दस प्रतिशत का नियम

आजकल प्रगतिशील, बुद्धिजीवी और भारतीयों की धार्मिकता को जहालत मानने वाला धड़ा मौन है।

मोदी-शाह की कट्टरता पर विमर्श थम गया है, मंदिर बने या ना बने… यहाँ बने या वहाँ बने… की थेथरई खामोश है, दलित चिन्ता में जाज्वल्यमान चिरागों की रौशनी बेनूर है।

राहुल की प्रौढ़ता और रफ़ाएल पर उनकी तोल मोल कर बोलने वाली ज़ुबान मनमोहन मोड पर जा चुकी है, टमाटर प्याज़ के भाव पर जनता की निगाहों का चैनलीय क्रन्दन लुप्त प्राय है… और क्या कहें सीमा पर भी शान्ति ही बरस रही है।

पर सवाल अब भी चस्पा है कि आखिर हुआ क्या कि मोदी जी की विदेश यात्रा, 15 लाख खाते में न आने के शिकवे गिले, राहुल से उनके आँखें ना मिलाने की क्षमता, प्राइम टाइम में मोदी निन्दा पारायण, सब के सब पता नहीं कहाँ खो गये… क्योंकि इस बार भारतीय संवैधानिक इतिहास की अभूतपूर्व घटना हुई और वह थी आर्थिक मुद्दे पर सभी को 10% का अतिरिक्त आरक्षण।

भारतीय नेताओं के अभाजपाई खेमे में पिन ड्रॉप साइलेन्स है बस इस सदमे के साथ कि “हाय ये बात हमें क्यों न सूझी?” उस पर से कोढ़ में खाज़ ये कि भाजपाई अल्पमत से जूझते राज्य सभा में भी यह संविधान संशोधन विधेयक पारित हो गया।

ये भारतीय राजनीति का गुड़ लगा हँसिया है न छोड़ते बन रहा है ना चूसते। मिठास तो है पर भविष्य में जीभ को मिलने वाली हँसिये की तेज़ धार का स्पर्श जीभ को दुधारी न बना दे या ज़ुबान दोगली ना कर दे?

मुलायम, मायावती, जीतन राम, रामविलास आदि दलितों के मसीहाओं के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ रही हैं कि दूरगामी संवैधानिक चिंतन से निकला ये छोटा सा कंकड़ न जाने कितने राजनीतिक घड़ों को फोड़ेगा।

अब मोदीफ़ोबिया पीड़ित जननायकों के हाथ एक दूर की कौड़ी ये लगी है कि आठ लाख वार्षिक आमदनी से नीचे पाने वाले परिवार और शहर में एक छोटे प्लाट या भवन (वास्तविक सीमा के लिये समाचार पत्रों, पत्रिकाओं या गूगल की सहायता लें) का मालिकाना हक वाले परिवार का आवेदक यह आरक्षण हासिल करने का हक़ रखता है, तो आयकर देने की निम्नतम सीमा ढाई लाख से शुरू क्यों?

क्यों आठ लाख वार्षिक पारिवारिक आय वाले घर का आवेदक गरीब माना जाये और ढाई लाख से ज्यादा कमाने वाला अमीर घोषित होकर आयकर के दायरे में मान लिया जाये! ये शिगूफ़ा इस सत्ता विरोधियों के मुँह से जितना फैले उतना अच्छा क्योंकि इसका प्रसार पूरे समाज को एक नये चिंतन में डाल देगा। पर उस चिंतन की बात पर चर्चा आगे होगी।

इस विधेयक का पहला अच्छा प्रभाव तो सवर्णों की उस सोच पर पड़ेगा कि एस-सी एस-टी एक्ट की वज़ह से जो सरकार उन्हें अपने लिये असंवेदनशील दिखती थी वह अब समानुभूति वाली दिखेगी। अनारक्षित कोटि के आवेदकों को भी आरक्षण पूर्ण व्यवस्था में अपना एक हितैषी दिखेगा और रोजगार खोज के कुरुक्षेत्र में खुद के कर्ण जैसा कवच कुण्डलहीन होने का एहसास कम होगा।

