भारत को अंदर और बाहर से कमज़ोर करने में जुटी हैं देशतोड़क शक्तियां

वर्ष 1990 में वी पी सिंह सरकार के समय पाकिस्तान ने अफगानिस्तान से रूसी फौज हटने के बाद सारे आतंकवादियों को जम्मू-कश्मीर में लड़ने के लिए भेज दिया था।

मैंने 4 दिसंबर 2018 के लेख में विस्तार से बताया है कि कैसे आतंकवादी 26 जनवरी 1990 को कश्मीर की स्वतंत्रता की घोषणा करने वाले थे।

उस समय पाकिस्तान के विदेश मंत्री साहिबज़ादा याकूब खान ने भारत आने का निर्णय लिया जिससे वे दोनों देशों के बीच तनाव कम कर सकें।

भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री आई के गुजराल से मिलने के बाद वे दोनों साउथ ब्लॉक के गलियारे से बाहर निकल रहे थे।

एकाएक साहिबज़ादा ने कहा कि “गुजराल साहेब, इस बार की लड़ाई पिछले युद्धों की तरह साफ सुथरी नहीं होगी। आप की नदियां, पर्वत, शहर सब आग में झुलस जायेंगे। एक उस तरह की आग जिसको आप सोच भी नहीं सकते हैं और पहले दिन ही यह सब हो जाएगा।”

गुजराल अचकचा गए। वह समझ गए कि साहिबज़ादा उनको परमाणु बम गिराने की धमकी दे रहे हैं। उन्होंने अपने आप को संभाला और साहिबज़ादा से कहा कि “ऐसी बातें ना करें तो अच्छा है, याकूब साहब, क्योंकि हमने भी उन्हें दरियाओं का पानी पिया है जिनका आपने…”।

गलियारे में ऐसी धमकी क्यों दी? मीटिंग रूम में क्यों नहीं? क्योकि मीटिंग रूम में कही गयी हर बात को एक अधिकारी नोट करता है जिससे वह वार्ता ऑफिशियल रिकॉर्ड में दर्ज हो जाती है।

उस समय वायु सेना के चीफ एस के मेहरा को प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने विचार-विमर्श के लिए बुलाया। गुजराल उस मीटिंग में उपस्थित थे। उन्होंने मेहरा से पूछा कि क्या वह एक पाकिस्तानी लड़ाकू जहाज़ को भारत पर बम गिराने से रोक सकते हैं।

मेहरा ने जवाब दिया कि एयर फोर्स इस बात की गारंटी नहीं दे सकती, लेकिन अगर ऐसी घटना हुई तो हमें वापस जवाब देना होगा।

और फिर मेहरा ने पूछा कि अगर वायु सेना को जवाबी कार्रवाई करनी होगी तो क्या मैं देख सकता हूं कि हमारा परमाणु बम कैसा दिखायी देता है? किस प्लेटफॉर्म या जहाज़ पर इसे लादना होगा और कैसे इसको डिलीवर करना होगा?

मेहरा के अनुसार गुजराल एकदम से घबरा गए। मेहरा के प्रश्न में यह छुपा हुआ था कि भारत के पास उस समय ना तो बम था, ना उसको डिलीवर करने की क्षमता।

इस घटना का वर्णन शेखर गुप्ता अपने लेख में कर चुके हैं और पाकिस्तान के पूर्व विदेश मंत्री खुर्शीद महमूद कसूरी ने अपनी पुस्तक ‘Neither A Hawk Nor A Dove’ में इस ‘धमकी’ की पुष्टि की है।

पाकिस्तान के इस ब्लैकमेल को पहली बार वाजपेयी सरकार ने तोड़ा जब उन्होंने संसद पर आतंकवादी हमले के बाद मुशर्रफ की ‘धमकी’ के बावजूद सीमा से सेना हटाने से मना कर दिया।

यह मैं पहले भी पूछ चुका हूँ कि राहुल तथा अन्य ‘युवा’ नेता कैसे सीमा पार से आने वाले आतंकवाद का मुकाबला करेंगे? कैसे जम्मू और कश्मीर, आतंकवाद, नक्सलवाद से निपटेंगे? कैसे पड़ोस के फर्ज़ी ‘साम्यवादी’ देश से खतरे का मुकाबला करेंगे?

यह भी मैं लिख चुका हूँ कि कैसे नरसिम्हा राव सरकार ने सुखोई विमान का समझौता साइन होने के पहले ही लगभग 17 सौ करोड़ रुपए रूसी सरकार को दे दिया था।

विपक्ष के नेता वाजपेयी जी ने उस समय देवेगौड़ा सरकार के रक्षा मंत्री मुलायम सिंह यादव से मिलकर स्थिति को स्पष्ट किया और राष्ट्र हित में सुखोई विमान को चुनाव का मुद्दा बनाने से मना कर दिया।

अगर आप ध्यान दें तो कांग्रेस के सिवाय अन्य मुख्य विपक्षी नेता, जिनमें मुलायम और मायावती भी शामिल है, रफाल पर चुप हैं।

कई लोग यह मानते हैं कि भारत को देशतोड़क शक्तियों से खतरा है जो आतंकवाद, जातिवाद, धर्मपरिवर्तन के द्वारा राष्ट्र के टुकड़े-टुकड़े अंदर से कर देना चाहते हैं।

लेकिन अब मैं यह मानता हूँ कि राष्ट्र को एक अन्य खतरा उन लोगों की तरफ से है जो राष्ट्र की बाह्य सुरक्षा को जानबूझकर कमज़ोर कर देना चाहते हैं।

इसीलिये इन लोगों ने दस वर्ष सत्ता में होते हुए ‘सस्ते’ रफाल मिलने के बावजूद विमान नहीं खरीदा। ऊपर से प्रधानमंत्री द्वारा इन विमानों को सीधे फ्रेंच सरकार से खरीदने की प्रक्रिया पर झूठे आरोप लगा रहे हैं जिससे इन विमानों की खरीद को रद्द किया जा सके।

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