धर्मान्तर, राष्ट्रान्तर ही होता है! कैसे? देखिए…

बात निकली है, बहुत दूर तलक जाएगी ही…

“तुम्हारा शिवाजी यह किला कभी भी जीत नहीं पाया” – गोल टोपी पहना हुआ बारह – पंद्रह साल का एक मुस्लिम लड़का उस आदमी को बड़े रुबाब से सुना रहा था और वो आदमी निर्विकार भाव से सुन रहा था।

मुरुड का जंजीरा किला देखने जाओ तो यह अनुभव मिलता है। स्थानीय लड़के ‘गाइड’ बनने की ज़िद करते हैं। बहुत से लोग उन्हें झिड़क देते हैं, लेकिन कुछ होते हैं जो उनकी गाइडेंस ले लेते हैं। तब बड़े अभिमान से यह लडके उन्हें उपरोक्त जुमला सुनाते हैं।

वहीँ किले पर घूमते घूमते मुझे इस लडके के शब्द सुनाई दिए तो मैं अपने को रोक नहीं पाया। उसके ग्राहक के पास गया और कहा, “ये सच कह रहा है, लेकिन शिवाजी तो असंख्य किलों के अधिपति रहे, और ये सिद्दी कौन था, एक किले के बल से पूरे कोंकण को परेशान करनेवाला एक समुद्री चूहा!”

मेरे इस वाक्य का उस व्यक्ति पर कुछ भी परिणाम नहीं हुआ, उसका चेहरा पहले जैसा ही निर्विकार था, पर वो लड़का – भड़का ! मेरी गोली सही जगह लगी थी।

“धर्मान्तर, राष्ट्रान्तर ही होता है!” यह वीर सावरकर जी के सिद्धांत का झन्नाटेदार प्रत्यय ऐसे छोटे छोटे प्रसंगों से भी आता है।

यह एक मराठी लेख के प्रथम तीन परिछेदों का अनुवाद था।

फेसबुक पर कहीं पढ़ी एक छोटी सी पोस्ट थी “क्या किसी धर्म को उनके बदल जाने से खतरा हो सकता है, जो राशन कार्ड और एक टुकड़ा ज़मीन के लिए ‘हिन्दू’ ‘मुसलमान’ और ‘इसाई’ बनते रहते हैं?”

दिखने में यह छोटी सी पोस्ट मेरे लिए विश्लेषण का विषय क्यों बनती है?

बात निकली है, बड़ी दूर तलक जाती है…

Jews जिन्हें यहूदी भी कहा जाता है, खुद को हमेशा ‘नेशन ऑफ़ इज़राइल’ कहते हैं। जब वे मिस्र में गुलाम थे, तब भी। वैसे खुद को वे 12 कबीले मानते हैं (12 Tribes)। इनके धर्मग्रंथ के अनुसार अब्राहम को ईश्वर ने वरदान दिया कि तुम्हारा वंश एक महान राष्ट्र होगा। यहूदियों के मुताबिक़ ईश्वर ने यह आश्वासन उसके बेटे Isaac के वंशजों के बारे में दिया था। अब्राहम को और भी एक पुत्र था जिसका नाम था Ishmael. उसके वंशजों के विषय में भी यही बात है। अरब खुद को उसका वंशज मानते हैं।

Isaac का बेटा Jacob समय चलते Israel कहलाया। उस के 12 पुत्र हुए जो 12 Tribes of Israel के पूर्वज माने जाते हैं और उसके वंशज खुद को हमेशा इज़राइल या ‘नेशन ऑफ़ इज़राइल’ ही कहते आए है।

यहूदी खुद को ईश्वर के चुने हुए लोग मानते हैं और उसके प्रणीत धर्म के नेक बन्दे। यहूदी माता-पिता की संतान ही यहूदी हो सकते थे, अन्य को यहूदी होना संभव नहीं था (अब होने लगा है ऐसा पढ़ा है, पक्की मालूमात नहीं)। यह धर्म में भी प्रेषित होते थे।

सदियों बाद इस्लाम आया। ह. मुहम्मद ने प्रेषित होने का दावा किया और साथ में यह भी ऐलान किया कि पूर्व प्रेषितों के सभी अनुयायी (यहूदी और इसाई) अब उन्हें अपना लास्ट एंड फाइनल प्रेषित माने।

दोनों ने मानने से मना कर दिया तो उनसे दुश्मनी ले ली और उनसे ता कयामत दुश्मनी अपने अनुयायियों के लिए फ़र्ज़ बना दिया।

जहाँ यहूदी अपने 12 कबीलों को राष्ट्र संबोधित करते रहे, मुसलमानों ने तो उनसे भी बढ़ कर सिक्सर मार दी। दर–उल–इस्लाम की व्याख्या कर के उन्होंने तो इस्लाम को पूरे विश्व का अधिपति बनाने की उदघोषणा कर डाली, सिर्फ एक नेशन होने से उनका मन भरा नहीं!

फर्क समझ लें, एक कट्टर मुस्लिम की नज़र में इस्लाम विश्व का धर्म नहीं, सत्ताधीश है। वह मुसलमान अल्लाह का कहा मान रहा है और उसकी सत्ता कायम करने में अपना फ़र्ज़ निभा रहा है।

जहाँ ऐसी सत्ता नहीं है वहां उसे लाने में वो मददगार होना चाहता है। उसकी नज़र में गैर मुस्लिम राष्ट्र में जो मुसलमान रहते हैं, वे अपने आप में दर–उल–इस्लाम हैं, इस्लाम की दुनिया का हिस्सा है – उस राष्ट्र के भीतर एक अलग मुल्क!

अब जब तक आप अपने कायदे – कानूनों से ही चलने की मुसलमानों की ज़िद को इस नज़रिए से नहीं देखेंगे, बात की असलियत – और अहमियत भी – समझ में नहीं आएगी। जब देख पायेंगे, बहुत सारे राज़ खुलते नज़र आयेगे।

सावरकर जी की भेदक नज़र से यह राज़ छुपा न था। इसीलिए उन्होंने एक घोषणा द्वारा इस भेद को उजागर किया “धर्मांतर म्हणजेच राष्ट्रांतर“ – धर्मांतर, राष्ट्रांतर ही होता है!

उम्मीद है मेरा भाव आप समझ गए होंगे।

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