मीलॉर्ड न्यायपूर्ण जवाब दें…

सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को सुप्रीम कोर्ट ने उनके पद पर पुनः नियुक्त कर दिया है, इस शर्त और आदेश के साथ कि आलोक वर्मा कोई नीतिगत फैसला नहीं ले सकते।

इसका अर्थ हुआ वर्मा जी आगामी 2 फ़रवरी तक बिना कामकाज के अपने ऑफिस में बैठेंगे क्योंकि 2 फ़रवरी को वह रिटायर हो रहे हैं।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के मुताबिक आलोक वर्मा के खिलाफ जांच भी जारी रहेगी और दोषी पाए जाने कार्रवाई भी होगी ही।

सीबीआई के स्पेशल डायरेक्टर राकेश अस्थाना की भी बहाली कर दी है कोर्ट ने, लेकिन इनके साथ कोई शर्त, पाबंदी नहीं।

मैं सर्वोच्च न्यायालय के आलोक वर्मा मामले में दिए निर्णय का स्वागत तो करूं लेकिन कोर्ट ने ऐसा फैसला किस आधार, वजहों से दिया है यह तो पता चले।

क्या ऐसा फैसला सिर्फ इसलिए कि वर्मा जी की बुढ़ौती न खराब हो!

कुछ दिनों के मेहमान वर्मा साहब पर सर्वोच्च न्यायालय का यह भावुक फैसला अगर बुढ़ौती पर तरस खा कर आया है तो फिर आज तक गढ़े गए उस जुमले का क्या, कि “न्याय की देवी अंधी होती है, सबूतों… गवाहों पर चलती है, भाव पर नहीं”।

वैसे यह जुमला तब जरूर सटीक बैठता है जब रामलला विराजमान उसी कोर्ट में खुद पक्षकार बन… सिविल के मुकदमे की फाइल लेकर टाइटिल सूट का मुकदमा लड़ रहे हैं : बिना भाव के।

खैर… सर्वोच्च न्यायालय से एक इंक्वायरी और चाहिए थी कि जिस वर्मा पर इतनी पाबंदी लगा कर अदालत उनकी बुढ़ौती बचाने का भाव दर्शा रही है, उसी वर्मा के खिलाफ जांच चलने देने, दोष सिद्ध होने पर कड़ी कार्रवाई की बात कह कर… वही बुढ़ौती खराब करने की भविष्यवाणी भी किये दे रही है!

बिना किसी कामकाज उर्फ़ नीतिगत फैसले लेने के अधिकार के… मिस्टर वर्मा को अपने खिलाफ साक्ष्यों, प्रमाणों आदि से छेड़छाड़, मैनेज करने की छूट तो नहीं दे रहे मीलॉर्ड? ये न्याय है, या न्याय के साथ खिलवाड़ उर्फ़ बकलोली?

ये आखिरी पैरा बड़े मीलॉर्ड का सम्मान, लिहाज नहीं… उन पर ससम्मान कड़ा और सीधा आरोप है मेरी तरफ से।

मीलॉर्ड न्यायपूर्ण जवाब दें…

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