हम आर्य थे, आज हैं नहीं

हम यूं ही श्रेष्ठ नहीं थे।

हम यूं ही आर्य नहीं कहलाते थे।

यहां ‘थे’ पर ध्यान दिया जाये, यह कालखंड को दर्शा रहा है।

हाँ, तो जब हम श्रेष्ठ थे, तो यूं ही नहीं थे, इसके पर्याप्त कारण थे।

इनमें से एक था कि सनातन समाज में राजबल के साथ साथ धर्मबल भी था।

अब कृपया यहां धर्म को रिलीजन ना समझें। धर्म सिर्फ धर्म है। किसी और भाषा, और संस्कृति के पास इसके लिए कोई उपयुक्त शब्द है ही नहीं।

तो जब ये शब्द ही किसी के पास नहीं था/ है, तो यह उनके आचरण में कैसे हो सकता है।

और चूंकि यह धर्म हमारे पास था, तो हम श्रेष्ठ थे।

यह धर्मबल सिर्फ हमारे ऋषियों के पास ही नहीं होता था, बल्कि यहां की प्रजा के साथ भी था, और तो और वही राजा श्रेष्ठ कहलाता था जो धर्म के मार्ग पर चलता था।

सिर्फ इस धर्मबल के कारण ही श्रीराम, मर्यादा पुरुषोत्तम प्रभु श्रीराम बने।

धर्म के साथ खड़े होने मात्र से श्रीकृष्ण, युगपुरुष अवतारी कहलाये।

उन दिनों, कह सकते हैं कि धर्म का आचरण योग्यता का प्रथम पैमाना था।

इसके ना होते ही राजा अयोग्य हो जाता था।

लेख की मूल बात यहां से शुरू होती है।

हमारी पौराणिक कथाओं में अनेक ऐसे उदाहरण हैं, जहां अयोग्य राजा व युवराज को, उनकी जनता व ऋषियों ने, यहां तक कि स्वयं राजपरिवार ने हटाया।

ये वो कालखंड था जब राजतंत्र था। राजवंश में से ही युवराज और राजा बना करते थे।

पृथु एक महान सम्राट थे। यह अयोध्या के राजा हुए। (कुछ लोग इन्हे अंग देश का राजा मानते हैं, हज़ारों वर्ष पुराना इतिहास होने के कारण यह भ्रम स्वाभाविक है मगर वो यहां महत्वपूर्ण नहीं।)

बहरहाल, इस महान राजा का संदर्भ और वर्णन वेदों में भी आता है। इनके सनातन संस्कृति में अनेक योगदान हैं। यह वही राजा पृथु हैं, शतपथ ब्राह्मण के मतानुसार पृथ्वी पर सबसे पहला जिनका राज्याभिषेक हुआ था।

इनके नाम से हज़ारों हज़ार साल बाद भी हम सब परिचित हैं, मगर क्या हम जानते हैं कि इनके पिता कौन थे? राजा वेन।

राजा वेन एक अत्याचारी दम्भी अहंकारी राजा था। जैसे ही उसके कुकृत्य एक सीमा से बाहर हुए उसे प्रजा ने ऋषियों के साथ मिलकर मार भगाया था। अर्थात अयोग्य राजा को हटा दिया गया था, सदा सदा के लिए।

वेद में एक और राजा पुरुरवा का नाम आता है। यह अप्सरा उर्वशी के प्रेम में पड़कर जैसे ही अनाचारी हुआ, प्रजा ने ऋषियों के माध्यम से उसे गद्दी से उतार फेंका। अयोग्य राजा को हटाने का यह एक और प्रमुख उदाहरण है।

राजा आयु का पुत्र नहुष दुष्ट और धूर्त था। जब उसने ऋषियों पर अत्याचार करना प्रारम्भ किया तो ऋषियों ने उसे मार भगाया था और उसके पुत्र ययाति को राजा बनाया।

