नस्ल वही ज़िंदा रही जिसके वर्तमान ने दी अपने स्वार्थ को तिलांजलि

कई लोग कहते हैं, मोदी जी में killer instinct की कमी है। Ruthlessness का अभाव है। पहले मैं भी यही सोचता था, अब कुछ बातें समझ आई इसलिए सोच बदल गयी है। वही बातें साझा करना चाहता हूँ।

किलर इन्स्टिंक्ट का अर्थ किसी को समझाने की शायद आवश्यकता नहीं, आज ये शब्द हमारी भाषा का भाग सा बन गए हैं। Ruthlessness की बात करना चाहूँगा क्योंकि ये शब्द की कई अर्थच्छटायेँ हैं। शब्द कोश में Ruthlessness के कुछ इस तरह से अर्थ दिये गए हैं – निर्मोही, निर्मम, करुणा शून्य, निष्ठुर, निर्दयी, क्रूर। अलग अलग भावों का पूरा spectrum है।

हम बात अक्सर निर्मोही की करते हैं, लेकिन क्रूर को देखते नहीं हैं। शायद हमारे मन में वो भाव ही नहीं है। लेकिन वास्तविकता अलग होती है।

हमें यह समझना चाहिए कि मोदी स्वयं कुछ नहीं कर पाएंगे, उनके हुक्मों की तामील सरकारी तंत्र द्वारा ही होगी। देश का प्रधान मंत्री स्वयं जाकर किसी को अरेस्ट नहीं करता और ना ही किसी के नाम का अरेस्ट वॉरेंट निकलता है। इस काम के लिए अलग मंत्रालय है, अलग ढांचा है। सब से बड़ी समस्या यही है और मोदी जी को यह खूब समझ में आता है। समस्या को तफसील से समझते हैं। कृपया अगले तीन पैराग्राफ धैर्य से पढ़ें, बात समझने के लिए यह आवश्यक है।

इमरजेंसी – इंदिरा द्वारा घोषित आपातकाल का आप को अनुभव न हो तो कम से कम मालूम तो है। जो बात अपने यहाँ हाइलाइट की जाती है वह यह है कि इसके लिए तत्कालीन माँ बेटा इन्दिरा और संजय को ही जिम्मेदार माना जाता है। अधिक से अधिक उनके जो करीबी रहे उन बड़े नेताओं के नाम भी लिए जाते हैं। इससे इतर असली गुनहगारों को हम जानते नहीं, वे आज सम्मानित ज़िंदगी जी रहे हैं।

इमरजेंसी की असली सख्ती बरतने वाले तानाशाह थे अफसर और सरकारी कर्मचारी और उनके साथ जुड़े काँग्रेस के ज़मीनी कार्यकर्ता। लोगों की सूचियाँ इन्होंने बनाई थी, जिस राज्य के थे वहाँ के मुख्यमंत्री को भी पता नहीं होता था कि किसको किसको अंदर किया गया है। अगर किसी की पहुँच हो तो अप्रोच लगाकर निकल लेते थे।

सूची में नाम लिखाने की धमकी से भी वसूली होती रही। लिखा नाम हटाने की कीमत भी वसूली गयी। हिसाब भी बराबर किए गए क्योंकि कोई सुनवाई थी ही नहीं। सख्ती से परिवार नियोजन के नाम पर जो हुआ वह भी हिंदुओं को ही सब से अधिक झेलना पड़ा, मुसलमानों के गिनती के केस हुए और वे भी उन्होंने बढ़ा-चढ़ाकर गाये बजाए, वैसे भी इस्लाम तो रिलीजन ऑफ प्रोपगण्डा है ही।

लेकिन क्या किसी को किसी अफसर का नाम याद भी है? किसी को तब भी याद नहीं रहा, पूरा गुस्सा माँ बेटे इन्दिरा संजय पर ही निकला। अफसर सब आराम से रिटायर हुए और आज इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं, किसी को इनके इमरजेंसी दौर के काले कारनामे याद नहीं।

और सब से दु:खद बात यही है कि इनके victims (पीड़ित) भी अपने द्वारा सही गई यातनाओं के लिए इन्दिरा और संजय को गुनहगार मानते हैं, इन लोगों को नहीं। इनको वे अपना ही मानते हैं।

