योकोइ-ओनादा की कथा : राष्ट्रीय चरित्र और प्रतिबद्धता पर भारतीयों के लिए दर्पण

कल डॉ राजीव मिश्र का एक लेख (राष्ट्रीय चरित्र का निर्माण ही है राष्ट्र निर्माण) पढ़ा जिसमें उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध के एक जापानी सैनिक हीरू ओनादा की कहानी बताई थी।

ओनादा 1974 में फिलीपीन्स के जंगलों में अकेला युद्धरत मिला और उसको यह पता ही नही था कि 29 वर्ष पूर्व, जापान युद्ध हार चुका था।

मैंने जब हीरू ओनादा का नाम पढा तो याद आया कि कुछ वर्षों पहले मैंने इसके बारे में कुछ लिखा था लेकिन बीच में ही छोड़ दिया था। आज मैं, उसी अधूरे लेख को फिर से लिखने का प्रयास कर रहा हूँ।

महीना तो याद नहीं लेकिन सन याद है, 2015, यूं ही नेट सर्फिंग कर रहा था तो एक खबर पर नज़र अटक गई। कोई विदेशी न्यूज़ वेब पोर्टल था।

उसमें खबर थी कि 1974 में फिलीपीन्स के जंगलों में जो द्वितीय महायुद्ध का जापानी सैनिक, हीरू ओनादा मिला था, उसकी मृत्यु की प्रथम वर्षगांठ है। मेरे लिए यह नाम तो बिल्कुल नया था लेकिन उसकी कहानी अचानक मेरे मन मे सजीव हो उठी, जो मेरी धुंधलाई यादों में कहीं गुम हो चुकी थी।

आज की पीढ़ी को यह सब विचित्र लगेगा लेकिन जब मैं बड़ा हो रहा था तब द्वितीय विश्वयुद्ध में लापता जापानी सैनिकों की खोज और उनके मिलने की कहानियां समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में आते थे।

1970 के दशक में जापान के लापता सैनिकों का चर्चा में आने का मुख्य कारण 1972 में प्रशांत महासागर में स्थित गुआम द्वीप में शोइची योकोइ (Shoichi Yokoi) और 1974 में फिलीपीन्स के लुबांग द्वीप में हीरू ओनादा (Hiroo Onada) का मिलना था। इन जापानी सैनिकों का इस तरह दशकों बाद मिलना, मेरे साथ अन्य लोगों के लिए भी कौतुहल का विषय था।

जिस जापान ने, हिरोशिमा और नागासाकी पर परमाणु बम गिरने के बाद पूरी तरह टूट कर, 15 अगस्त 1945 को आत्मसमर्पण किया था, वही इन तीन दशकों के भीतर ही एक तरफ विश्व की बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया और दूसरी तरफ युद्ध के समाप्त होने के बाद भी, प्रशांत महासागर के द्वीपों में जापानी सैनिक अभी भी जापान के लिए अकेले लड़ते मिल रहे हैं!

ये शोइची और हीरू कोई जापानी अपवाद नहीं थे बल्कि 1945 के बाद से 1974 तक करीब 120 जापानी सैनिक अलग अलग द्वीपों में छुपे हुए लड़ते हुए मिले थे। कुछ को पता था कि जापान हार गया है लेकिन तब भी आत्मसमर्पण करने की जगह द्वीपों के जंगल में अंदर चले गए, और कुछ को पता ही नहीं चला कि उनका राष्ट्र हार गया है, वे अपने उच्चाधिकारियों के आदेश का पालन करते हुए लड़ते रहे थे।

गुआम में 1972 को पकड़ा गया शोइची योकोइ जापानी सेना में सार्जेंट था और 1943 में उसकी गुआम में तैनाती हुई थी। 1944 में जब अमेरिका ने इस द्वीप पर कब्जा किया तो वो अपने अन्य साथियों के साथ अंदर जंगल मे चला गया।