एक उदाहरण तो अति विशिष्ट है, जब दुष्यंत पुत्र भरत ने अपने पुत्रों को युवराज नहीं बनाया था। असाधारण प्रतिभा और शौर्य के कारण सम्राट भरत का नाम इतिहास में दर्ज है। इन्हे कौन नहीं जानता, मगर क्या हम जानते हैं कि जब इन्होंने देखा कि इनके सभी पुत्र नालायक हैं अर्थात अयोग्य हैं, तो उन्होंने ऋषि भरद्वाज को अपना उत्तराधिकारी और युवराज घोषित किया।

इस घोषणा में महारानी की स्वीकृति थी, अर्थात माता ने अपने पुत्रों के होते हुए भी उन्हें इसलिए राजगद्दी पर नहीं बैठने दिया क्योंकि वे अयोग्य थे।

विदुर ने भी तो अंतिम समय तक दुर्योधन को युवराज ना बनाये जाने का प्रयास किया था। क्यों? क्योंकि दुर्योधन अयोग्य था। और फिर ना माने जाने का दुष्परिणाम भी हम सब जानते हैं। महाभारत का महाविनाश।

अगर आप को उपरोक्त पौराणिक इतिहास की प्रामाणिकता पर शक है तो इसे साहित्य मानकर इसके संदेश को तो नहीं नकार सकते।

और फिर क्या आप चाणक्य को भी नकार देंगे? नहीं नकार सकते। उसने क्या किया था? मगध के अयोग्य राजवंश को हटाकर एक सामान्य परिवार के बालक को पद पर बैठाया था। इसमें प्रजा की भूमिका को नजरअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

परिणाम क्या हुआ? इस देवभूमि का सिंहासन, सम्राट चन्द्रगुप्त के विराजमान होने से एक बार फिर धन्य हुआ था।

आज स्थिति इसके ठीक उलट है।

हम सब कहने मात्र को प्रजातंत्र में हैं।

अब तो प्रजातंत्र के नाम पर चारों तरफ राजतंत्र है, उसमें भी अयोग्यता ही अयोग्यता है।

अंग्रेज़ों के समय से ध्यान से देखें, अयोग्य को योग्य के स्थान पर बिठाया गया। चलो आज़ादी के पहले अंग्रेजों के षड्यंत्र को समझा जा सकता है, मगर आज़ादी के बाद भी हमने यही गलती दुहराई, और एक अयोग्य को स्वीकारना हमारे लिए अभिशाप बना। इसके लिए समकालीन सभी शीर्ष और वरिष्ठ जन जिम्मेवार हैं।

उसके बाद तो अयोग्यता को ही धीरे धीरे सत्ता का पैमाना बनाया गया। जिसके कारण ही फिर प्रजातंत्र में भी राजवंश बने और बनाये गए। एक राजपरिवार से शुरू हुई परम्परा सत्तर साल में इस हालात में पहुंच गयी कि चारो तरफ राजवंश ही राजवंश हैं। और ध्यान से देखिये, उन सब में एक से एक अयोग्य युवराज।

दोष सिर्फ इनका नहीं है। अब ऋषि और विद्वान भी योग्य नहीं रहे। और हम प्रजा की अयोग्यता का तो यह हाल है कि हम में से अनेक इन अयोग्य युवराजों की मूर्खता पर भी मुग्ध होकर ताली पीटते हैं।

परिणाम हमारे समाने हैं, प्रजातंत्र में भी राजवंश की अयोग्यता पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम पर राज कर रही है।

जब विद्वान, धनवान और धर्मगुरुओं के पास धर्मबल नहीं, तो समाज में धर्म की स्थापना कैसे हो सकती हैं।

जब धर्म नहीं है तो स्वाभाविक रूप से चारों ओर अधर्म का ही बोलबाला होगा।

अधर्म के साथ हम कैसे श्रेष्ठ हो सकते हैं?

अतः हम आर्य थे, आज हैं नहीं।

ऐसे में स्वर्णिम इतिहास को यादकर सपनों में गौरवान्वित हो जाइये, और जागते ही वर्तमान की वास्तविक वीभत्सता को भोगिए।

यही अधर्म का अभिशाप है।

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