बनना होगा अंधविरोधी मोतियाबिंद का सर्जन

तस्वीर में मेरे साथ दिख रहे बुजुर्ग जंगली पुत्र स्व. गरीब जो दिव्यांग भी हैं बस नाम के जंगली हैं लेकिन गरीबी इन्हें विरासत में मिली है, हालात के तौर पर भी और स्व. पिता के नाम के रूप में भी।

होने को इनके पास आज प्रधानमंत्री आवास योजना के लाभार्थी के रूप में चमकता पक्का घर भी है…. अब नाम जंगली है तो है, पिता का नाम गरीबी था.. तो था। वैसे भी कहते हैं नाम में क्या रखा है, आदमी का काम देखना चाहिए।

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले के कस्बा (टाउन एरिया) पिपराइच वार्ड संख्या 6 के निवासी जंगली दोनों पैरों और हाथों से दिव्यांग हैं। दिव्यांग पेंशन इन्हें हासिल है, वैशाखी विभाग ने दी है जिस पर खड़ा होकर बड़ी खुशी से बताते और दिखाते हैं अपना पक्का घर। रहते आये छप्पर में, सो आज भी अपने लिए इस छोटे छप्पर को बचा रखा है।

जंगली और उनकी पत्नी बताते हैं पहले इनके पास टिन शेड और छप्पर का घर था। आज दो बड़े कमरों के साथ बहुत ही अच्छे ढंग से सुसज्जित पक्का घर है। हैरानी होती है जब यह कहते हैं कि यह घर उन्हें प्रधानमंत्री आवास योजना में मिला है।

फिर खुद ही चमकते चेहरे के साथ बताते हैं… साहब जब एक मात्र कमाने वाले बेटे ने टिन शेड पर एक कमरा पक्का बनवाना शुरू किया तो स्थानीय पार्षद ने उन्हें पीएम आवास योजना की जानकारी दी।

आगे जंगली की 14 क्लास तक पढ़ी उनकी बेटी बताती है (मां ने उसका परिचय कराते हुए कहा 14 ले पढ़ले बाटी)… भाई ने एक कमरा पीछे की तरफ से बनवाना शुरू करने के साथ ही योजना में घर के लिए आवेदन कर दिया।

विभागीय सर्वे आदि की औपचारिकता पूरी होने के साथ ही इस परिवार को पात्रता के आधार पर घर के लिए दो किश्तों में 2.50 लाख रुपये मिल गए जिससे आगे के एक कमरे का निर्माण हुआ जो सजधज कर तैयार है।

जंगली के परिवार की बढ़ी हिम्मत और हौसले ने दूसरे कमरे को अपने खून-पसीने से बनाया, अभी भी दीवारों पर प्लास्टर और फर्श बाकी है। जंगली की पत्नी कहती हैं, दो-चार महीने में इसको भी बनवा लेंगे।

ऐसा नहीं है कि सरकारी योजनाएं पहले देश में नहीं रहीं। यह भी सच नहीं कि देश में शौचालयों, आवासों का निर्माण नहीं हुआ। इंदिरा आवास योजना इसी प्रधानमंत्री आवास योजना का पुराना नाम है। लेकिन इंदिरा आवास के तहत बने घरों का शायद ही कहीं अस्तित्व मिले। शौचालय भी बने लेकिन उनका उपयोग उपले, लकड़ी रखने में होता रहा।

बात यह महत्वपूर्ण यह हो जाती है कि सरकारी योजनाएं ज़मीन पर कितनी व्यवहारिक हैं। अब ग्रामीण, अर्धशहरी और शहरी इलाकों में वर्तमान सरकार की पीएम आवास योजना को ही लें।

पात्र लाभार्थी का ईमानदारी से चुनाव कर उसके बैंक खाते में सीधे नगदी का भुगतान लाभार्थी को अपने सपनों के घर को अपनी सरकार की मदद से बनाने की भौतिक और भावनात्मक छूट, आज़ादी देता है।

उसे यह भय नहीं कि कमीशन आदि के बाद बाकी बचे रुपयों में कोई ठेकेदार एक तय नक्शे और तय गुणवत्ता का घर का ढांचा खड़ा कर चला जाएगा जिसके बनते ही उसके टिक पाने की फिक्र ने उसे कभी लाभार्थी द्वारा इस्तेमाल से दूर रखा।

