मनमोहन की घुटन, लाचारी और बेचारगी की कथा, ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’

‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’ फ़िल्म देखी। एक्सीलेंट फ़िल्म है।

अनुपम खेर ने एक इंटरव्यू में सच ही कहा था कि अगर आप यह फ़िल्म देखेंगे तो देखने के बाद आप को मनमोहन सिंह से प्यार हो जाएगा।

मनमोहन सिंह की घुटन, लाचारी और बेचारगी की कथा है ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। थोड़ी मेहनत की गई होती तो क्लासिक फ़िल्म बन सकती थी। लेकिन नहीं बन सकी है।

स्क्रिप्ट और निर्देशक की फ़िल्म नहीं है यह। सिर्फ़ दो अभिनेताओं की फ़िल्म है ‘द एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर’। अनुपम खेर और अक्षय खन्ना की फ़िल्म है यह। दोनों का अभिनय बेमिसाल है।

हालां कि अक्षय खन्ना कई जगह बहुत लाऊड हैं। पी एम ओ में कोई मीडिया सलाहकार इतना पावरफुल, इतना प्रभावी, इतना सक्रिय नहीं सुना है, जितना इस फिल्म में संजय बारू की भूमिका में अक्षय खन्ना दीखते हैं।

मनमोहन की पत्नी की भूमिका में दिव्या सेठ खूब फबी हैं। सोनिया की भूमिका में जर्मन एक्ट्रेस सुजैन बर्नर्टगर ने भी बढ़िया अभिनय किया है। प्रियंका गांधी की भूमिका अहाना ने अच्छी निभाई है। लेकिन राहुल गांधी की भूमिका में अर्जुन माथुर बिलकुल राहुल की तरह ही लचर हैं। स्क्रिप्ट और रिसर्च अच्छी होती तो यह क्लासिक फ़िल्म होती।

स्क्रिप्ट तो कमज़ोर है ही, रिसर्च वगैरह भी गायब है। पूरी फिल्म में सिर्फ एक नैरेटिव ही रचा गया है कि मनमोहन का रिमोट सोनिया गांधी के हाथ में था। सोनिया गांधी और अहमद पटेल इस फिल्म के मुख्य खलनायक हैं।

अभिनेताओं के अभिनय से इस एकमात्र नैरेटिव को स्टैब्लिश किया गया है। इस काम में निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे की मेहनत दिखती है। अभिनेताओं का मेकअप, बाडी लैंग्वेज पर गज़ब मेहनत की गई है। फिर भी फ़िल्म में मसाला नहीं है।

बावजूद इस के फिल्म में स्पीड बहुत है। पूरे दो घंटे फिल्म हिलने नहीं देती। कई जगह सेंसर बोर्ड की कैंची भी दिखती है। एक बात और… इस फिल्म में राहुल गांधी की भूमिका बहुत सीमित है। गिनती के कुछ दृश्य में ही हैं वह। लेकिन जब-जब राहुल परदे पर उपस्थित होते हैं, पिक्चर हाल में लोगों की सामूहिक हंसी छूटने लगती है।

नरसिंहा राव का निधन, अमरीका से परमाणु समझौता आदि के साथ अगर मनमोहन के आर्थिक उदारीकरण का भी विवरण होता तो बात कुछ और होती। कुछ ख़ास राजनीतिक घटनाक्रम भी जोड़े जा सकते थे।

जो भी हो फिल्म अपने आप में अच्छी है और अपने मकसद में पूरी तरह कामयाब भी। किस्सा कुर्सी का वगैरह फिल्मों से बहुत आगे की फिल्म है यह। बहुत बेहतर और बहुत सुलझी हुई। सच बताऊं तो मैं तो इस फिल्म को एक बार फिर देखना चाहूंगा।

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