चाचा की सड़क

यूरोपीय देश स्वीडन एक Constitutional Monarchy है। मतलब संवैधानिक राजतंत्र। वहां Head of State वहां का King (राजा) होता है, जैसे हमारे यहां राष्ट्रपति।

पर वहां के Head of State भी हमारे राष्ट्रपति जैसे ceremonial होते हैं, सीमित अधिकारों एवं शक्तियों के साथ। भारत की तरह ही असली अधिकार प्रधानमंत्री के पास होते हैं।

उलोफ पाल्मे (Olof Palme – स्वीडिश में Olof को उलोफ़ तथा Palme को पाल्मे उच्चारित किया जाएगा) स्वीडन के 26वें प्रधानमंत्री थे। सन 1969 में पहली बार प्रधानमंत्री बने पाल्मे सन 76 में हारे पर सन 82 में वापस जीते और सन 86 में हत्या होने तक प्रधानमंत्री रहे।

सोशल डेमोक्रेटिक रहे पाल्मे, अमेरिकी और सोवियत – दोनों ही सुपरपावर देशों के पक्षधर नहीं थे, और विश्व में शांति और भाईचारे बनाये रखे जाने के हिमायती थे। उपनिवेशवाद के प्रखर विरोधी पाल्मे कई अफ्रीकी देशों को फ्रांस या दूसरे ‘साम्राज्यों’ से आज़ादी मिलने पर मान्यता देने में अग्रणी रहे।

कहने की ज़रूरत नहीं कि वाम-विचारधारा की ओर झुके पाल्मे, जो सन 75 में एक कमज़ोर अमेरिकी राष्ट्रपति जेरॉल्ड फोर्ड (Gerald Ford) के समय क्यूबा जाकर फ़िदेल कास्त्रो की तारीफों के पुल बांध आये थे, दुनिया के ‘सताये हुए मज़लूमों’ के डार्लिंग हुआ करते थे।

पाल्मे सन 86 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल में भारत आये। अफगान सोवियत युद्ध के कारण या बहाने से अमेरिका अपने तब के पालतू पाकिस्तान को अफगानिस्तान में मुजाहिद्दीन तैयार करने के लिए हथियार देता रहता था।

धीरे धीरे, पर स्थिरता से बढ़ती पाकिस्तानी आयुध शक्ति से भारत का चिंतित होना लाज़मी था। पड़ोस के भस्मासुर को मुफ्त मिलते वरदानों से सशक्त होना, चिंता का विषय स्वाभाविक ही था।

7, रेस कोर्स के गार्डेन में टहलते पाल्मे ने राजीव को मनाया कि अमेरिकी कृपा से बढ़ती इस पाकिस्तानी आयुध शक्ति से निपटने के लिए हर बार रूस (तत्कालीन सोवियत संघ) की ओर देखने के बजाय क्यों ना इस बार स्वीडन से ही हथियार खरीद लें।

इस तरह से विश्व शांति और गुट-निरपेक्षता (Non-aligned Movement) के प्रबल पुरोधा ने प्रधानमंत्री राजीव को स्वीडिश कंपनी बोफोर्स से बोफोर्स हॉवित्जर तोपें खरीदने के लिए मना ही लिया।

इस सब में पाल्मे का स्वार्थ एक बंद होने की कगार पर खड़ी बोफ़ोर्स कंपनी के हज़ारों लोगों की नौकरियां थी, जो शायद आने वाले चुनावों में उन पर भारी पड़ती। बाकी, आधिकारिक तौर पर पाल्मे का कोई विशेष व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्ध नहीं हो पाया है। बाकी, सिद्ध तो आज तक कई बातें नहीं हो पाई हैं।

स्वीडन पहुँचते ही पाल्मे ने ‘बात मैं कर आया हूँ, आगे तुम लोग देख लेना’ के अंदाज़ में ये मामला स्वीडिश रक्षा अधिकारियों और बोफ़ोर्स के अफसरों पर छोड़ दिया। बोफ़ोर्स बनकर तैयार होती और भारत को सौंपी जाती, इससे पहले ही इन सबसे असंबंधित मामले में पाल्मे की हत्या हो गयी।

