जो 54 साल तक बेहोश थे, वे पूछ रहे कि तुम्हें साढ़े 4 साल बाद होश क्यों आया?

आर्थिक रूप से पिछड़े गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण का फैसला सही है या गलत?

आज इस सवाल का जवाब देने से कांग्रेस मुंह चुरा कर भाग गई। उसने किसी भी न्यूज़ चैनल पर अपना कोई प्रवक्ता ऐसी किसी बहस में भेजने से मना कर दिया।

पिछले कई महीनों से प्रेस कॉन्फ्रेंस करने की कांग्रेसी मशीन बने हुए रणदीप सुरजेवाला भी आज सरकार के इस फैसले पर प्रतिक्रिया देने के बजाय गधे के सिर से सींग की तरह गायब दिखे।

अतः कांग्रेस की मंशा स्पष्ट हो गयी है। लेकिन न्यूज़ चैनलों में राजनीतिक विश्लेषक के भेष में रोजाना मंडराने वाला, कांग्रेस का अनौपचारिक लेकिन सबसे VVIP प्रवक्ता, रॉबर्ट वाड्रा का बहनोई तहसीन पूनावाला कुछ न्यूज़ चैनलों पर यह राग अलापता हुआ दिखा कि… मैं फैसले का विरोधी नहीं हूं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी को जवाब देना चाहिए कि ये फैसला सरकार बनने के साढ़े 4 साल बाद क्यों लिया, पहले क्यों नहीं लिया?

लगभग इसी शैली में सपा, बसपा, राजद और वामपंथी गैंग के प्रवक्ता भी फैसले का विरोध तो नहीं कर पा रहे पर इसे चुनावी लाभ के तहत लिया गया फैसला बता रहे हैं।

अगर, मगर और लेकिन का पुछल्ला लगाकर यही सवाल दोहरा रहे हैं कि ये फैसला सरकार बनने के साढ़े 4 साल बाद क्यों लिया, पहले क्यों नहीं लिया?

कांग्रेस समेत मोदी विरोधी इस पूरे जमावड़े का सवाल प्रथम दृष्टया तो उचित है।

लेकिन इस जमावड़े को अपने उपरोक्त सवाल का जवाब मांगने से पहले यह जवाब भी देना चाहिए कि संविधान लागू होने के 64 साल (1950 से 2014) बाद तक इस जमावड़े ने यह फैसला क्यों नहीं किया जबकि उन 64 में से 54 सालों तक कांग्रेस और अलग अलग कालखण्डों में कांग्रेस का दुमछल्ला बनकर यही जमावड़ा देश पर शासन करता रहा।

अतः आज दिख रहा यह राजनीतिक ढोंग, पाखण्ड, धूर्तता और निर्लज्जता भी हास्यास्पद लेकिन ऐतिहासिक है कि… जिन्हें 44 साल तक ऐसा फैसले लेने का होश नहीं आया वो आज मोदी सरकार से पूछ रहे हैं कि ऐसा फैसला लेने का होश तुम्हें साढ़े 4 साल बाद क्यों आया?

रही बात चुनावी लाभ के सवाल की तो… नंगों को यह शोभा नहीं देता कि वो मांग करें कि हमारी नंगई का मुकाबला हमारा प्रतिद्वंद्वी बुर्का पहन कर करे।

नंगे शायद भूल गए हैं कि… राजनीति शास्त्र के सर्वकालीन सर्वश्रेष्ठ आचार्यों में से एक आदरणीय विदुर जी सहस्रों वर्ष पूर्व यह शिक्षा दे गए हैं कि…

कृते प्रतिकृतिं कुर्याद्विंसिते प्रतिहिंसितम्।
तत्र दोषं न पश्यामि शठे शाठ्यं समाचरेत्॥

अर्थात्- जो जैसा करे उसके साथ वैसा ही बर्ताव करो। जो तुम्हारी हिंसा करता है, तुम भी उसके प्रतिकार में उसकी हिंसा करो! इसमें मैं कोई दोष नहीं मानता, क्योंकि शठ के साथ शठता ही करने में लाभ है।

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