बड़ा और पेचीदा सवाल है कि कौन सही है और कौन गलत! RBI या सरकार?

हम अपनी जमा पूँजी बैंक में रखते हैं। फिक्स्ड डिपॉज़िट, बांड्स, सेविंग अकाउंट में।

हम कितना पैसा सेविंग अकाउंट में रखते हैं? निर्भर करता है कैश की हमारी ज़रूरत कितनी है।

कोई भी अपनी जमा पूँजी केवल सेविंग अकाउंट रखना नहीं चाहेगा। हर व्यक्ति अधिकतम पैसा FD के रूप में रखना चाहेगा ताकि उस पैसे पर ब्याज़ की कमाई हो।

यदि कोई व्यक्ति अपनी तमाम जमा पूँजी का अधिकतम हिस्सा सेविंग अकाउंट में रखना चाहे कि न जाने कब एक्सीडेंट हो जाये, कोई बीमारी हो जाये और एकदम पैसे की ज़रूरत पड़े, तो क्या हो? ऐसे व्यक्ति को क्या सलाह रहेगी?

मोदी सरकार और रिज़र्व बैंक में हाल में हुई तनातनी कुछ इसी तरह की थी। और ये तनातनी हालिया नहीं थी, बल्कि कई साल पुरानी थी। तब जब रघुराम राजन रिज़र्व बैंक के गवर्नर थे।

मोदी सरकार का मुख्य चुनावी नारा विकास था। स्मार्ट सिटी के सपने थे। औद्योगिक विकास की तेज़ गति थी जिसके लिए ज़रूरी था कि बैंकों की ब्याज़ दरें कम हों।

और बैंकों की ब्याज़ दर रिज़र्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति से कंट्रोल करता है।

मोदी जी को जब सत्ता मिली, तब भारत की इकॉनमी हिली हुई थी। लेकिन तेल के दाम कम होने से उनको काफी राहत मिली। तेल के दामों में आयी कमी का फायदा आम जनता को नहीं दिया गया, बल्कि उस पैसे से सरकारी खज़ाना भरा गया। तमाम सरकारी योजनाओं में पैसा लगाया गया। बजटीय घाटा नियंत्रण में लाया गया।

बाजार में तेज़ी आयी, भारत भर में इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण चला, सरकारी पैसे के बल पर विकास दर 6% पर बनी हुई थी।

फिर आया विमुद्रीकरण, डिमॉनेटाईज़ेशन। विमुद्रीकरण के घोषित ऑब्जेक्टिव में काले धन से लड़ाई के अतिरिक्त एक उद्देश्य ये भी था कि बैंकों में पैसा जमा होगा। और बैंक निजी क्षेत्र को सस्ते दरों पर लोन दे सकेंगे।

सरकार को आशा थी कि रिज़र्व बैंक ब्याज़ दरें सस्ती करेगा।

जहाँ सरकार का दायित्व विकास में तेज़ी लाना है, नौकरियों का सृजन है। इंफ्रास्ट्रक्चर निर्माण है।

वहीँ रिज़र्व बैंक का मूल दायित्व इन्फ्लेशन यानी महंगाई पर नियंत्रण हैं। तेज़ विकास दर अपने साथ हाई इन्फ्लेशन लाती है। और अगर तेज़ विकास दर नियंत्रित न रहे या रिसेशन का खतरा मंडराता रहे तो देश की इकॉनमी डूबने का खतरा रहता है।

यानी सरकार और रिज़र्व बैंक को मिलकर काम तो करना है लेकिन उनके उद्देश्य एक दूसरे के विरोध में रहते हैं।

इसलिए दोनों में आपसी सामंजस्य बहुत ज़रूरी होता है और इसीलिए रिज़र्व बैंक का स्वतंत्र होना भी।

सरकार का दबाव रघुराम राजन पर विमुद्रीकरण घोषित करने से पहले भी था कि वो ब्याज़ दरें सस्ती करें।

मोदी सरकार के चार साल में जो नहीं हो पाया वो था निजी निवेश में वृद्धि। निजी निवेश सस्ती ब्याज़ दरों से मिलना था। और बिना निजी निवेश के सरकारी खर्च के बलबूते विकास दर को बढ़ाया नहीं जा सकता, न सस्टेन किया जा सकता है।

रघुराम राजन पहले ही बैंकों के NPA से जूझ रहे थे। हर नयी तिमाही पर बैंकों के NPA में लगातार वृद्धि हो रही थी।

विश्व भर में मंदी के संकेत थे। तेल के दामों में कमी के बावजूद अस्थिरता थी।

रघुराम राजन ब्याज़ दर सस्ती करने को तैयार नहीं थे।

लगातार दबाव के बावजूद जब राजन ने ब्याज़ दरें कम नहीं की, तब सरकार ने दूसरा उपाय सोचा।

