पर बैठ जाते हैं, और सोनिया, विक्रमसिंघे के समकक्ष बैठती है।

कितना कुछ लिखूँ, इसका कोई अंत ही नहीं।

Legal form में भले ही डॉ मनमोहन सिंह देश के प्रधानमंत्री थे, in substance हुकूमत पूरी तरह से सोनिया गांधी के पास थी।

बारू की किताब पर आधारित उसी नाम से बनी ‘The Accidental Prime Minister’ में डॉ मनमोहन सिंह के किरदार को इतना असहाय बताया गया है, जिसपर आपको तरस आने लगे।

जनवरी 2014 के एक इंटरव्यू में सिंह में कहा कि उन्हें आशा है, इतिहास उन्हें उदार नज़रों से देखेगा। मेरी नज़र में डॉ सिंह किसी तरस या सहानुभूति के काबिल नहीं। 130 करोड़ लोगों के भविष्य को प्रभावित करने वाला एक प्रतिष्ठित और शक्तिशाली पद सच में ही करोड़ों में से एक को मिलता है।

एक साल से कम के कार्यकाल वाले देवेगौड़ा, गुजराल, VP सिंह, चंद्रशेखर जैसे खूब बने जिनकी अवसरवादिता और अस्थिरता के कारण देश ने खूब भुगता। पर बिना किसी यत्न के इसे पाकर 10 साल इसपर बैठने वाले सिंह को इतिहास एक असहाय, निर्बल और अशक्त प्रधानमंत्री के तौर पर याद रखेगा जिनकी हैसियत परिवार के आगे एक निरीह ‘रामू काका’ से कुछ ज्यादा नहीं थी, और जिनकी अक्षमता की कीमत देश ने कई मोर्चों पर चुकाई।

Mr. Singh, more than an Accidental Prime Minister, you were somehow a disastrous accident to this nation. I don’t know about History, but I, a common Indian, find no reason to be anyway kind to you, barring that you were my ‘Prime Minister’, and yes, accidentally.

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