शिव जिसके चरणों में लेट जाए उस काली की संततियों को राह दिखा रही अब्राहमी बंदिनियां

आज का तो पता नहीं पर हमारे छात्र जीवन के समय में यूपी बोर्ड में छमाही परीक्षाओं के उपरांत और परीक्षाफल से पहले जांची हुई उत्तर पुस्तिकाएं स्वयं परीक्षार्थियों अथवा उनके परिजनों को दिखाने का प्रचलन था.

आज भी शायद इस तरह की क़वायद होती हो. इसका फायदा यह होता था कि परीक्षार्थी और उनके परिजन वार्षिक परीक्षाओं से पहले अपनी स्थिति और ज्ञान आदि का आंकलन कर पाते थे और कभी कभी परीक्षक द्वारा किसी सवाल पर ग़लत अंक काट लिए जाने की स्थिति में परीक्षार्थी और परिजन द्वारा आपत्ति उपरांत अंक सुधार होने की भी संभावना बनी रहती थी.

मेरी कक्षा 9 की अपनी अर्द्धवार्षिक परीक्षाओं की उत्तर पुस्तिकाओं की ऐसी ही समीक्षा के दौरान एक वाकया हुआ. मेरे दो सहपाठी जो सगे भाई भी थे, परीक्षाओं में फेल हो गए थे. उनके पिताजी भी अपने सुपुत्रों की उत्तर पुस्तिकाओं के दर्शन हेतु पधारे थे.

हालांकि छोटा भाई मात्र एक विषय में कुछ ही अंक से फेल था और बड़ा भाई तो किसी भी विषय मे उत्तीर्ण के आस पास भी नहीं था. इसके बावजूद शायद अपने बड़े होने का फायदा उठाते हुए बड़े भाई ने छोटे भाई को ही नसीहत देना शुरू कर दिया जो आश्चर्यजनक के साथ साथ हास्यास्पद भी था.

इस पर उनके पिता ने ठेठ देहाती भाषा में एक मुहावरा बोलकर बड़े पुत्र को शांत किया.मुहावरा था- “गू चिढाये गोबर को” अर्थात निकृष्टतम द्वारा अपेक्षाकृत श्रेष्ठतर का उपहास उड़ाना अथवा उपदेश देना.

ख़ैर वर्तमान हालात देखकर अनायास ही वर्षों पहले सुना यह देहाती मुहावरा ना केवल याद आया बल्कि चरितार्थ होता हुआ दिखाई दिया.
ईसाइयों और इस्लामियों द्वारा सनातन धर्म की परंपराओं को रूढ़िवादी, नारीविरोधी, समानताविरोधी और आदिमकालीन बताकर उनका विरोध ही नहीं अपितु उपहास और उन पर प्रहार करना “गू द्वारा गोबर को चिढ़ाने” जैसा ही है.

कई बीवियों के 56 साला पति द्वारा अपनी बेटी समान 6 साल की बच्ची से निकाह को ईश्वरीय मानने वाली, सदियों से हरम में नरक भोगते हुए डेढ़ ग़ज़ी दाढ़ी वाले उलेमाओं के फतवों के बोझ तले दबी, इबादतगाह में प्रवेश का सपना तक ना देख सकने वाली, बिना मर्द के घर से बाहर ना झांक सकने वाली, कुंवारेपन में ही अपने तहेरे, चचेरे, मौसेरे, यहां तक कि कुछ परिस्थितियों में सगे भाइयों की संभावित पत्नियों का जीवन जीने वाली, ससुर द्वारा बलात्कार किये जाने पर उलेमाओं द्वारा अपने पति की माँ बन जाने वाली, तीन तलाक़ पर अगले ही क्षण बेघर, बेसहारा हो जाने वाली, मर्द की अनुपस्थिति में अपने फ़र्ज़ यानी अपनी धर्मयात्रा तक पर ना जा सकने वाली, आज सीता और द्रौपदी जैसी स्वयंवर सभा में अपना सर्वश्रेष्ठ वर चुनने वाली देवियों की संततियों को फेमिनिज्म पर उपदेश दे रही हैं?

सदियों से पोप तो छोड़िए एक मात्र महिला बिशप की अनुपस्थिति पर सवाल ना उठा सकने वाली, पादरियों द्वारा सदियों से चले आ रहे यौन दुर्व्यवहार पर मौन रहने वाली आज उस उभय भारती की संततियों का उपहास उड़ा रही हैं जिनके सम्मुख आदि शंकराचार्य को भी ज्ञानअल्पता के कारण नतमस्तक होना पड़ा था.

अगर लज्जा का लेश मात्र भी इन अब्राहमी बंदिनियों में होता तो ये जान पातीं कि सनातन में फेमिनिज्म वह है जो काली के चरणों में स्वयं शिव के लेट जाने पर, रावण जैसे राक्षस द्वारा भी माता सीता के सतीत्व के सम्मान पर, माता जीजाबाई द्वारा एक अबोध बालक को शिवाजी जैसे योद्धा के रूप में परिवर्तित करने पर, विद्योत्तमा के द्वारा कालिदास से शास्त्रार्थ पर, लक्ष्मीबाई द्वारा अपने शिशु को पीठ पर बांधकर शत्रुओं की गर्दनें उड़ाने पर, द्रौपदी के चीर हरण पर स्वयं नारायण द्वारा सम्मान रक्षा पर, द्रौपदी की केश-प्रतिज्ञा की पूर्ति हेतु महाभारत जैसा अद्वितीय कुलविनाशक संग्राम होने पर परिलक्षित होता है…

सनातनी फेमिनिज्म फतवों से बने बुरक़ों और पादरियों द्वारा यौन शोषण से बंधा नहीं है बल्कि सीता, द्रौपदी के सतीत्व, लक्ष्मीबाई और झलकारीबाई की शत्रुरक्त से रंजित तलवारों, विद्योत्तमा और उदय भारती के ज्ञान और माँ जीजाबाई के लालन पालन से पोषित होकर विश्व मे अनंतकाल से अपनी स्वर्णिम आभा के साथ विराजमान है… और चिरकाल तक रहेगा.
जय श्री राम.
जय श्री सत्य सनातन.

अमित मोहन

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