यहां ये बात भी गौर करने लायक है कि आर्मी की पसंद 18 पैरामीटर्स को पूरा करने वाली 29 किलोमीटर की मारक क्षमता रखने वाली फ्रेंच ‘सॉफ्मा’ गन्स थी, उसके बजाय सिर्फ 11 पैरामीटर्स पूरे करने वाली 21 किलोमीटर की मारक क्षमता वाली बोफ़ोर्स बड़े आनन फानन में खरीदी गई।

1.2 अरब डॉलर (लगभग 1,500 करोड़ – सन् 86 के आसपास 1 डॉलर 12 रुपये के बराबर होता था) की इस डील को पाने के लिए उस जमाने में बोफोर्स द्वारा करीब 25 करोड़ डॉलर रिश्वत स्वीडन और भारत के रक्षा अधिकारियों और नेताओं को दी गयी।

स्वीडन के कानून के अनुसार युद्ध की संभावनाओं वाले इलाकों में हथियार बेचना मना था, फिर भी साउथ एशिया में भारत और खाड़ी में ईरान और इराक को पाल्मे ने मना लिया। बड़े ‘आराम’ से मान गए सब।

सन् 87 के अंत तक स्वीडन के ही एक ‘whistle-blower’ ने उस समय स्वीडन में मौजूद The Hindu की पत्रकार चित्रा सुब्रमण्यम को सारे सबूत दिए, जिसे चित्रा ने अपने अखबार में छापा।

इसके बाद चित्रा कभी The Hindu, जिसके संपादक लेफ्ट-लीनिंग N. Ram है, के लिए नहीं लिख पायी, जहां उसके आर्टिकल्स बहुत controversial माने गए। यूरोप में मौजूद चित्रा के फोन टैप होने लगे, स्वयं और बच्चों को धमकियां मिलने लगी। यहां तक कि एकाउंट में एक बार करोड़ों रुपये जमा हो गए जो चित्रा ने बैंक से कहकर लौटा दिये।

89 में ये घोटाला कांग्रेस का हार का कारण बना क्योंकि देश ने तब तक इस दर्जे का घोटाला देखा नहीं था। राजीव के समय रक्षा मंत्री रहे वीपी सिंह ने सरकार बनाते ही CBI को इन्क्वारी सौंपी, जिसने सारी जानकारी देने के लिए स्विस बैंक्स में अर्जी लगा दी।

वीपी सिंह और चंद्रशेखर के संक्षिप्त कार्यकाल के बाद जब 91 में नरसिम्हा राव प्रधानमंत्री बने, तब गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री माधव सिंह सोलंकी को सेंटर में लाया गया, और विदेश मंत्री बनाया गया।

स्विट्जरलैंड के दावोस में होने वाले वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में सोलंकी ने स्विस विदेश मंत्री Rene Felber को चिट्ठी पकड़ाई, जिसमें लिखा था कि अब कुछ होना जाना नहीं, हम भी जांच बंद करना चाहते हैं, आप भी ठंडे पड़ जाओ। पता नहीं कैसे, चिट्ठी की एक कॉपी चित्रा सुब्रमण्यम के हाथों आयी, जिसके छपने पर सोलंकी को इस्तीफ़ा देना पड़ा।

अब सवाल, स्विट्जरलैंड कहाँ से बीच में आया?

