हमारी नसों में घुस गया है भ्रष्टाचार, बस इस सच को कबूलने से हिचकते हैं हम

उत्तरप्रदेश में 2012 खनन घोटाले में हाईकोर्ट के आदेश पर पब्लिक सर्वेंट बी. चंद्रकला के घर सीबीआई के छापे पर कई मित्र बता रहे हैं कि कैसे चंद्रकला टीवी कैमरे के सामने भ्रष्टाचार के लिए अधिकारियों को हड़काती थीं। उन पर आरोप है कि 8 साल की नौकरी नेब वे 165 करोड़ की मालकिन हो गयी।

मेरा सदैव यह मानना है कि किसी ‘कड़क’ नौकरशाह, राजनीतिज्ञ या लोकपाल से भ्रष्टाचार समाप्त नहीं होने वाला।

क्या भ्रष्टाचार उस एक ‘कड़क’ आदमी या औरत या लोकपाल की कमी के कारण हो रहा है?

क्या ऐसी खबरें नहीं आई हैं कि सर्वोच्च न्यायालय के माननीयों ने घूस ली? क्या गारंटी कि वह ‘कड़क’ आदमी या औरत, और लोकपाल भी भ्रष्ट ना निकल जाए? अभी जहां 1000 रूपए की घूस का रेट है वहां लोकपाल का भी पैसा लगने लगेगा और वह घूस बढ़कर 1500 रूपए हो जाएगी।

चीन, सऊदी अरेबिया, ईरान में भ्रष्टाचार के लिए कड़क सज़ा है, यहां तक कि मृत्युदंड भी। क्या वहां भ्रष्टाचार समाप्त हो गया है?

अभी भी एक मित्र की फलों की दूकान के बगल में महिला कांस्टेबल रोज़ घूस लेती है। उन्हें हर महीने उस दुकान के लिए पुलिस और म्युनिसिपेलिटी को घूस देनी पड़ती है। और यह सब देश की राजधानी में हो रहा है, किसी दूर-दराज़ के गाँव में नहीं।

ऐसी क्या बात है कि पूर्व की सरकारों ने भ्रष्टाचार मिटाने के लिए कोई सार्थक कदम नहीं उठाए? आखिरकार राष्ट्र के सबसे टफ कम्पटीशन से निकले पब्लिक सर्वेंट ऐसे भ्रष्टाचारों से निपटने के उपाय क्यों नहीं ढूंढ़ पाए?

क्योंकि भ्रष्टाचार के द्वारा जहां एक जूनियर कर्मचारी कुछ सौ रुपए कमाता है, वहीं उच्चाधिकारी और उनसे भी बढ़कर राजनीतिज्ञ और बड़े बड़े उद्योगपति अरबों कमा ले जाते हैं।

एक तरह से संस्थागत भ्रष्टाचार में सभी का हित निहित हो गया था। भ्रष्टाचार मिटाने के लिए हम कोसेंगे, नारे देंगे, और जब उन नारों के द्वारा सरकारी नौकरी या सत्ता में आ जाएंगे तो स्वयं भ्रष्टाचार में लिप्त हो जाएंगे।

हम लोग शायद कहीं ना कहीं अपने अंदर यह महसूस करते हैं कि भ्रष्टाचार हमारी नसों में घुस गया है। लेकिन हम उस तथ्य को स्वीकार करने से हिचकते हैं।

उदहारण के लिए, सब्जी-फल खरीदना, जिसमें काँटा मार दिया जाता है या सड़े-गले फल पकड़ा दिए जाएं, टैक्सी या ऑटो मीटर से ना चले, कुली चौगुने पैसे मांगे, प्राइवेट डॉक्टर जानबूझ कर महंगा इलाज करे, दो वकील आपस में मिलकर क्लायंट को बेवक़ूफ़ बनाएं, ज्वेलर 22 कैरट का कहकर 14 कैरट का सोना पकड़ाए, हलवाई मिठाई डब्बे के साथ तौल दे या मिठाई में रंग मिला दे, पड़ोस के घर बाग़ से फल-फूल चुरा लेना, ट्रेन में सीट के लिए घूस माँगना-देना, पांच सौ रुपये या दिखावटी लोन माफ़ी के वायदे पर वोट दे देना यह जानते हुए भी पार्टी नेतृत्व चोर है, इत्यादि शामिल हैं।

अनेक ऐसे उदहारण हैं, जिनमें सतही रूप से सरकार का कोई रोल नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी हमारी मानसिकता को अच्छी तरह समझते हैं। तभी वह भ्रष्टाचार को मिटाने के लिए संस्थागत उपाय कर रहे हैं। कैशलेस इकॉनमी, GST, आधार कार्ड से बैंकिंग व्यवस्था और सब्सिडी को जोड़ना इसी प्रक्रिया का अंग है।

यह अच्छी तरह पता है कि गुमनामी का फायदा उठा कर के ही सरकारी कर्मचारी, राशन दुकानदार, पटवारी, उद्योगपति, सब के सब अनुचित फायदा उठा ले जाते हैं।

यह कैसे पता चलेगा कि नरेगा का पैसा रामलाल को ही मिला या सरकारी कर्मचारी हज़म कर गया? रजिस्टर में तो मजदूरी रामलाल को ही मिली है। आधार से यह व्यवस्था समाप्त हो गई है। अब रामलाल को पैसे उसी के बैंक अकाउंट में भेजे जा रहे हैं जो आधार से जुड़ा हुआ है। अब कोई फर्जी ‘रामलाल’ मजदूरी नहीं ले सकता। फर्जी कंपनियां ऐसी ही तकनीकी के द्वारा पकड़ी जा रही हैं।

रियल इस्टेट में होने वाले भ्रष्टाचार को रोकने के लिए प्रधानमंत्री एक कानून ले कर के आए जिससे प्रॉपर्टी खरीदने वालों के हित सुरक्षित रहेंगे और जिससे अचल संपत्ति के क्षेत्र में पारदर्शिता आयी है।

इसके अलावा याद कीजिए कि पेंशन में होने वाले भ्रष्टाचार को प्रधानमंत्री मोदी ने कैसे समाप्त किया। पहले पेंशन के लिए आप दौड़ते रहते थे। अब पेंशन के पेपर तैयार हो जाएंगे। बाद में देखा जाएगा की कोई कमी रह गई है तो उसे कैसे वसूलना है।

इसी तरह चतुर्थ और तृतीय श्रेणी के कर्मचारियों की नियुक्ति के लिए साक्षात्कार का ड्रामा बंद कर दिया गया है। मार्कशीट और सर्टिफिकेट के सत्यापन को बंद करना इसी प्रक्रिया का हिस्सा है।

यह सत्य है कि भाजपा सरकारें भी भ्रष्टाचार मुक्त नहीं हैं। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि प्रधानमंत्री हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठे हैं। वह भ्रष्टाचार मिटाने के लिए नियम कानून को बदल रहे हैं।

क्या पूर्व की सरकारों ने ऐसे संस्थागत प्रयास किए थे? क्या इन प्रयासों का परिणाम दिखाई देना शुरू नहीं हो गया है?

आखिरकार आपके पास क्या सुझाव है कि फल-सब्जी का ठेला लगाने वाले को घूस ना देना पड़े?

अगर आपके पास बेहतर सुझाव है तो उसे ज़रूर लिखिए और प्रधानमंत्री मोदी को भी भेजिए।

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