आर्य कोई जाति नहीं, ना ही कोई वर्ण या किसी विशेष स्थान के निवासी

आर्य कौन थे? आर्य होना क्या है? ऐसे सवाल अमूमन मुझसे पूछे जाते हैं। विशेषरूप से यह जानते ही कि मैं आजकल ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ लिख रहा हूँ। और फिर उसकी सरल व्याख्या की अपेक्षा की जाती है।

आर्य कोई रेस नहीं थी। यह उनकी कल्पना है जो आर्यों को बाहरी और आक्रमणकारी दिखाना चाहते हैं (आर्य बाहरी नहीं थे इसका प्रमाण सहित व्याख्या इसी पुस्तक में विस्तार से है), जिससे वे फिर आर्य-राक्षसों के बीच के युद्ध को माध्यम बना कर अपने झूठ को प्रमाणित कर सकें।

लेकिन झूठ तो झूठ है, वो अधिक देर तक टिक नहीं पाता। यही कारण है जो इन लोगों को एक झूठ के लिए फिर अनेक झूठ बोलना पड़ता है। यहां सबसे पहले तो ये झूठा गिरोह अनार्य होने का एक उत्तम उदाहरण है।

आर्य कोई जाति भी नहीं है, ना ही कोई वर्ण है, ना ही ये कोई विशेष स्थान के निवासी हैं। यकीनन ये इसी देवभूमि की संतान थे। तो फिर सवाल उठता है कि अनार्य कौन थे? वे भी इसी भूमि की संतान थे, कहते ही भ्रम होता है, और होना भी चाहिए। इसे समझने के लिए आगे चलते हैं।

आर्य श्रेष्ठ थे। अब यह श्रेष्ठ होना क्या है, क्या यह पढ़ा-लिखा होना, गुणवान होना आदि आदि है? यह कहने सुनने में तो ठीक है मगर समझा नहीं पाता। ज्ञानी तो रावण भी था और वो शक्तिशाली भी था, मगर वो तो आर्य नहीं। हाँ विभीषण आर्य कहलायेगा। रावण की पत्नी मंदोदरी आर्या हैं जबकि आर्यपुत्र दशरथ की महारानी कैकेयी आर्या नहीं हैं। एक तरफ जहां माता सीता होना ही आर्या होने को परिभाषित करता है तो दूसरी तरफ श्रीराम आर्यपुत्र हैं, आर्य होने के सर्वोत्तम उदाहरण हैं।

धृतराष्ट्र आर्यपुत्र होते हुए भी आर्य नहीं थे वहीं दासी पुत्र विदुर आर्य हैं। सभी कौरव अनार्य हैं। दुर्योधन तो दुष्ट है, राक्षस है, अनार्य होने को सच्चे अर्थों में परिभाषित करता है। पांडव आर्यपुत्र हैं तो श्रीकृष्ण यदुवंशी होते हुए भी आर्य हैं।

आर्य होना एक विचार है, संस्कार है, व्यक्तित्व है, जीवन शैली, जीवन संस्कार है। इसे दो उदाहरण से आज के संदर्भ में परिभाषित करना चाहूंगा।

घर पर एक बढ़ई को कुछ काम के लिए लगाया था। वो अपने काम में तो निपुण था मगर यह समझ आ गया था कि लालची है, लोभी है, आज की शब्दावली में व्यवसायी है, प्रोफेशनल है। वो मुझसे अधिक कीमत ले रहा था यह मैं जानता था मगर उसके काम की गुणवत्ता के कारण उसे काम देने के लिए मजबूर था।

सरल शब्दों में कहूँ तो जब उसने काम प्रारम्भ किया तो वो अनार्य था। काम करने के दौरान मेरी उसके साथ सनातन संस्कृति और हिंदुत्व जीवन दर्शन पर बात होने लगी। वो ध्यान से सुनता और विचारविमर्श करता। मैंने देखा वो संवेदनशील है।

एक महीने बाद जब वो काम समाप्त कर जाने लगा तो उसने मुझे बिल के पैसों में से कुछ पैसे लौटाए थे। पूछने पर कहने लगा, ‘मेरे जितने बनते थे उतने मैंने रख लिए’। यह कहते हुए उसकी आँखों में एक चमक उभरी थी, यह उसका आर्यत्व था जो जाग कर उठ खड़ा हुआ था। यकीनन उस दिन के बाद उसमें संतोष और जीवन सुख का सच्चे अर्थों में अहसास हुआ होगा।

पिछले दिनों, एक शाम एक मंदिर के बाहर बैठे एक भिखारी को जब मैंने एक पुराना स्वैटर देना चाहा तो उसने लेने से इंकार कर दिया था। कहने लगा कि ‘मेरे पास दो-दो हैं, आप उसे दे दो, वो यहां नया आया है और उसके पास गरम कोई कपड़े भी नहीं’। जिस तरफ उसने इशारा किया था वो एक अपाहिज बुजुर्ग था जो अपनी तिपहिया साइकल में मंदिर के मुख्य द्वार से दूर बैठा था। ये बाहर बैठा भिखारी आर्य है और शायद अंदर पूजा कर रहे अनेक पुजारी आर्य ना हों, जो पूजन से अधिक दान पर ध्यान रखते हैं।

अब आर्य होना मुश्किल है। इसलिए तो इसे कलयुग कहते हैं। आज के संदर्भ में पृथ्वीराज चौहान आर्य था। उसने मुहम्मद गौरी को अनेक बार पराजित करके माफ़ किया, क्योंकि वो अपना राजधर्म निभा रहा था जबकि मुहम्मद गौरी ने अपने अनार्य होने का प्रमाण तब दे दिया जब उसने धोखे से पृथ्वीराज चौहान को हराया और फिर धर्म परिवर्तन का दबाव डाला, ना मानने पर अँधा तक कर दिया।

एक तरफ जहां बाबर, अकबर से लेकर औरंगजेब अनार्य है वहीं महाराणा प्रताप और शिवाजी आर्य हैं। आज के संदर्भ में ब्लैक मनी वाले अनार्य हैं, भ्रष्टाचार वाले अनार्य हैं, जो व्यवस्था को नहीं मानते, अतिरिक्त धन संचय में लीन हैं, देश द्रोही हैं, समाजविरोधी हैं, वे अनार्य हैं।

हर युग में अनार्य भी शक्तिशाली रहे हैं और उनके और आर्यों के बीच संघर्ष होता रहा है। सतयुग त्रेता और द्वापर में था तो आज भी है। यह आर्य अनार्य के बीच का संघर्ष हर काल हर देश में होता है। हमारे भीतर भी होता रहता है। यह संस्कार वालों और संस्कारहीन के बीच का संघर्ष है। आज के युग में, समाज में, राजनीति में भी आर्य और अनार्य को पहचानना मुश्किल नहीं।

आर्य होना अग्नि के समान होना है। यह उदात्त संस्कृति है। आर्य स्वर्ग की कामना नहीं करता बल्कि इस धरा को ही स्वर्ग बनाना चाहता है। वो प्रकाश में जीता है वो अंधेरों से दूर होने के लिए प्रयासरत रहता है। इसलिए सूर्योदय में सबसे पहले सूर्य की वंदना करता है।

अंत में कह सकते हैं कि आर्य अग्निपुत्र है जो सूर्य को धरती पर उतारता है।

(अपनी आने वाली पुस्तक ‘मैं आर्यपुत्र हूँ’ से)

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