रिश्वत या kickbacks का पैसा ज्यादातर स्विस बैंकों में जमा था, बीच में एक Italian बिचौलिए ओटेविओ क़वात्रोचि (Q) जो कि राजीव के ससुराल पक्ष के खास थे, ने स्विस कोर्ट्स में अर्जी लगाई कि सारी जानकारी भारतीय जांच एजेंसियों को नहीं सौंपी जाए क्योंकि इससे उसके जीवन को खतरा है।

सन 93 में Swiss Fedral Court ने निर्णय दिया कि सारी जानकारी भारत को सौंपी जाए, एक और बिचौलिए हिन्दुजा भाई और क़वात्रोचि अपील पर अपील लगाते रहे और अंत में जनवरी 97 में 500 पेजों का एक डॉक्यूमेंट भारत को सौंपा गया।

सन 97 में कांग्रेस के सहयोग से सरकार चला रहे इंद्र कुमार गुजराल को सीधा सा इशारा था कि जांच धीरे धीरे करते करते ड्रॉप कर दो। सन 99 में आई अटलजी की सरकार के दौरान 12 सालों बाद CBI द्वारा पहली चार्जशीट दायर हुई, जिसमें क़वात्रोचि, ‘स्व.’ राजीव गांधी, रक्षा सचिव एसके भटनागर पर चार्ज लगाए गए। 2002 में दिल्ली हाइकोर्ट ने सारा केस ही बंद कर दिया, जो सुप्रीम कोर्ट ने 2003 में वापस सुनवाई के लिए लिया।

2004 में सरकार बदलने के बाद जांच एकदम सुस्त पड़ गयी। सन 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने CBI से कहा कि सनद रहे, क़वात्रोचि अपने लंदन के 2 बैंक एकाउंट से, जिनमें 50 लाख डॉलर है और जो वाजपेयी सरकार के दौरान फ्रीज़ हो चुके थे, उनमें से पैसा ना निकाल पाए।

CBI ने लिखित में जवाब दिया कि 46 लाख डॉलर निकाले जा चुके हैं। पैसा निकालने के बाद क़वात्रोचि अर्जेंटीना भाग गया, जिसके साथ भारत की कोई प्रत्यर्पण संधि (extradition treaty) नहीं थी।

फिर भी अर्जेंटीनी सुप्रीम कोर्ट ने क़वात्रोचि के प्रत्यर्पण का मामला सुना, और भारत सरकार सिर्फ इसलिए हार गई क्योंकि CBI एक कोर्ट आर्डर वहां जमा नहीं करवा पाई। फ्रीज़ एकाउंट से पैसा निकल जाना, सिर्फ एक डॉक्यूमेंट जमा ना होने के कारण एक एजेंट का छूट जाना, जिसे आप 25 साल से ढूंढ रहे हो – ये सब रेनकोट में नहाने वाले एक ‘अत्यंत कमजोर’ नेता के शासन में ही संभव है।

सन 2013 में चार्जशीट में दायर आखिरी जीवित अभियुक्त क़वात्रोचि के निधन के साथ ही बोफ़ोर्स मामला हमेशा के लिए शांत हुआ।

ये सब मैंने लिख दिया है इसका मतलब ये कत्तई नहीं कि मैंने आपको गूगल पर Forbes मैगज़ीन में सन 97 में छपे ‘Money! Guns! Corruption!’ आर्टिकल पढ़ने से रोका है, या विकिपीडिया के Bofors scandal पेज पर मौजूद न्यूज़ लिंक्स को पढ़ने से मना किया है।

अब आप सोचेंगे कि सड़क कहाँ से बीच में आई।

दिल्ली में ‘तू जानता नहीं, मेरा बाप कौन है’ से लेकर ‘तेरे बाप की सड़क है?’ वाला सेंटिमेंट बड़ा कॉमन है। राफेल राफेल चिल्लाने वालों के पिता के नाम सड़क तो क्या, पता नहीं और क्या क्या है इस देश में। पर जब IIT, Delhi से आर के पुरम होते हुए मुनिरका जाएंगे तो बीच में सन 86 में निधन के बाद सन 87 में मरणोपरांत Jawaharlal Nehru Prize for Peace and International Understanding से सम्मानित हुए उलोफ़ पाल्मे के नाम पर ‘Olof Palme मार्ग’ पर सेल्फी लेना ना भूलें।

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