शौचालय भी बने… लेकिन खराब निर्माण, इस्तेमाल के लायक न बन पाने और खुले में शौच की संस्कृति ने इसे भी अपनाने से दूर रखा। आज शौचालयों के निर्माण के साथ ही इसका इस्तेमाल भी हो रहा है। यहीं स्वच्छ भारत जैसे राष्ट्रीय अभियानों के परिणामों को ज़मीन पर फलीभूत होते देखा जा सकता है।

घर भी अब महज सरकारी योजना में बना ढांचा नहीं, बल्कि बिजली कनेक्शन और पात्रता के अनुसार उज्ज्वला जैसी योजना के तहत गैस चूल्हे से सुसज्जित होकर लाभार्थी को हासिल हो रहा है तो उसके जीवन यापन की शैली में गुणात्मक सुधार दिख रहा है, न कि कभी न खत्म होने वाले सरकारी योजनाओं की बंदरबांट या खानापूर्ति।

मिट्टी-खड़ंजे से पक्की में तब्दील होती सड़कें, जगह-जगह मजरे-टोले-गांव के बाहर लगे ‘सौभाग्य योजना’ (प्रधानमंत्री सहज हर घर बिजली राष्ट्रीय योजना) और प. दीनदयाल राष्ट्रीय ग्रामीण विद्युतीकरण योजना के रिपोर्टकार्ड देते बोर्ड, योजनाओं को समग्रता से ज़मीन तक उतरने और पात्रों तक सफलता से पहुंचने की गवाही देते हैं।

राष्ट्रीय योजनाओं की सफलता बहुत हद तक प्रदेश सरकारों की सक्रियता और सहयोग पर निर्भर होती हैं। जहां भी इन योजनाओं की सफलता ज़मीन पर दिखती है उसके पीछे संबंधित राज्य सरकारों की साफ नीयत और सम्बंधित विभागों के अधिकारियों, कर्मचारियों की मेहनत भी खड़ी दिखती है। वे सभी भी साधुवाद के पात्र कहे जाने ही चाहिए। उत्तर प्रदेश को योगी आदित्यनाथ के रूप में युवा और विकास को समर्पित नेतृत्व मिला है जो विकास की इन योजनाओं को साकार करने और गति देने में सक्षम ही नहीं बल्कि सफलता के साथ सतत क्रियाशील है।

2014 के लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और चार साल सफलता से देश में विकास के लिए समर्पित रहने के बाद, यह देखना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जायेगा कि अपने-अपने संकीर्ण राजनैतिक-वैचारिक-मज़हबी कारणों से अच्छे दिनों से दूर और अंधविरोध की नीयत से मजबूर कुछ जमातों को ज़मीन पर उतरती योजनाओं और लाभार्थियों तक पहुंची सुविधाओं को न देख पाने का गंभीर प्रायोजित मोतियाबिंद है।

चलते-चलते जंगली की बेटी ने कहा स्थानीय विधायक से वर्षों पहले मिली ट्राई सायकिल टूट चुकी है क्या यह भी मिल सकती है?

जिलाधिकारी कैंप कार्यालय से फोन कर जिला दिव्यांगजन सशक्तीकरण अधिकारी का नंबर लिया गया और अधिकारी श्रीमती मीनू सिंह से पात्र लाभार्थी के बारे में ट्राइसाइकिल आवेदन के बारे में पूछा गया।

अधिकारी महोदय ने जंगली की बेटी से बात की, नंबर उसे देकर पिता के साथ गोरखपुर महोत्सव बीत जाने के बाद कार्यालय आने और आवेदन देने को कहा गया। अधिकारी ने बताया कि पर्याप्त ट्राइसाइकिल मौजूद है, 15 कार्यदिवस में लाभार्थी को मिल जाएगी।

अन्धविरोध की मानसिकता वाले मोतियाबिंदों के सामने जंगली जैसे उदाहरण एक सर्जन के रूप में इलाज के लिए हासिल होते रहें इसके लिए हर घर, गांव, मजरे, टोले, शहर…. आबादियों में ‘जंगली’ देश के सामने रखे ही जाने चाहिए। ऐसा करना एक ज़िंदा समाज के तौर पर हर सरोकारी नागरिक की नैतिक ज़िम्मेदारी है, जिसका निर्वहन ही नागरिक धर्म है।

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