आज़ादी गैंग वाले यहां आएं, पढ़ा दिया जाएगा ज़िंदगी से आज़ादी का पाठ

मैं पिछले एक सप्ताह से पश्चिम बंगाल और बिहार के सीमावर्ती इलाके में हूँ। सुबह से देर रात तक तमाम लोगों से मिलना हो रहा है।

गंगा-जमुनी तहज़ीब की बात करने वाले लोगों को यहाँ आकर हक़ीक़त से रूबरू होना चाहिए, पर सच्चाई से जान-बूझकर आँखें मूँदे लोगों को समझाना भैंस के आगे बीन बजाना होगा।

इस्लामपुर, बायसी, डलखोला, मोहम्मदपुर, किशनगंज… ये तमाम शहर-कस्बे हरे रंग में रंग चुके हैं। बड़े-बड़े साधनसंपन्न लोग अपने सैकड़ों वर्षों की जमी-जमाई गृहस्थी-व्यापार आदि छोड़कर जाने को लाचार हैं।

मैं उन तमाम लोगों से मिला जिन पर औने-पौने दाम पर अपनी ज़मीन-ज़ायदाद बेचने का दबाव है। उनके परिवार या गाँव के कुछ लोग अपनी 150 वर्ष पुरानी ज़मीन-दुकान-मकान आदि बेचकर यहाँ से जा भी चुके हैं। जो हैं, वे डरे-सहमे-सकुचे रहते हैं, जबकि उनकी आर्थिक हैसियत ऐसी है कि वे पूरे इलाके को रोज़गार दे सकते हैं।

तमाम हिंदू अपनी पहचान छुपाने के लिए मुस्लिमों के लबो-लहज़ा, लिबास बनाए फिरते हैं। यदि ऐसा ही रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पश्चिम बंगाल और उससे सटे बिहार के सीमावर्त्ती इलाकों में हिंदुओं का कोई नामलेवा भी नहीं बचेगा।

लोगों ने बताया कि यदि भारत-पाकिस्तान मैच के दौरान ग़लती से भी उन्होंने भारतीय टीम का समर्थन कर दिया तो भीड़ द्वारा उनकी धुनाई कर दी जाती है, पर हरगिज़ नहीं, इसे लिंचिंग बिलकुल न कहें, अपराध होगा!

मुझे बताया गया कि कोई ऐसा वर्ष नहीं बीतता जब मुस्लिम नौजवानों द्वारा हिंदू युवतियों को भगाकर नहीं ले जाया जाता। 90 के आस-पास यहाँ से 40 किलोमीटर की दूरी से बांग्लादेशी मुसलमानों का जत्था-का-जत्था आकर यहाँ के स्थानीय गाँवों-कस्बों पर पूरी तरह से काबिज़ हो गया।

शुरुआती दौर में किसी ने इन्हें सस्ते मजदूरों के आसान विकल्प के रूप में देखा तो किसी ने हमें क्या मतलब के चिर-परिचित शुतुरमुर्गी अंदाज़ में… पर आज उन्हीं की वजह से इन्हें पलायन करना पड़ रहा है। आज़ादी गैंग वालों को एक बार यहाँ आकर आज़ादी की बात करनी चाहिए… उन्हें यहाँ जिंदगी से आज़ादी का पाठ पढ़ा दिया जाएगा, वह भी बिला शको-शुब्हा…!

इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि अपनी ताक़त बढ़ाइए, अपनी संख्या बढ़ाइए, छोटे-मोटे भेदभाव को भुलाकर संगठित होइए, वरना सभ्यता के इस संघर्ष में कोई नामलेवा भी न बचेगा। आज तो हमारे पास अपने नाते-रिश्तेदारों या समानधर्मा लोगों के बीच जाकर पुनर्स्थापित होने का अवसर है, कल जब वह भी नहीं होगा तो क्या करेंगे, कहाँ जाएँगे…?

नक़ली सेकुलरिज़्म की बात करने वाले लोगों से सावधान रहिए, पाकिस्तान-बांग्लादेश या मुस्लिम बहुल इन इलाकों में कोई फ़र्जी सेकुलरिज़्म की बातें नहीं करता। ताकतवर बनिए, ताकि कोई आपको डराए नहीं, घर-बार छोड़कर जाने के लिए मज़बूर न करे।

कश्मीरी पंडितों के हालात आप देख ही रहे हैं, पाकिस्तान और बांग्लादेश में बचे-खुचे मुठ्ठी भर बेचारे हिंदुओं से किसी की जान-माल को भला क्या ख़तरा हो सकता है, पर फिर भी वे शांतिप्रिय इस्लाम के लिए ख़तरनाक दुश्मन भर हैं! मुस्लिम बाहुल्य एक मुल्क या एरिया बता दीजिए जहाँ पुरसुकून होकर रहा-जिया जा सकता है या खुलकर अपनी धार्मिक स्वतंत्रता का उत्सव मनाया जा सकता हो..!

कृपया मुझे कोई मानवता का ज्ञान न दे, हिंदू विशुद्ध मानवतावादी ही होता है, मैं भी हूँ। मैं यहाँ जो लिख-कह रहा हूँ, वह अपनी आँखों देखा और कानों सुना है। मैं बस इतना चाहता हूँ कि मैंने जिस प्रकार जीवन और पूजा-पद्धत्ति की स्वतंत्रता का उत्सव मनाया है, मेरे बच्चे और उनके बच्चे इस स्वतंत्रता से वंचित न हों।

स्वतंत्रता का उत्सव मनाने की गारंटी केवल सनातन ही देता है, इसलिए इसकी रक्षा के लिए कृत-संकल्पित होइए… मानवता के नकली झंडाबरदारों यानि सूडो सेकुलर पाखंडियों से सावधान रहिए… बहुत सावधान!

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY