8-9 जनवरी 2019 : भारत के कपाल पर मोदी ने लिखी अमिट पाती

भारत में पिछले 3 दिनों में जो कुछ घटा है उसने भारत के कपाल पर एक ऐसी अमिट पाती लिख दी है, जिसके गूढ़ निहितार्थों को स्वीकार करने का सामर्थ्य शायद वर्तमान के पास नहीं है।

इसके साथ यह भी सत्य है कि वर्तमान में ऐसे भी लोग हैं जिन्हें भविष्य का बोध तो है लेकिन आज के सत्य ने उन्हें बौद्धिक पंगु बना दिया है।

भारत का भविष्य व उसकी भावी पीढ़ी जब जब अपने वर्तमान के परिवर्तन पर अचंभित होगी, तब तब 8/9 जनवरी 2019 के दिन को स्मरण करेगी।

यह वह दिन है जब सिर्फ एक व्यक्ति ने अपने हठी चरित्र व दृढ़ आत्मविश्वास से सुसज्जित, अपनी विदग्धता से गढ़ी गयी भारत की परिकल्पना को साकार करने के लिए, उन मार्गो का निर्माण किया, जो सिर्फ कल्पना मात्र में जीवंत थे लेकिन उसका अस्तित्व जनमानस की बौद्धिकता में गंभीर नहीं था।

ऐसे व्यक्तित्व के नरेंद्र मोदी ने, अंध घृणा में लिप्त विपक्ष की रणभूमि में प्रवेश कर जिन दो कानूनों को संवैधानिक बनाया है वह अद्वितीय है। वे हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और इसाई जो दशकों से अफ़ग़ानिस्तान, बांग्लादेश, पाकिस्तान से भाग कर भारत में विस्थापितों की अनाम जीवन जी रहे थे और जो अपने जीवनकाल में अनाम ही रहने को अपनी नियति मान चुके थे, उनको नाम मिल गया है।

यह कटु सत्य है कि भारतीय राजनीतिज्ञों और बुद्धिजीवियों के विवेक व चिंतन में वे कभी थे ही नहीं। कभी कभार इनकी भीड़ से इन विस्थापितों के लिए एक आध आवाज़ सुनाई पड़ भी जाती थी लेकिन सामान्य जन की आत्मा में वे शून्य थे। लोगों के पास इन विस्थापितों के लिए घड़ियाली आंसू से ज्यादा कुछ भी नहीं रह गया था।

नरेंद्र मोदी ने इन विस्थापितों के कपाल पर ‘भारतीय’ लिख दिया है। उनकी सरकार द्वारा उठाये गए इस कदम से भले ही आज कुछ लाख लोग प्रभावित होंगे लेकिन यह भविष्य के भारत और उसमें अंतर्निहित भारतीयता को अलग पहचान देंगे।

मुझे, यह शताब्दी पूर्व भारत से, छल व झूठे आश्वासनों से सुदूर भेजे गए भारतीय, जो आज प्रवासी कहलाते हैं, उनको अपनी शाश्वत संस्कृति से फिर जुड़ने व उनके भारतीय ही होने के मार्ग को प्रशस्त किये जाने की आहट देती सुनाई पड़ रही है।

मेरे लिए मोदी सरकार द्वारा विस्थापितों को भारतीय नागरिक बनाने के लिए लाया यह विधेयक, इंडिया के सिर्फ भारत बनने की एक धारा का उदगम है।

इसी के साथ मोदी जी ने जो दूसरा कानून, संविधानसम्मत बना डाला है, वो और भी प्रचंडता लिए हुए है। भारत के सामान्य जन (मैं सवर्ण नहीं कहूँगा) को आर्थिक आधार पर 10% आरक्षण देने का निर्णय अविश्वसनीय है।

स्वतंत्रता के बाद से ही जिस भारत में बुद्धिजीवियों और राजनीतिज्ञों का हर सामाजिक संलाप व चिंतन जहां जाति आधारित रहा है वहां, पूर्व की धारा के विपरीत जाकर, आर्थिक दशा को मापदंड बनाना निश्चित ही रूप से असंभवता की विकरालता को सूक्षमता प्रदान कर रहा है।

यह एक कटु सत्य है कि एक समय भारत में जातिगत आरक्षण की महती आवश्यकता थी लेकिन पूर्व में, विशेषकर कांग्रेस द्वारा इसको सिर्फ वोट के लिए इस्तेमाल करने से जिस विषबेल को रोपित किया, उसने आरक्षण के सामाजिक उत्थान की चेतना को निर्बल कर दिया था।

इसका परिणाम यह हुआ कि कालांतर में जब विषबेल पल्लवित हुई तो स्वयं उन जातियों से निकले नेतृत्व ने उसको सामाजिक उत्थान के मार्ग से हटा अपने राजनीतिक स्वार्थ की सीढ़ी बना दिया और उसी के कुपरिणामों को आज भारत और उसके समाज को भुगतना पड़ रहा है।