उसको 1952 में उसको पता चला था कि जापान हार गया है, लेकिन उसने आत्मसमर्पण नहीं किया। उसको युद्ध पर जाने से पहले यह निर्देश मिला था कि “आत्मसमर्पण करके कलंकित होने से श्रेष्ठ है, मृत्यु का आलिंगन करना”, उसने उसी निर्देश को आत्मसात कर लिया था।

समय के साथ धीरे धीरे उसके साथी या तो चले गए या मर गए, लेकिन वो अकेला एक गुफा में छिप कर रहता रहा। 1972 में जब पकड़े जाने के बाद उसको जापान भेजा गया तब उसने कहा, “यह बड़ा लज्जाजनक है कि वो वापिस आ गया है।”

शोइची की जापान के सम्राट से कभी मुलाकात नहीं हुई लेकिन जब वह राजमहल के प्रांगण में गया तो उसने कहा, “हे सम्राट, मैं वापिस घर आ गया हूँ लेकिन मुझे इस बात का पश्चाताप है कि मैं आपकी सेवा ठीक से नहीं कर पाया हूँ। आज विश्व बदल गया है लेकिन आपकी सेवा करने की मेरी इच्छाशक्ति अभी भी नही बदली है।”

1977 में शोइची योकोइ पर, ‘Yokoi and His Twenty-Eight Years of Secret Life on Guam’ नाम की डॉक्यूमेंट्री भी बनी थी। शोइची 82 वर्ष की आयु जिया और 1997 में उसकी स्वाभविक मृत्यु हुई थी।

1974 में फिलीपीन्स के लुबांग द्वीप में मिले हीरू ओनादा की कहानी शोइची से भिन्न थी। हीरू जापानी सेना में इंटेलिजेन्स अधिकारी था जो फिलीपीन्स के लुबांग द्वीप में 1944 से तैनात था। उसकी तैनाती के कुछ महीनों बाद ही अमेरिका सेना ने फिलीपीन्स पर कब्ज़ा कर लिया था।

हीरू ओनादा को अपने उच्चाधिकारी से निर्देश मिले कि वो अपने साथियों के साथ द्वीप के अंदरूनी हिस्से में छिप कर अलाइड (अमेरिकी) सेना को परेशान करता रहे जब तक जापान की सेना पुनः वहां नहीं पहुंच जाती है। उसको सख्त आदेश दिए गए थे कि वो आत्महत्या नहीं करेगा, जापानी सेना वापस आएगी और तब तक, भले ही एक ही सैनिक बचा हो, उसको उसका नेतृत्व करना है।

हीरू ओनादा अपने उच्चाधिकारी के आदेशों का 1974 तक पालन करता रहा। इस बीच, द्वीप पर रहने वालों को इस बात का विश्वास था कि कोई जापानी सैनिक अभी भी जंगल में छिपा है क्योंकि इस बीच उसने करीब 100 लोगों को मारा या घायल किया था।

फिलीपीन्स की सरकार ने उसको वहां से निकालने का काफी प्रयास भी किया और यह बताने के लिए कि युद्ध समाप्त हो गया है, जंगल मे पोस्टर और पर्चे भी डलवाये लेकिन, हीरू ने इसको सिर्फ दुश्मन की चाल ही समझा। वह अभी भी अपने उच्चाधिकारियों के आदेश का इंतज़ार कर रहा था।

हीरू ओनादा की व्यथा का अंत मार्च 1974 में हुआ जब उसके भूतपूर्व कमांडिंग अफसर ने उसको उसकी ड्यूटी से मुक्त किया। इस प्रकार हीरू ओनादा वह दूसरा आखिरी जापानी सैनिक था जिसने आत्मसमर्पण किया था।

जापान आकर बदले हुए जापान ने उसको मानसिक रूप से विचलित कर दिया। वो वर्तमान के जापान में नहीं रह पाया और 1975 में ही ब्राज़ील चला गया, जहां 2014 में उसकी 91 वर्ष की आयु में मृत्यु हुई।

