बिना कुछ किए, बिना कुछ दिये, बवाल करते हम

उद्वेलित और उतावले हो कर नरेंद्र मोदी को कोसने वाले नेकनीयत हिंदुओं से इतनी ही प्रार्थना है कि देखिये कहीं काँग्रेस आप का इस्तेमाल तो नहीं कर रही?

‘चार साल बहुत होते हैं’, ऐसा कहने वालों से इतना ही कहूँगा कि किसी खाये पिये सभी तरह से कमाए बड़े सरकारी हाकिम से पूछिये कि जहां पूरा सिस्टम अपने स्वार्थ के कारण विरोध कर रहा हो वहाँ चार साल कितना मायने रखता है।

अगर वो सफल ब्यूरोक्रेट है और आप के इरादे जानता है तो आप से मिलेगा ही नहीं। अगर कहीं भटक ही गया तो चेहरे पर से मुस्कान का मुखौटा रत्तीभर भी हिलाये बिना आप की बात कहाँ भटका देगा आप को पता भी नहीं चलेगा।

जितने बदलावों की आप बात उठाएंगे, वहाँ ऐसे ऐसे नियम पेश कर देगा कि आप को लगेगा कि आपकी जानकारी बहुत अधूरी है। और कुछ नहीं तो कह देगा कि ये उसके डिपार्टमेन्ट का विषय नहीं है इसलिए उसपर कोई टिप्पणी करने को वो असमर्थ है।

हमारे शत्रु हमसे बहुत अधिक धैर्य रखते हैं, अपने काम चुपचाप करवा लेते हैं। हम केवल निजी मामलों में साम दाम दंड भेद से परहेज़ नहीं करते, सार्वजनिक हित में ऐसा करने की कोई व्यवस्था है ही नहीं।

जो भी संगठन हैं उन्हें हम केवल कोसते हैं कि वे हमारे लिए हम जो कहें वह करें। किस अधिकार से कोसते हैं, समझ में नहीं आता। न हम उनसे किसी तरह से जुड़े हैं, न कोई नियमित बड़े दाता हैं।

यूं कहो तो विरोधी खेमे के लोग जब कहें तो मोर्चों की संख्या बढ़ाने आ जाते हैं, हमारे लिए रविवार के दिन भी अगर पत्नी को कहीं घूमने चलना है तो वो बात अधिक महत्व की होती है। और रही बात आर्थिक सहयोग की, तो वहाँ तो कंपल्सरी ही है और उसके ऊपर लोग स्वेच्छा से भी बड़ी रक़में देते हैं और कोई सवाल नहीं करते।

और हम? बिना कुछ किए, बिना कुछ दिये, बवाल करते हैं, क्या नहीं?

बाकी यह तो केवल उन बंधुओं के लिए लिखा है जिनकी नीयत पर कोई शक नहीं। बाकी जिनका स्वार्थ नहीं सधा, या जिनका नुकसान हुआ हो वे अपना काम करते रहेंगे, विधर्मियों और वामियों की अपनी प्रतिबद्धताएँ हैं, वे भी अपने निर्धारित मार्ग पर चलते रहेंगे – काश हम उनके जैसे प्रतिबद्ध होते।

और जो लोग चुनावों के पहले नोटा नोटा कर रहे थे और ये कह रहे थे कि ऐसा थोड़े ही है कि काँग्रेस ही आएगी, या फिर ये कह रहे थे कि काँग्रेस के आने से डराइए मत – अब जो काँग्रेस ही आई है और जो रंग दिखा रही है – और फिर भी ये लोग नोटा नोटा कर रहे हैं तो फिर इनको पहचान जाना मुश्किल नहीं है।

बाकी आप को सोचना है। आप के बच्चों के लिए। देश छोड़कर इतर आप बाहरी ही कहलाएंगे। और यहाँ अगर डटकर प्रतिकार नहीं किया तो अबकी बार धर्मांतरण का विकल्प नहीं होगा, उनकी संख्या ही इतनी होगी कि आप को जोड़ना बोझ होगा और बोझ पालना किसी को पसंद नहीं होता।

आप के घर के महिलाएं बचेंगी या नहीं यह भी उनकी उपयुक्तता पर निर्भर होगा – उम्र, रूप, रंग, आदि। बाखड़ी गाय का भागधेय तय होता है। यहाँ केवल गाय को माँ नहीं कह रहा हूँ, आप की माताजी की भी बात कर रहा हूँ, या अन्य जो भी अधेड़ से ऊपर उम्र की महिला हो।

तस्मादुत्तिष्ठ!

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