शायद जाति, संप्रदाय और अल्पसंख्यकत्व की आड़ में सुरक्षित तबके से शायद अनारक्षित तबके का वैचारिक और प्रतियोगिताजन्य संघर्ष थोड़ा कम हो जायेगा। बहुजन सुखाय की नीति पालन करने वाली पार्टियाँ सर्वजन हिताय की ओर मुड़ने लगेंगी। जातिगत छूआ छूत, सामाजिक पिछड़ापन, स्त्री विमर्श और विकलांगता के साथ साथ आर्थिक पिछड़ापन भी चुनावी गणित का प्रमुख बिन्दु बनेगा।

अब फिर लौटते हैं आरक्षणवादी विमर्श में आठ लाख की पारिवारिक आय सीमा के मामले पर कि इससे क्या फायदा होगा? ये आर्थिक सीमा निर्धारित होने से जातिगत आरक्षण वाले तबके में भी ये विमर्श आकार लेगा कि इस सुविधा से करोड़पति और अरबपति बना परिवार अब आरक्षण का हक़ क्यों ना छोड़े?

क्यों एससी एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक कोटे से आइ-ए-एस सेवा, बैंकिंग, पॉलिटिक्स, व्यापार आदि में आर्थिक रूप से पूर्ण समृद्धि प्राप्त परिवार आखिर कब तक आरक्षण का लाभ उठाये, जबकि आर्थिक रूप से पिछड़ावर्ग की अधिकतम आमदनी रु० 8,00,000 से ज़्यादा वार्षिक नहीं होना चाहिये?

और जब 8,00,000 रूपए से अधिक कमाने वाला परिवार एक तबके के लिये आरक्षण प्राप्ति के हक से महरूम मान लिया जाये तो अन्य मामले में यही बात लागू क्यों नहीं? ज़्यादा आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि 2 या 3 सालों में या पहले ही ऐसी एक-दो पीआइएल दायर हो जायें इस आर्थिक आरक्षण के आलोक में और हर स्तर से एक क्रीमी लेयर बाहर हो जाये।

लेखक भविष्यद्रष्टा होने का दावा तो नहीं कर सकता पर ये आर्थिक मुद्दे पर मिलने वाला आरक्षण कान में घुसे पानी को निकालने वाला बाहर से डाला गया अतिरिक्त पानी है जो पहले से जमे हुए पानी को कान से बाहर निकालने में सहूलियत कर देता है। आरक्षण के नाम पर दलित विमर्श करने वाले और अपनी जाति को ओबीसी में शामिल करने की मंशा रखने वाले उपद्रवी समूहों पर भी एक लगाम लगने लगेगी।

दरअसल 10 प्रतिशत का नियम लिण्डेमान का नियम है जो बताता है कि उपभोक्ता जीव को उसके खाद्य पदार्थ में उपस्थित ऊर्जा का मात्र 10% ही प्राप्त होता है। उदाहरण के लिये सूर्य से प्राप्त 100% ऊर्जा समायोजित करने वाली वनस्पतियों को खाने वाले शाकाहारियों को मात्र 10% ऊर्जा प्राप्त होगी जबकि उन शाकाहारियों को खाने वाले मांसाहारियों को मात्र 1% ऊर्जा। अगर उन मांसाहारियों को कोई जीव खा ले तो उसे मात्र 0.1% ऊर्जा मिलेगी।

अगर इस नियम की नज़र से इस आरक्षण व्यवस्था को देखा जाये तो सुविधाएं मात्र दशमांश प्रभाव ही उत्पन्न करती हैं जबकि अगले स्तर पर मात्र शतांश। इससे आगे बढ़ने पर सहस्रांश प्रभाव ही दृष्टिगोचर होगा। अगर आरक्षण की आड़ में प्रगति को मापा जाये तो मात्र दसवाँ हिस्सा ही अर्जित होगा जबकि अपनी क्षमता से अर्जित प्रगति शतप्रतिशत होती है।

इस साल के आरंभ में लागू यह आर्थिक आरक्षण विधेयक अखिल भारतीय परिवेश में भारतीयों के लिये एक दृगोन्मेषी क्रान्ति सदृश होगा जो सहज प्रगति और आरक्षण के सहारे प्राप्त प्रगति पर विमर्श को आगे बढ़ायेगा जो अंततः आरक्षण द्वारा स्थापित रिज़र्विंग ऑपर्च्यूनिटी को डिज़र्विंग ऑपर्च्यूनिटी में बदल देगा।

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