सन्दर्भ के लिए यह भी बता दूं कि दिसम्बर 1974 में ही इंडोनेशिया के मोरोटी द्वीप में जापानी सैनिक तेरुओ नाकामुरा मिला था, जो आधिकारिक रूप से आखिरी जापानी सेना का सैनिक था जिसने युद्ध समाप्त होने के 29 वर्ष बाद आत्मसमर्पण किया था। लेकिन वो ताइवान का रहने वाला था और वापिस जापान की जगह, वहीं चला गया था।

70 के दशक में हम लोगों के लिए यह पहेली थी कि सिर्फ तीन दशकों के भीतर जापान क्यों और कैसे अपनी चिता की राख से फिर उठ खड़ा हुआ, जबकि हम अभी भी लड़खड़ा रहे हैं।

हम लोग तब भी नहीं समझ पाए थे और आज भी नहीं समझ पाए हैं कि इस प्रश्न का उत्तर शोइची और हीरू जैसे जापानियों में छिपा है। यह किसी व्यक्ति विशेष के चरित्र की बात नहीं है, यह जापानी चरित्र की भी बात नहीं है, यह बात एक जापान के नागरिक की अपने राष्ट्र जापान के प्रति प्रतिबद्धता की है। यह बात, राष्ट्रीय चरित्र और उसके निर्माण की है।

राष्ट्र के प्रति इस प्रतिबद्धता व राष्ट्रीय चरित्र का महत्व इससे समझा जा सकता है कि अक्सर जनता उलाहना देती है व उद्वेलित हो प्रश्न करती है कि भारत, इज़राइल की तरह मुँहतोड़ जवाब क्यों नही जवाब देता है। इसका उत्तर यही है कि जनता की राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता व राष्ट्रीय चरित्र के अभाव में यह संभव नहीं है।

हम भारतीय तो बात बात पर अपने को महान कहते नहीं थकते हैं, हम अपने नेतृत्व पर बात बात पर अविश्वास व उसकी अवमानना करने में भी पीछे नहीं रहते हैं। हम बार बार अपने नेतृत्व से की गई अपनी अपेक्षा से ही पराजित होते रहते हैं। इसके बाद भी यह सब राष्ट्रीय चरित्र के निर्माण में सहायक हो सकते हैं, लेकिन भारतीयों का राष्ट्र के प्रति अपने दायित्वों की स्वभावतः ही उपेक्षा करने ने, उन्हें राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता से दरिद्र बना दिया है।

मेरा मानना है कि अपवाद स्वरूप कुछ भारतीय, शोइची और हीरू जैसे राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता रखने वाले ज़रूर हैं, लेकिन वृहत रूप से भारत के ज्यादातर लोग इससे पृथक हैं, क्योंकि हम चारित्रिक रूप से बेईमान हैं।

यह सुनने व स्वीकार करने में बुरा ज़रूर लगेगा लेकिन यह सत्य है। भारतीय पश्चिमी रेलवे ने इस अक्टूबर 2018 को एक रिपोर्ट पेश की है कि जिसमें भारतीयों को गौरवान्वित करने वाले कुछ तथ्य सामने रखे हैं।

सन 2017 में लम्बी दूरी की रेलवे गाड़ियों से 1 लाख 95 हज़ार तौलिया, 81 हज़ार 736 बेडशीट, 55 हज़ार 573 पिलो कवर, 5 हज़ार 38 पिलो और 7 हज़ार 43 कंबल चोरी हुये। इसी के साथ 200 टॉयलेट के मग्गे, 1000 टोंटी और 300 फ्लश पाइप पर भी हाथ साफ किया गया है।

अब आप ही बताइए आप कहाँ खड़े है? आपको आज के भारत और उसके नेतृत्व से पोथा भर के शिकायतें हैं लेकिन क्या आप अपने राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता रखते हैं? वैसे तो हम भारतीय ज्यादातर इस विषय में दरिद्र हैं लेकिन फिर भी ईमानदारी से इसका खुद को ही उत्तर देने की कोशिश कीजियेगा।

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