माचिस सिर्फ आग जलाती है, कुछ और होते हैं आग जलाए रखने के साधन

हाल के दिनों में फेसबुक द्वारा अनजान लोगों को जोड़ देने, या करीबी जान-पहचान वालों को अपने आप मित्र सूची से हटा देने का जिक्र करती हुई कुछ पोस्ट दिखी और हमें मध्य कालीन भारत के युद्ध याद आ गए।

मुहम्मडेन हमलावरों के दौर में अक्सर हमलावर जब आकर किले को घेर लेते थे, तब कहीं जाकर बेचारे मासूम, धार्मिक, राजाओं को पता ही चलता था कि उनपर हमला हुआ है। वो पड़ोसी राजाओं पर हो रहे हमलों की खबर क्यों नहीं रखते थे, या दुश्मन के चढ़ आने तक किले में क्यों बैठे रहते थे, पता नहीं।

ज़ाहिर है ऐसे सभी राजा और रानियाँ युद्ध हार कर मारे भी जाते रहे। उनकी प्रजा को उनकी हार के कारण धर्म परिवर्तन, लूट, बलात्कार और गुलामी झेलनी पड़ी।

इसकी तुलना में शिवाजी, महाराणा प्रताप या फिर लोचित बोरफुकान अपने किले में बैठकर दुश्मन का इंतजार करते नहीं दिखते हैं। पहले तो वो दुश्मन को खीचकर ऐसे रणक्षेत्र में ले आए जहाँ वो बेहतर स्थिति में हों, और मलेच्छ शत्रु के लिए इलाका नया हो। उसके अलावा रास्ते में पानी-रसद न मिले, छापामार हमले होते रहें, ये इंतजाम भी उन्होंने रखा।

सोशल मीडिया के बारे में भी कई लोग उन नियमों से सोचते हैं, जिनसे वो ‘धर्म-युद्ध’ लड़ते हैं। मलेच्छ उनके नियम नहीं मानेंगे, ये बेचारे मासूमों को याद ही नहीं रहता।

एक धुरंधर भाजपा नेता, जिनके संस्कृत उच्चारण की क्षमता पर हमें कोई संदेह नहीं, अक्सर टीवी पर दिखते हैं। हमारी निजी मान्यता है कि उनके तर्क-वितर्क-कुतर्क की क्षमता इतनी है कि वो अपनी पत्नी जी से भी बहस में जीत जाते होंगे। बेचारे समझा रहे थे कि आगामी चुनावों में सोशल मीडिया पहले जितना (2014 की तुलना में) महत्वपूर्ण क्यों नहीं होगा।

उनका मत था कि इतने लोगों तक बिजली पहुंची है, उतने लोगों को उज्ज्वला में गैस कनेक्शन मिला है, ये योजना थी, वो योजना थी, ये सब लोग उन्हें वोट देंगे!

वो संवाद में ‘मान्यता’ और ‘तथ्य’ का अंतर भूल गए थे। मेरा ख़याल है कि कम्युनिकेशन उनका विषय नहीं रहा होगा, इसलिए परशेप्सन और रियलिटी (Perception and Reality) का भेद उन्हें पता ही नहीं।

इसे खाना पकाने के उदाहरण से समझ सकते हैं। ये सबने कभी न कभी किया ही होगा, इसलिए समझने में मुश्किल नहीं होगी।

कोई भी लाइटर या माचिस से खाना नहीं पकाता। उससे आग सिर्फ जलाई जाती है, फिर आग जलती रहे इसके लिए गैस, कंडे-उपले, लकड़ी या कोयला जैसे ईंधनों का प्रयोग किया जाता है।

सोशल मीडिया, लाइटर या माचिस जैसा ही औजार है। इसका इस्तेमाल लोगों की सोच में एक विषय को डाल देने के लिए होता है। उस ‘विचार’ को परिपक्व करके उससे ‘मत’ बनाने के काम के लिए दूसरे औजार भी इस्तेमाल किये जायेंगे। फ़िल्में, नाटक, टीवी, कार्यक्रमों के बीच में आने वाले प्रचार जैसे कई ब्रॉडकास्ट के माध्यम भी साथ में प्रयोग में लाये जायेंगे।

ये कैसे किया जाता है, या किया जा सकता है इसपर विदेशों में काफी शोध हुआ है। अज्ञात कारणों से तथाकथित दक्षिणपंथी कहलाने वाले, या खुद को राष्ट्रवादी बताने वाले राजनैतिक दल ऐसे शोध या इसके विशेषज्ञों को अनावश्यक मानते हैं। उन्हें उचित मानदेय पर अपने पक्ष में लाने, या उनका नाम-पता भी मालूम रखने के कोई प्रयास चार साल में नहीं किये गए हैं। अंतिम दौर में कमज़ोर पड़ने पर जरूर कुछ लीपापोती की कोशिश हुई है, मगर उससे कितना फायदा होगा, ये एक बड़ा सवाल है।

इस तरह से सोशल मीडिया के जरिये क्या शुरू किया जाता है उसे जानने में अगर रूचि हो तो इन्टरनेट पर ही ‘अरब स्प्रिंग’ ढूंढना फायदेमंद हो सकता है। सन 2010 के दौर में कई अरब देशों में तख्तापलट या क्रांति जैसी स्थितियां तैयार करने में सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका रही है।

हाल के अमरीकी चुनावों को प्रभावित करने के लिए हुए इन्टरनेट के इस्तेमाल में कई जानकारों ने विदेशी ताकतों को भी शामिल बताया और लम्बे मुक़दमे भी चले। भारत में इसका सफलतापूर्वक इस्तेमाल अन्ना हजारे के आन्दोलन से केजरीवाल पैदा करने में हो चुका है।

अन्ना हजारे वाले कथित रूप से ‘लोकपाल आन्दोलन’ में सोशल मीडिया कैसे काम कर रहा था, ये किसी ने देखा नहीं था ऐसा भी नहीं है। आन्दोलन के शुरूआती दौर में जो लोग अन्ना हजारे के आस पास दिखे थे, वो इतने भी अज्ञात नहीं थे। कथित रूप से किसी राष्ट्रवादी गैर-राजनैतिक संघ के जो लोग दिखते थे, उन बाकी के लोगों को न भी याद रखा जाए तो स्वामी रामदेव जो एक दल के घनघोर समर्थन और दूसरे के विरोध में रहे हैं, उनकी याद तो सबको आएगी ही।

बाकी जानकारी से यथासंभव परहेज़ रखने वाले, ‘भाईसाहब’ संस्कृति के संगठन उचित औजार के उचित जगह इस्तेमाल के बदले हथौड़े से स्क्रू लगाने और पेंचकस से कील ठोकने की कोशिश भी कर सकते हैं। कुछ लोग तो ‘अरब स्प्रिंग’ पढ़ ही लेंगे। हमलावरों की तकनीक पता जो रखनी है!

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