दूरदृष्टि की निर्धनता से रुग्ण, भारत के राजनीतिज्ञों ने जातिगत आरक्षण का समाजीकरण के विपरीत जो राजनीतिकरण किया है उसने हिन्दू समाज के उत्थान के स्थान पर समाज में सिर्फ टूटन, अविश्वास व बिखराव को सृजित किया है।

भारतीय समाज में आर्थिक आधार पर आरक्षण दिए जाने की बात तो बीच बीच में होती रही है लेकिन राजनीतिक स्तर पर इसका संज्ञान लिए जाना कभी भी योग्य नहीं समझा गया था।

पूर्व में राजनैतिक दल, चुनावी मौसमों में अपने अपने घोषणापत्र में इसको स्थान तो देते रहे हैं लेकिन आर्थिक आधार पर आरक्षण कभी भी चुनाव का केंद्रबिंदु नहीं रहा है। यहां तक कि राजनीतिक दलों द्वारा इस पर किसी भी संवाद को स्थापित किये जाने को भी राजनीतिक दृष्टिकोण से सही नहीं माना जाता रहा है। लेकिन यह सब उस वक्त बदल गया जब मोदी सरकार द्वारा इसको मूर्तरूप देने के लिए संविधान में संशोधन के लिए विधयेक लाने का निर्णय लिया।

यह स्वतंत्र भारत में आरक्षण को जाति की परिधि से बाहर कर, आर्थिक आधार देने का पहला वास्तविक प्रयास है। लोगों को जो आज यह आर्थिक आधार पर 10%, जातिगत 50% आरक्षण के सापेक्ष बड़ा छोटा लग रहा है, लेकिन यह वास्तविकता में छोटा नहीं है। यह आरक्षण में आर्थिक आधार, ‘अर्थ’ का नवांकुर है जो भविष्य में जातिगत आरक्षण के स्वरूप या मूल चरित्र को बदल देने की क्षमता रखता है।

यह नरेंद्र मोदी द्वारा भारतीय हिन्दू समाज मे जातिगत विष से सिंचित विषबेलों के वन में दावानल प्रज्जवलित करने की प्रस्तावना है। मैं इस प्रस्तावना को, भारत व उसके समाज के हित में मोदी जी द्वारा उठाये डग को पथप्रवर्तक मानता हूँ।

बीते दिनों जब तीन राज्यों में भाजपा की हार से क्षुब्ध व प्रसन्न समर्थकों (नोटावीरों) और सम्पूर्ण भारत के मोदी विरोधियों का ध्यान अन्य विषयों में अटका था, तब ‘भारतीयता’ के मूलतत्व को परिभाषित करने वाले इन दो विषयों को उठा कर, उसे जय की परिणति तक पहुंचाने का जो कार्य मोदी सरकार ने किया है वह जहां भाव में सुस्पष्ट है, वही वर्तमान में व्याप्त मानसिक दरिद्रता, सामाजिक विषमता व निहित स्वार्थ आधारित राजनीति के बीच चमकता हुआ धूमकेतु है।

मुझे इन दो विषयों पर नरेंद्र मोदी के ‘सबका साथ सबका विकास’ नारे की सिर्फ जीवंतता ही नहीं दिख रही है बल्कि इसमें भारतीयता व हिन्दुओं के नए मापदंड स्थापित होते दिख रहे हैं।

मुझे इसमे कोई संशय नहीं है कि 8/9 जनवरी 2019 में लोकसभा व राजसभा में नरेंद्र मोदी द्वारा बिछाई बिसात पर विपक्षियों का दिव्यांगजन रूप को प्राप्त होना निश्चित रूप से वर्तमान को प्रभावित करेगा। जिस हताशा और नपुंसकता का अनुभव करते हुये, कांग्रेस सहित अन्य भाजपा विरोधियों को मन मारकर सरकार के पक्ष में मत देना पड़ा है, उसने नरेंद्र मोदी को राजनीतिक खेल का अद्वितीय रणनीतिकार व राजनीतिज्ञ के रूप में पुनः स्थापित किया है।

यह तो वर्तमान में हो चुका है, अभी आगे और भी बहुत कुछ देखना भारत की जनता को बाकी है। हमें इसको सिर्फ 2019 के चुनाव के परिप्रेक्ष्य में देखने की भूल नहीं करनी चाहिए। नरेंद्र मोदी द्वारा लिए गये निर्णयों ने जहां वर्तमान को तो प्रभावित कर ही दिया है वहीं भारत के उज्जवल भविष्य की संभावनाओं के लिए दृष्टि भी दे दी है।

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