The Accidental Prime Minister बताती है कि क्या और कैसी बला हैं सोनिया

स्वतंत्र भारत के राजनीतिक इतिहास के सर्वाधिक दूषित दौर, कलंकित कालखण्ड का जो आंखों देखा वर्णन संजय बारू ने अपनी 318 पृष्ठों की पुस्तक में 5 वर्ष पूर्व 2014 में किया था उसे केवल 110 मिनट की फ़िल्म में ज्यों का त्यों प्रस्तुत कर दिया जाएगा, यह सम्भव ही नहीं है।

इस तथ्य को मैं समझता था क्योंकि संयोग से 2014 में जब यह किताब बाज़ार में आयी थी तब ही इसे पढ़ चुका हूं। इसलिए The Accidental Prime Minister फ़िल्म से ऐसी कोई अपेक्षा मुझे थी भी नहीं।

लेकिन पटकथा और संवाद लिखने वालों की 5 सदस्यीय टीम तथा निर्देशक विजय रत्नाकर गुट्टे ने भारतीय राजनीति के उस सर्वकालीन सर्वाधिक दूषित दौर, कलंकित कालखण्ड के सार को जिस ईमानदारी और कुशलता के साथ केवल 110 मिनट में समेटकर प्रस्तुत किया है वह उनके लेखकीय निर्देशकीय कौशल का श्रेष्ठ उदाहरण है।

चूंकि लगभग 5 साल पहले किताब पढ़ चुका हूं इसलिए आज फ़िल्म देखने के बाद कह सकता हूं कि सागर को गागर में भरने का प्रयास किया गया है। यह प्रयास इतना सफल रहा है कि किताब मुझे दोबारा खरीदनी पड़ेगी क्योंकि मेरे एक अत्यन्त वरिष्ठ पत्रकार मित्र ने कुछ वर्ष पूर्व पढ़ने के लिये मुझसे मांगी The Accidental Prime Minister किताब को वापस करना उचित नहीं समझा था।

अतः गहन राजनीतिक रुचि, जानकारी और समझ वाले लोगों के लिए तो यह फ़िल्म देखना शत प्रतिशत एक सुखद अनुभव ही होगा। साथ ही साथ एक सामान्य नागरिक को यह फ़िल्म इसलिए देखनी चाहिए क्योंकि यह फ़िल्म बहुत सरल शैली में भलीभांति यह समझाती बताती है कि उस दूषित दौर कलंकित कालखण्ड के दौरान जो आदमी देश चला रहा था, उस समय उस आदमी को एक बला और उसके बेईमान चमचे कितनी निर्लज्जता और निर्ममता से चला रहे थे।

चारणों/ चाटुकारों द्वारा पिछले 20 वर्षों से अलापा जा रहा सोनिया गांधी के त्याग तपस्या बलिदान का राग सरासर सफ़ेद झूठ के सिवाय कुछ नहीं है। The Accidental Prime Minister फ़िल्म की सबसे बड़ी सफलता और प्रासंगिकता यही है कि यह फ़िल्म खुलकर यह बताती है कि क्या और कैसी बला है सोनिया गांधी।

इस फ़िल्म में अपने अभिनय से अनुपम खेर एक बार पुनः अपने चरम पर दिखाई देते हैं। लेकिन इस फ़िल्म संजय बारू की भूमिका में अक्षय खन्ना छा गए हैं। और सोनिया गांधी की भूमिका में सुजेन बर्नेट वास्तव में कमाल कर गयीं हैं।

देर से सोकर उठने की अपनी आदत के चलते लगभग 30-32 वर्ष बाद फर्स्ट डे फर्स्ट शो देखने के अपने 3-4 दशक पुराने शौक की आज की गई पुनरावृत्ति में मुझे काफी कष्ट हुआ, लेकिन फ़िल्म देखने के पश्चात उस कष्ट की अनुभूति काफूर हो चुकी थी।

आप भी अवश्य देखें।

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