…पर ऐसा कमीनापन कहां से लाओगे!

कमाल का देश है न हमारा! जिस देश के कण-कण में श्रीराम हैं, जिस देश की माटी, मानुष, मन, मेधा और मनीषा के पोर-पोर में प्रभु राम हैं, वह देश प्रभु राम के अस्तित्व पर बहस कर रहा है।

अंग्रेज़ों की दी गयी घटिया कानून-व्यवस्था की विरासत-स्वरूप जो कोर्ट हमें मिल गए हैं, वहां श्रीराम के घर मिलने या न मिलने को तय किया जा रहा है।

आखिर, कोर्ट का जो यह घटिया नाटक चल रहा है, वह और क्या है?

कभी कुकर्मी कांग्रेसी उठते हैं और शपथपत्र देकर राम के अस्तित्व से इंकार कर देते हैं (चलो मान लिया कि उस समय वेटिकन का शासन एक इतालवी महिला के जरिए इस देश पर था, किंतु अंजाम देनेवाले हाथ किसके थे?), तो कभी जिहादी हबीब मंदिर की खुदाई के बारे में झूठ-दर-झूठ पेश करते हैं, अब तारीख पर तारीख का असंभव प्रहसन यह देश देख रहा है…

अद्भुत! असंभव! अकल्पनीय!

एक कपिल सिब्बल है। वह कहता है कि फैसला चुनाव के बाद होना चाहिए। एक धवन है। उसने अपना कोट उतार फेंका था (या उससे उतरवा लिया गया था) यानी वह वकालत करने से रोका गया था। उसको इलहाम हुआ कि पांच न्यायाधीशों के पैनल में चूंकि एक न्यायाधीश पहले कल्याण सिंह के वकील थे, तो उनका पैनल में होना ठीक नहीं है।

बहुत कायदे, तर्क और सिद्धांत की बात कही है, रागा के इस दरबारी ने। हालांकि, वेदांती जी ने इससे सही पूछा कि इसके तर्क से तो मुख्य न्यायाधीश को भी कुर्सी छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि उनके पिता कांग्रेसी मुख्यमंत्री थे!

उसी तर्क से कपिल सिब्बल और अभिषेक मनु सिंघवी को वकालत छोड़ देनी चाहिए.

उस तर्क से किसी भी न्यायाधीश को फैसला नहीं सुनाना चाहिए, क्योंकि वे सभी कभी-न-कभी किसी न किसी के वकील रह चुके हैं।

पाड़ा के पिद्दी खैर, तर्क मान लें तो बात ही क्या है…

अद्भुत! असंभव! अकल्पनीय!

उधर मियांजी लोग हैं। एक से एक इलहामी। कोई बाबर को पूरे भारत की थाती बताता है, कोई उस ढांचे को ही शहीद का दर्जा दे रहा है। 1947 को अभी 100 साल भी नहीं बीते हैं, लेकिन इन लोगों की हनक, अकड़ और धमक तो देखिए।

आंखों में इस बात की ज़रा सी भी शर्म नहीं कि मात्र 70 साल पहले कितनी हवस और निर्लज्जता से इन्होंने मादरे-वतन का पहलू चाक कर दिया था, अपने हमवतन करोड़ों को जिबह कर ट्रेन में डाल दिया था, अपने हमसायों की औरतों पर न कहनेवाले जुल्म किए थे और सितम तो यह कि ये ही डरे हुए हैं… ये ही सेकुलर हैं…

अद्भुत! असंभव! अकल्पनीय!

मैं एक सनातनी और गर्वित हिंदू हूं। अयोध्याजी का मंदिर मेरे लिए मुद्दा नहीं है। इसलिए नहीं है कि मैं घोर आस्तिक हूं। जानता हूं कि प्रभु की इच्छा के खिलाफ कुछ नहीं होता।

शायद वे ही नहीं चाह रहे अभी तिरपाल से निकलना।

शायद, वे ही अपने भक्तों को बिल्कुल आखिरी सिरे तक पहुंचाना चाह रहे हों – असंतोष और विद्रोह के…।

आखिर, ऐसे ही एक दिन वह ढांचा गिरा था…

जब लाखों रामभक्तों का सब्र जवाब दे गया था…

तब पांच प्रांतों की सरकारों को कांग्रेसी हुकूमत ने लीला था, लेकिन, कलंक का वह दाग मिट गया…

शायद, वह सब्र फिर से जवाब दे जाएगा…

और क्या पता, वह दिन शायद निकट भविष्य में ही हो…

प्रभु की इच्छा, प्रभु जानें…

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