जब सन्देश बहुत साफ है तो… अंधे-बहरे क्यों बने हुए हैं धर्म के ठेकेदार

ध्यान से पूरा लेख पढ़ियेगा तो कई सवालों/ शंकाओं का उत्तर मिल जाएगा…

ज़रा याद करिए कि… अयोध्या में राम मंदिर के बजाय बाबरी मस्ज़िद बनाने के लिए मुकदमेबाज़ी कर रहे सुन्नी वक्फ़ बोर्ड ने दिसम्बर 2017 में मांग की थी कि अयोध्या विवाद की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की किसी सामान्य बेंच के बजाय 5 सदस्यीय संविधान पीठ करे।

सुन्नी वक्फ़ बोर्ड की मांग मान ली गयी। गत 4 जनवरी को चीफ जस्टिस महोदय ने विवाद की सुनवाई के लिए 5 सदस्यीय संविधान पीठ बना दी।

दिसम्बर 2017 में ही सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के वकील, कांग्रेसी नेता कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी कि अयोध्या विवाद की सुनवाई 2019 के लोकसभा चुनाव के बाद की जाए।

कपिल सिब्बल की उस मांग का नतीजा आज हम सबके सामने है कि इस मांग के 13 महीने बाद भी मुकदमे की सुनवाई एक इंच आगे नहीं बढ़ी है। सुनवाई आगे बढ़ना तो दूर… आज 10 जनवरी 2019 तक यह भी तय नहीं हुआ है कि सुनवाई किन 5 जजों की पीठ करेगी। अब यह तय किए जाने की तारीख भी 29 जनवरी तक बढ़ा दी गयी है।

जबकि अयोध्या में राम मन्दिर बनाने के लिए मुकदमा लड़ रहे हिन्दू पक्ष की तरफ से अब तक केवल एक मांग की गयी कि मामले की जल्दी और रोज़ाना सुनवाई की जाए। लेकिन हिन्दू पक्ष की यह मांग मानने के बजाय, उसकी तरफ से जो लोग भी यह मांग लेकर सुप्रीम कोर्ट गए उन्हें सुप्रीम कोर्ट से अब तक डांट फटकार ही मिली है।

सुन्नी पक्ष की मांग के अनुसार 5 सदस्यीय संविधान पीठ बना दी गयी है। सुन्नी वक्फ़ बोर्ड के कांग्रेसी नेता वकील कपिल सिब्बल की मंशानुरूप मुकदमे की सुनवाई को भी 13 महीने तक टाल कर उस मुकाम पर पहुंचा दिया गया है कि 2019 के लोकसभा चुनाव के बहुत बाद तक भी मुकदमे का फैसला होने की कोई सम्भावना शेष नहीं रही है।

न्यूज़ चैनलों पर सरकार के खिलाफ गरज रहे हिन्दू धर्म के ठेकेदार साधु संतों को यह सच्चाई क्या दिखाई सुनाई नहीं दे रही? ये ठेकेदार सुप्रीम कोर्ट में अब तक जो हुआ और आज भी जो हो रहा है, उस पर शातिर चुप्पी क्यों साधे हैं। पर्दे के पीछे से जिस कांग्रेस के इशारे पर यह रावणी घटनाक्रम घट रहा है उस पर हिन्दुओं के ठेकेदार साधु संत शातिर चुप्पी क्यों साधे हैं?

इन शातिरों को पुनः याद दिला दूं कि अयोध्या में राम मंदिर के लिए भाजपा ने अपनी चार सरकारें कुर्बान की हैं। उसके दर्जनों दिग्गज़ नेता आज भी अयोध्या विवाद से सम्बन्धित गम्भीर धाराओं वाले मुकदमे झेल रहे हैं। निचली अदालत से सुप्रीम कोर्ट तक में वकील के रूप में राम मंदिर की लड़ाई केवल भाजपा के नेता ही लड़ रहे हैं।

याद दिला दूं कि हिन्दू पक्ष ने 2010 में जब हाई कोर्ट में मुकदमा जीता था उस समय राम लला के वकील आज के कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद ही थे। जबकि सलमान खुर्शीद कपिल सिब्बल सरीखे कांग्रेसी नेता अयोध्या में राम मन्दिर के खिलाफ मुस्लिम पक्ष का वकील बनकर अदालत में उपस्थित हुए हैं।

अतः जिस सुप्रीम कोर्ट के ऊपर फैसला करने की ज़िम्मेदारी है वो आज आठ साल बाद, नौंवें साल में यह भी तय नहीं कर रहा कि सुनवाई कबसे होगी, कौन करेगा? तो उसके खिलाफ अनशन, प्रदर्शन, प्रेस कॉन्फ्रेंस क्यों नहीं कर रहे हिन्दुओं के ठेकेदार साधु संत। क्योंकि यह रास्ता स्वयं सुप्रीम कोर्ट के आज के चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने ही दिखा सुझा दिया था जब उन्होंने अपने तीन अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश साथियों के साथ तत्कालीन सुप्रीम कोर्ट की कार्यप्रणाली के ख़िलाफ़ सार्वजनिक प्रदर्शन/ प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी और तत्कालीन मुख्य न्यायधीश के खिलाफ गम्भीर आरोप लगाए थे।

अतः अयोध्या विवाद की रोजाना सुनवाई तत्काल प्रारम्भ करने की अपनी मांग लेकर ’29 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट चलो’ का आह्वान क्यों नहीं कर रहे साधु संत?

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