अंततः मोदी ने शुरू की राजनीति

प्रधानमंत्री का पद ग्रहण करने के बाद नरेंद्र मोदी ने कहा था – साढ़े चार साल तक मैं सिर्फ काम करूंगा और अगले छह महीने सिर्फ राजनीति।

कांग्रेस और उसके साथ जुड़े रहे टटपूंजिए दलों को तो छोड़िए, खुद एनडीए में शामिल एक विशेष आरक्षण लॉबी के साथ-साथ बज़रिए नोटा ब्रिगेड अपनी दुकान चला रहे कई समूह स्तब्ध हैं।

उनकी ज़ुबान पर ताले लग गए हैं, यह कहना ठीक नहीं होगा। इसलिए कि यह मुद्दा ऐसा है, जिस पर रुख साफ़ करना आवश्यक है, अन्यथा लुटिया डूबना तय।

तो बहनजी, भैया जी और इन जैसे अनेकानेक नकली नेता भी एक वास्तविक ग़रीब तबके के पक्ष में घड़ियाली ही सही, आंसू बहाने को विवश तो हुए।

सबसे विचित्र स्थिति मैं कांग्रेस की पाता हूं। पिछले सत्तर साल से सवर्ण हिन्दुओं को सूली पर लटकाने वाली, हिन्दुओं में निरंतर विभाजनीय कृत्य करने वाली, हिंदू समुदाय पर ‘भगवा आतंकवाद’ का धब्बा लगाने का कुत्सित प्रयास करने वाली और सबसे बढ़ कर यूपीए-2 के कार्यकाल में हिंदुओं को सभी तरह से विवश कर देने वाला ‘सांप्रदायिक एवं लक्ष्य केन्द्रित हिंसा निवारण अधिनियम’ तैयार करवाने और उसे संसद से पास कराने का प्रयास करने वाली कांग्रेस आज कह रही है – ‘बहुत देर की मेहरबां आते-आते।’

कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला की आज की खिसियाहट ऐसे ही नहीं थी। उन्होंने पिछले साल के नौंवे महीने में आरक्षण से वोट-जुगाड़ का पुरातन कांग्रेसी फॉर्मूला अपनाते हुए ब्राह्मण समुदाय की तरफ चारा फेंका था – ‘अगर कांग्रेस सत्ता में आई, तो ब्राह्मणों को पंद्रह फीसदी आरक्षण दिया जाएगा।’

तीन राज्यों की विजय में कुछ हिस्सा इसका भी अवश्य रहा होगा। आखिर ब्राह्मण इतनी बड़ी संख्या में ‘नोटा-नोटा’ चिल्लाते ऐसे ही तो घूम नहीं रहे होंगे।

दरअसल आरक्षण को कांग्रेस ने आज़ादी के बाद से ही वोट बटोरने वाला चुग्गा बना रखा है। वह कहीं मुसलमानों से आरक्षण का वादा करती है, कहीं ईसाइयों से। किसी भी समुदाय से पूरे नहीं हो पाने वाले वादे करने में उसे कभी गुरेज़ नहीं रहा। देश से किया गया ‘ग़रीबी हटाओ’ और राजस्थान के गुर्जर समुदाय का आरक्षण का मसला इस प्रवृत्ति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।

अब कांग्रेस इस मसले पर सरकार के निर्णय के पक्ष में जुगाली कर रही है और वह भी रणदीप सुरजेवाला के श्रीमुख से, तो यह अत्यंत हर्ष का क्षण है।

अंत में सिर्फ यह कहूंगा कि भले मोदी ने अंततः राजनीति शुरू की, लेकिन हमें यह कतई नहीं भूलना चाहिए कि इसके मूल में रणदीप सुरजेवाला का वह बयान ही है। वह नहीं आया होता, तो यह निर्णय भी नहीं आया होता। अर्थात यह सरकार कमज़ोर है। पूर्ण बहुमत के बावजूद इसकी उपलब्धियां अपेक्षा से कम हैं।

अगर ऐसा नहीं है, तो इसे ‘काम के न काज के, दो मन अनाज के’ उदित राज जैसे तमाम लोगों को कान पकड़ कर बाहर करने का साहस भी दिखाना चाहिए, जो हर महत्वपूर्ण क्षण में पार्टीलाइन से इतर खड़े दिखने के रोग से पीड़ित हैं।

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