देखिए, ये सुपर फिक्स टाइमिंग, जिसे हम कहते हैं संयोग

कल दिल्ली के प्रगति मैदान में लगे विश्व पुस्तक मेला 2019 का पहला दिन था. मैं शाम को नोएडा से लौट रहा था तो प्रगति मैदान में अचानक उतर कर पुस्तक मेला जाने का मन होने लगा. मैं घूमते-घूमते परमहंस योगानंद जी के योगदा सोसायटी के स्टाल पर किताबें देखने लगा.

मेरे पास “योगी कथामृत” थी, पर पढ़ने के लिए कौन ले गया था अब मुझे याद ही नहीं आ रहा है. मेरा कमरा किताबों से भरा है. दो-तीन साल से कोई किताब नहीं खरीदना चाहता हूँ, क्योंकि अगर और किताबें घर में रहेंगी तो मुझे बाहर रहना पड़ेगा. यही सोचकर कुछ पुस्तक लेना चाहता था पर मन को मना लिया कि किंडल पर सॉफ्ट रूप खरीद लूँगा.

मैं वहाँ से काफी दूर के हॉल में चला गया था. एक जगह बैठकर फेसबुक खोला. पहला ही पोस्ट Nidhi Rajrani जी का था और वो भी परमहंस योगानंद जी से ही संबंधित था. वो कह रही थीं कि मैंने कभी सोचा नहीं था कि गुरु परमहंस योगानंद मुझसे कभी संपर्क करेंगे, लेकिन ये सच हो गया. वे उनकी कृपा से कृतज्ञ अनुभव कर रही थीं. मैं मालिक का इशारा समझ गया और फिर से परमहंस योगानंद जी के स्टॉल पर जाकर अपनी पसंद की सारी पुस्तकें खरीद ली.

ये सच है कि किताबों की तुलना किसी सॉफ्टवेयर से नहीं की जा सकती. मेरे पास सैकड़ों किताबें सॉफ्ट रूप में हैं, पर शायद ही कभी उन्हें खोलकर देख पाता हूँ. वैसे भी आध्यात्मिक पुस्तकों को आँखों के सामने पुस्तक रूप में ही रखना चाहिए. ये साक्षात उन संतों, महात्माओं का आशीर्वाद है. मैंने अनेकों बार अनुभव किया है कि ज्योतिष के अनेकों सूत्र का सिर्फ शब्दार्थ ही किताबों में लिखा है, उसमें छिपा ज्ञान कभी-कभी अचानक से बुद्धि में प्रकाशित होता है, ये ज्ञान का प्रकाशित होना ही ऋषियों का आशीर्वाद है.

शाम देर हो रही थी और स्टॉल पर मैं आखिरी पुस्तक क्रेता था. मैं किताबें चुन-चुनकर एक जगह रख रहा था. वहाँ सेवा कर रहे एक बुजुर्ग भक्त प्रसाद जी मुझसे बोलें कि क्या ये किताबें आपने चुनी है? मैं बोला नहीं, इन पुस्तकों ने मुझे चुना है. वे बेचारे मुस्कुरा कर आगे चले गये. सज्जन लोगों को देखता हूँ तो आत्मियता से शरारत करने लग जाता हूँ. एक बेचारे यही तो हैं जिन्हें छेड़ा जा सकता है, दुर्जन तो तत्काल करंट मार देंगे.

स्टॉल पर सात भक्त सेवा कर रहे थें, जिनमें से छ: ही उपलब्ध थे, बाकी एक भक्त पहले ही निकल गए थे. कोई दीदी प्रसाद लेकर उन बुजुर्ग प्रसाद जी को प्रसाद देते हुए बोली कि ये प्रसाद आपके लिए है. मुझे फिर शरारत सूझी, मैं उनकी तरफ घूमकर बोला कि बाबा आपका तो नाम भी प्रसाद है और आपको मिल भी रहा प्रसाद है, ये तो डबल प्रसाद हो गया. वहाँ उपस्थित सभी भक्त हँसने लगे.

दीदी ने मुस्कुराते हुए एक डब्बा मुझे पकड़ा दिया और बोली कि आज परमहंस योगानंद जी का शुभ जन्मदिन है, ये उसी का दिव्य प्रसाद है. उन सात सेवारत भक्तों के लिए सात डिब्बों में प्रसाद आया था पर एक भक्त पहले चले गए थे, इसलिए ये अतिरिक्त डिब्बा मेरे हिस्से आ गया. मैं भावुक होकर वो प्रसाद ग्रहण कर लिया. आज मैं भी अनुगृहीत हुआ.

मैं ये सब इसलिए लिख रहा हूँ कि उस महाचिति की लीला को आपलोग भी देखिए. ये सुपर फिक्स टाइमिंग, जिसे हम संयोग कहकर इग्नोर करते रहते हैं, उसमें इतनी एक्युरेसी कैसे है? ये मेरी समझ से परे है. वो हमें ऐसे जबर्दस्ती किताब खरीदवाकर, प्रसाद में हलुआ खिलाकर घर भेज देता है और इतना करते हुए भी कहीं दिखता नहीं है.

तुलसी बाबा ने उस नटखट के लिए ही लिखा है – “बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना। कर बिनु करम करइ बिधि नाना॥ आनन रहित सकल रस भोगी। बिनु बानी बकता बड़ जोगी॥ [भावार्थ- वह (ब्रह्म) बिना ही पैर के चलता है, बिना ही कान के सुनता है, बिना ही हाथ के नाना प्रकार के काम करता है, बिना मुँह (जिह्वा) के ही सारे (छहों) रसों का आनंद लेता है और बिना वाणी के बहुत योग्य वक्ता है।]

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