शर्म इन्हें आती कहां है?

मैं बात कर रहा हूं पेटिकोट पत्रकारिता की। लगभग हफ्ते भर पहले विनोद दुआ ने अपनी खबरिया वेबसाइट पर नितिन गड़करी के साक्षात्कार एक वीडियो प्रसारित किया जिसके हवाले से उन्होंने बताया कि गड़करी अपनी ही सरकार के कामकाज पर सवाल खड़े कर रहे हैं।

बाद में उनकी पोल खोलते हुये खुद नितिन गड़करी ने अपने फेसबुक पेज पर उस साक्षात्कार के पूरे वीडियो को अपलोड करके बताया कि विनोद दुआ उस साक्षात्कार के कुछ अंशों को तोड़ मरोड़कर गलत तथ्य प्रस्तुत करते हुये डाक्टर्ड वीडियो के माध्यम से सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी और नितिन गड़करी के बीच दूरी पैदा करने की असफल कोशिश कर रहे हैं।

चूंकि विनोद दुआ एक ख्याति प्राप्त और पद्म पुरस्कार से सम्मानित पत्रकार हैं शायद इसलिये किसी चैनल ने उनके इस फर्जीवाड़े को हाईलाइट करने की कोशिश नहीं की।

फिर भी विभिन्न न्यूज चैनलों पर चलने वाली लाइव बहसों के दौरान विपक्ष के कुछ प्रवक्ता और कुछ पत्रकार भी भाजपा प्रवक्ताओं को घेरने की कोशिश में दबी ज़बान नितिन गड़करी के उस साक्षात्कार का हवाला देते रहते हैं जिसे विनोद दुआ ने प्रसारित किया था।

मतलब गड़करी के द्वारा प्रस्तुत असल वीडियो को दरकिनार करके दुआ के फर्जी वीडियो का ही हवाला एक परसेप्शन निर्माण करने की कोशिश के चलते बार-बार दिया जाता है।

पत्रकारिता के काम की गंभीरता को रेखांकित करते हुये एक मशहूर शायरी की पंक्तियों में कहा जाता है कि “कलम के सिपाही अगर सो गये तो, वतन के मसीहा वतन बेच देंगे।”

यहां यह बताने की आवश्यकता नहीं है कि कलम के सिपाही इन पत्रकारों को ही कहा जाता है जिन्हें हमारी लोकतांत्रिक ढांचे के चौथे आधार स्तम्भ के रुप में पहचान मिली हुई थी।

यह अच्छी बात है कि विनोद दुआ जैसे लोग आज न सिर्फ जाग रहे हैं बल्कि जाग कर ओवर टाइम भी कर रहे हैं। लेकिन क्या आपको पता है कि आज से पांच साल पहले तक ये क्या किया करते थे?

लगभग पांच साल पहले जब पूरे देश में कोयला, टू-जी, कॉमनवेल्थ से लगायत धरती, आकाश और पाताल तक में हुये घोटालों के जिन्न एक एक करके बाहर आ रहे थे तब ये महाशय न्यूज चैनल के माध्यम से देश भर घूम-घूम करके विभिन्न प्रकार के लजीज व्यंजन चख रहे थे।

इनकी पत्रकारिता पकवानों की थाली से शुरू होती थी और व्यजंनों की मिठास का वर्णन करते हुये समाप्त होती थी। इनके ही पदचिह्नों पर चलने वाले इनके गुरुभाई रविश कुमार जोकि आजकल जागने का विश्व रिकार्ड बनाने की कोशिश में लगे हैं, वह उस दौरान टीवी पर नाली और खड़ंजा दिखाकर चाय की चुस्कियां लिया करते थे।

इन लोगों के अलावा भी राजदीप सरदेशाई, सागरिका और अनेक नाम और हैं जिनकी पत्रकारिता एक तरह से टाइम पास पत्रकारिता हुआ करती थी। आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि जिस समय वतन के मसीहा वतन को बेच रहे थे उस समय कलम के ये सिपाही जनता को गुजराती थाली और मराठी थाली के बेसिक अंतर समझा रहे थे।

आज जब देश के प्रधानमंत्री ने खुद को चौकीदार कहके देश के खजाने को महफूज़ करने की पुरज़ोर कोशिश शुरू की है तो ना सिर्फ सत्ता में रह चुके भ्रष्टाचारियों को परेशानी शुरू हुई है बल्कि कलम की आड़ में महिलाओं का ‘मी-टू’ करने वाले विनोद दुआ जैसे पेटिकोट पत्रकारों की रोजी-रोटी भी प्रभावित हुई है।

लिहाज़ा कभी कोई पुरस्कार लौटा रहा है तो कभी कोई डर कर देश छोड़ने की धमकी दे रहा है। बाकी जो ऐसा नहीं कर सकते वह अपने आकाओं के इसारे पर फर्जी और डॉक्टर्ड वीडियो के सहारे अपनी पेटिकोट पत्रकारिता की नुमाईश लगा रहे हैं।

लेकिन बेशर्मी की हद पार कर चुके इन पेटिकोट पत्रकारों की पत्रकारिता भी खुल कर जनता के सामने आ जाती है। फिर भी ये अपने आपको वरिष्ठ पत्रकार ही कहते हैं क्योंकि शर्म इन्हें आती कहां है?

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