तब तक ब्याज़ दरें निश्चित करने का काम अकेले रिज़र्व बैंक के गवर्नर का था। सरकार ने रिज़र्व बैंक के एक्ट में संशोधन किया। ब्याज़ दर तय करने के लिए 6 लोगों की मॉनेटरी कमेटी बनी, जिसमें 3 सरकार के नॉमिनेटेड सदस्य थे, दो रिजर्व बैंक, तीसरे गवर्नर।

प्रेमचंद की मशहूर कहानी है, पंच परमेश्वर। जहाँ पंच की कुर्सी पर बैठकर आदमी अन्याय नहीं कर पाता।

सरकार द्वारा नामित सदस्य स्वयं इस ज़िम्मेदारी को ग्रहण करने के बाद देश के आगे हालात देखते हुए ब्याज़ दरें सस्ती नहीं कर पाए। पिछले दो सालों में ऐसी हिम्मत नहीं जुटा पाए।

रघुराम राजन के बाद आये उर्जित पटेल भी ये हिम्मत नहीं कर पाए।

और इसके उलट, सरकारी बैंकों के बढ़ते NPA की वजह से रिज़र्व बैंक का शिकंजा उन पर और बढ़ा। तमाम बैंकों के लोन देने पर रोक लगी हुई थी।

पंजाब बैंक के घोटाले ने स्थिति और ख़राब की।

लेकिन असल स्थिति बिगड़ी IL&FS (Infrastructure Leasing and Financial Services Ltd) के लोन डिफाल्ट करने के बाद।

अब सरकारी बैंको के बाद NBFC (Non Banking Financial Companies) पर रिजर्व बैंक का कड़ा रूख था, लोन डिस्बरस्मेंट पूरी तरह रूका हुआ था।

पूरे बाजार में लिक्विडिटी की कमी थी।

मोदी सरकार ने IL&FS पर अच्छा कंट्रोल किया। उसके प्रभाव को बाज़ार में फैलने से रोक दिया।

और फिर सरकार ने रिज़र्व बैंक से पुनः आग्रह किया। लिक्विडिटी बढ़ाने का। NBFC, MSME (Micro, Small & Medium Enterprises) को हो रही परेशानियों पर विचार करने का। सरकारी बैंकों पर PCA (Prompt Corrective Action) के तहत लगी रोक पर कुछ छूट देने का।

और रिज़र्व बैंक से एक स्पेशल अनुरोध किया गया कि वो अपने रिज़र्व से सरकार को डिविडेंड के रूप में कुछ लाख रूपये दे।

ये रिज़र्व, रिज़र्व बैंक मेंटेन करता है कि अगर रुपया डॉलर के रूप में मज़बूत होने लगा, 40 पहुँच गया, 20 रुपया प्रति डॉलर पहुँच गया तो क्या होगा। ये पैसा फोरेक्स रिज़र्व और गोल्ड रूप में संग्रहित रहता है।

अब सवाल, लेख के पहले पैराग्राफ वाला है।

कितना पैसा आप सेविंग अकाउंट में रखना चाहेंगे?

डॉलर कमज़ोर न हो, 40 – 50 रूपये या उसके नीचे न पहुंचे, इसके लिए रिज़र्व बैंक ने 9 लाख करोड़ ब्लॉक कर रखे हैं।

इसी तरह रिज़र्व बैंक की नीतियों के चलते हर बैंक के हज़ारों करोड़ रूपये कैश रिज़र्व रेश्यो मेंटेन करने में, कैपिटल रिज़र्व रखने में फंसे हैं, जिनका कुछ छोटा हिस्सा, जो इंडस्ट्रीज़ को लोन के रूप में मिल सकते हैं, भारत के लिए बड़ी रकम है। सरकार चाहती थी, इस रकम से कुछ उसे मिले। सरकारी योजनाओं में वृद्धि हो। चुनावी साल में यूँ भी सरकारी खर्च ज़्यादा होगा।

इस बार रघुराम राजन की जगह उर्जित पटेल थे। उन्होंने भी इस्तीफ़ा देना मंज़ूर किया। लेकिन दबाव के आगे नहीं झुके।

अब सरकार एक और कमेटी गठित करना चाहती है जो रिज़र्व बैंक के तमाम निर्णय लेगी। जो अभी तक अकेले गवर्नर ले रहे थे।

रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता महत्वपूर्ण है क्योंकि उसके उद्देश्य सरकार के उद्देश्य के उलट हैं।

और अगर रिज़र्व बैंक सरकार को सहयोग न करे तो इकॉनमी बढ़ेगी नहीं। सरकार अपने उद्देश्यों को पूरा नहीं कर पायेगी।

यक्ष प्रश्न है कि कौन सही है कौन गलत। रिज़र्व बैंक को सरकार को सहयोग करना चाहिए या नहीं। सरकार को रिज़र्व बैंक की स्वायत्तता बरक़रार रखनी चाहिए या नहीं।

बड़ा और पेचीदा सवाल है।

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