फिर न आ जाए, आतंकियों के साथ खड़ी होने वाली सरकार

वह मेरे कॉलेज का मित्र था, मेरे साथ फौज जॉइन किया था। बल्कि मेरे फौज जॉइन करने में उसके जोश का बहुत बड़ा हाथ था।

हम दोनों एक साथ इंटरव्यू देने गए थे। दोनों को एक साथ जॉइनिंग लेटर आया था। मैं दुविधा में था, जाऊँ या नहीं। उसने कहा – यार मिश्रा… जिंदगी में एक बार यह वर्दी तो पहननी चाहिए…

हम दोनों ने एक साथ ट्रेनिंग की। दोनों की पोस्टिंग नार्थ ईस्ट में आई एक साथ। मैं नागालैंड में था, वह मणिपुर में।

और 15 अगस्त 1998 को इम्फाल में आतंकियों ने उसकी गाड़ी को एम्बुश कर दिया… कैप्टन अजय सिंह 29 वर्ष की उम्र में शहीद हो गया।

बाद में एक और बुरी खबर मिली। उसकी पत्नी को जब यह खबर मिली तो सदमे से उनकी मृत्यु हो गई। उसकी दो बेटियाँ थीं, अनाथ हो गईं…

यह अकेली कहानी नहीं है। उन दिनों फौज की यह एक आम कहानी थी। एक आतंकी होना एक फौजी होने से कम जोखिम का काम था…

बहुत मेहनत और प्रयास के बाद स्थितियाँ बदली हैं। मोमेंटम अपने फेवर में बना है। पिछले पाँच वर्ष सेना के लिए बहुत बेहतर हुए हैं।

पहली बार ऐसा हुआ है कि सीमा पर हमारी फौजें भारी पड़ती हैं। उस पार से आतंकी बॉर्डर क्रॉस नहीं कर सकते। 1700 आतंकी मारे गए हैं। पत्थरबाज़ों को सेना गोली मार रही है और उसके लिए किसी को जवाब देने की जरूरत नहीं पड़ रही है।

आपकी व्यक्तिगत अपेक्षाएँ चाहे जो भी रही हों, इसमें कोई शक नहीं कि आज के पहले इस तरह कोई सरकार कभी सेना के साथ नहीं खड़ी हुई। अगर चूके तो फिर वही सरकार आएगी जो आतंकियों के साथ खड़ी होगी, और अपने सैनिक मारे जाएंगे।

फिर एक बार, भाजपा सरकार…

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