आज ये सब क्यों लिख रहा हूँ? क्योंकि आज सारा सरकारी अमला मोदी को भगाने के लिए बेताब है। कारण लिखने की आवश्यकता नहीं, आज सरकारी नौकरी पाने के लिए लोग इतनी मेहनत क्यों करते हैं और रिश्वत जुगाड़ सब का सहारा क्यों लेते हैं यह सब जानते हैं, देश की सेवा करने के लिए तो यह नहीं होता।

सरकारी योजनाओं के अमल में प्रोसीजर के दायरे में रहकर भी जनता को कितनी तकलीफ दी जा सकती है, यह हर आदमी जानता है जिसका भी सरकारी तंत्र से कहीं पाला पड़ा हो।

मोदी सरकार की योजनाओं में भी आधार के कारण लोगों को कितनी तकलीफ़ें हो रही है यह बढ़ा चढ़ा कर बताया गया। आधार कार्ड नहीं इसलिए चावल नहीं दिया तो लड़की भूख से ‘भात भात’ कहते हुए मर गयी, यह किस्सा अभी भी आप को याद होगा। वो लड़की कहाँ की थी उस गाँव का नाम भी किसी को पता नहीं, कहाँ है वह भी किसी को मालूम नहीं लेकिन वो भात भात का बेसुरा गाना सब को याद है।

यह इतनी बड़ी खबर कैसे बनी? क्योंकि बनाई गयी। किसने पहुंचाई और सब से बड़ी बात, वो कौन था जिसने आधार कार्ड न होने से चावल देने को मना कर दिया? उसका नाम, पदनाम किसी को पता नहीं, मुझे भी पता नहीं है।

इस घटना को नेशनल खबर बनाने वाले किसी पत्रकार को पूछिए, उनके पास भी होगा तो उन्होने किसी को बताया नहीं, बस इस घटना के लिए आधार और मोदी को ज़िम्मेदार ज़रूर बना दिया। और जो कर्मचारी होगा जिसने यह चावल दिया नहीं होगा, वह नियमों पर उंगली रखकर आराम से बच गया होगा कि साहब मैंने तो नौकरी के नियमों का ही पालन किया है।

तात्पर्य यही है कि ruthlessness के लिए छूट दी गई तो प्रशासन उसका गलत फायदा उठाएगा ही। निर्मोही शब्द इनके डिक्शनरी में नहीं लिखा होता, ये सीधा क्रूरता का कहर बरपाएंगे। क्योंकि उसका नुकसान मोदी को होना है, इनका तो सभी तरह से फायदा है। इनके कहर से पीड़ित जनता मोदी को हटाये तो इनके अच्छे दिन शुरू, मोदिया इनसे वाकई काम भी करवा रहा है। नुकसान से बचने के लिए जनता से जो मिले वो भी इनका फायदा ही है।

Ruthlessness के नुकसान ही हैं क्योंकि उसका अमल सिस्टम द्वारा किया जाएगा। और सिस्टम क्या है यह सब जानते हैं। धैर्य से काम लेना होगा, हमारे पूर्वज हमें हिन्दू रखने के लिए इससे भी कठोर समय से गुज़रे हैं। आज वैसी सत्ताओं से लड़ने की हमारी सामाजिक क्षमता नहीं बची है, दो दिन इंटरनेट बंद रहा तो हमारे प्राण निकलने को आ जाते हैं। और हमारे शत्रु जो तब थे वैसे ही आज भी हैं, उल्टा हम ही अपने पूर्वजों के बनिस्बत बेहद निर्बल निरीह हुए हैं।

आज समय ही हमारा शस्त्र है। शायद आप ने समय को कभी इस तरह देखा नहीं होगा। यह पाँच साल हमें अपने लिए चाहिए, काँग्रेस को सत्ता से बाहर रखने से ही उसके पाले हुए तंत्र से लोग रिटायर होते रहेंगे, मकड़जाल क्षीण होता जाएगा। मोदी के सत्ता में रहते उन्हें आप को सेवा भी देनी पड़ रही है, अब जहां काँग्रेस विधानसभा चुनावों में लौटी है वहाँ सेवा में तत्काल पड़ा हुआ फर्क दिख ही रहा है।

इसलिए 2019 में दुबारा मोदी। भाजपा के लिए नहीं, देश को हमारे लिए काँग्रेसमुक्त रखने के लिए। हमारे वंशजों के लिए हिंदुस्तान स्वतंत्र रखने के लिए।

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