भारत से ही हुआ विश्व में शिक्षा का विस्तार

मैत्रेयी अवतरण दिवस पर यह लेख दुबारा इसलिए लिख रहा हूँ क्योंकि कुछ धूर्त आज यह पढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं कि सावित्री फुले जी महिलाओं को शिक्षा देने वाली पहली महिला हैं।

भारत में शिक्षा का इतिहास हज़ारों वर्ष पुराना है। जहां साइंस अभी आज तक पहुंच ही नहीं पाया कि यह ब्रह्माण्ड क्या है? और हम कौन हैं? वहां हज़ारों वर्ष पूर्व मैत्रेयी और गार्गेयी जैसी विदुषियां याज्ञवल्क्य जैसे ऋषियों से सीधे संवाद करती थीं।

मैत्रेयी से ऋषि याज्ञवल्क्य ने पूछा कि मैं संन्यास लेने जा रहा हूँ आओ तुम्हारा कात्यायनी से बंटवारा कर दूं।

मैत्रेयी ने पूछा कि यदि पूरे धरती की संपत्ति मिल जाय तो मेरा जीवन कैसा हो जाएगा? क्या इससे मुझे अमरत्व मिल सकेगा?

याज्ञवल्क्य ने कहा – तुम्हारा जीवन वैसा ही हो जाएगा जैसा सम्पन्न लोगों का होता है। लेकिन इससे तुम अमरता को प्राप्त नही कर सकती।

तो मैत्रेयी ने कहा :
“येनाह नामृता स्याम् किमहम् तेन कुर्याम्” – वृहदारण्यक उपनिषद।
जिस धन से मुझे अमृतत्व की प्राप्ति न हो उसको लेकर मैं क्या करूंगी?

अर्थात मुझे धन लेकर क्या करना है मुझे तो अमरत्व वाला तत्वज्ञान चाहिए। वही दीजिये।

याज्ञवल्क्य ने कहा कि तुम मेरी परम प्रिय भार्या हो तुम्हें मैं तत्व ज्ञान दूंगा तुम श्रवण के बाद इसका मन से निदिध्यासन करना।

विश्व में शिक्षा का विस्तार भी भारत से ही हुआ। 19वीं शताब्दी के पूर्व तक ब्रिटेन में शिक्षा सिर्फ फ्यूडल लोगों को ही उपलब्ध थी। 19वीं शताब्दी में चर्च ने संडे के संडे बच्चों को अक्षरज्ञान और बाइबिल का ज्ञान देना शुरू किया।

उसके बाद भारत से मोनीटोरिअल या मद्रास एजुकेशन सिस्टम को चुराकर वे अपने यहाँ ले गए – जिसका प्रसार प्रचार एंड्रेयु बेल लंकास्टर एजुकेशन के नाम से यूरोप अमेरिका और कनाडा में प्रसारित किया। (गूगल भी इस मसले में झूठ नहीं बोलता।)

अब इतिहास पढ़िए :

16वीं शताब्दी में जब यूरोप के ईसाइयों ने गैर ईसाइयों की भूमि पर हमला किया तो जिन देशों में संभव था वहां के natives (देशी लोगों) का नरसंहार कर उनकी जऱ, जोरू, ज़मीन पर कब्ज़ा कर उसको अपना राष्ट्र घोषित किया। बाकी जो बचे उनको ईसाई बना दिया।

जिन देशों में जहां मैन्युफैक्चरिंग उतनी नहीं थी जितनी कि भारत में, वहां के लोगों को गुलाम बनाकर उस गुलामी को बाइबिल से रिलीजियस सैंक्शन (मान्यता) के नाम से प्रैक्टिस किया जिसको उसी तरह aparthied (रंगभेद) नामक फैंसी नाम दिया जैसे लूट और उद्योगों के विनाश का नाम emperialism या उपनिवेश (ये कौन सा निवेश है ये बौद्धिक पिग्मी बताएंगे क्या) नाम दिया।

इन देशों में अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और 1757 के बाद ब्रिटिश भारत और यूरोपीय दस्युओं की अनेक प्रमुख नीतियां बनी।

अमेरिका में 1960 तक अपरथिड (रंगभेद) की बर्बर संस्कृति लागू रही।

ब्रिटेन और उसके गुलाम बनाये देशों में 19वीं सदी तक आम जन के लिए शिक्षा उपलब्ध नहीं थी। उसको भारत की गुरुकुल, मोनीटोरिअल या मद्रास सिस्टम ऑफ एजुकेशन के नाम से चोरी किया और एंड्रयू बेल एजुकेशन मॉडल के नाम से ब्रिटेन अमेरिका और कनाडा में शिक्षा दी।

लेकिन भारत मे अपने पालतू गुलाम बनाने हेतु उन्होंने एक अलग षड्यंत्र रचा। जिसको मैकॉले शिक्षा पद्धति कहते हैं। आज भी ये गुलाम दिनोंदिन बढ़ते जा रहे हैं।

भारत में अपनी मैकॉले शिक्षापद्धति लागू होने के पूर्व ब्रिटेन के हाउस ऑफ कॉमन्स में 1813 में एक लंबी डिबेट हुई – भारत में – रिलीजियस एंड मॉरल इम्प्रूवमेंट इन इंडिया। उसका अंतर्निहित टाइटल था – ‘क्रिश्चियनिटी का भारत में विस्तार’।

मॉरल का अर्थ सिर्फ यही था कि जो क्रिस्चियन नहीं है वो बर्बर और इम-मॉरल हैं और उनके धार्मिक रीति रिवाज़ को अंधविश्वास कहते हैं।

इसी नीति को लागू करने के लिए बाद में मैकॉले शिक्षा पद्धति को लागू किया गया।

मैकॉले ने अपने पिता को एक गुप्त पत्र लिखकर बताया कि ये शिक्षा धर्म परिवर्तन में बहुत प्रभावी है क्योंकि इस शिक्षा से पढ़ा लिखा व्यक्ति अपने धर्म और संस्कृति से घृणा और ईसाइयत का बहुत सम्मान करता है।

भारत मे मैकॉले के पूर्व की गुरुकुल शिक्षा के बारे में धरमपाल जी ने लिखा है।

किसी भी समाज में कुछ नवीन व्यवस्था करने के पूर्व वहां की पूर्व प्रचलित व्यवस्था का आंकलन आवश्यक है। इसी योजना के तहत अंग्रेज़ सरकार ने बोर्ड ऑफ रेवेन्यू को आदेश दिया कि भारत के गांवों में स्थापित शिक्षा व्यवस्था का विस्तार से 1820 से 1830 के बीच डेटा संकलित किया जाय।

उसी डेटा के अनुसार धरमपाल जी ने 100 साल से चल रहे इस झूठ का पर्दाफाश किया कि भारत में कोई शिक्षा व्यवस्था थी ही नहीं।

भारत के प्रत्येक गांव में न जाने किस अनंतकाल से पाठशाला और गुरुकुल थे। मुग़ल आये तो मदरसे भी आये।

इन पाठशालाओं की शिक्षा की गुणवत्ता ब्रिटेन के स्कूल, और बाद में भारत विकसित किये स्कूलों के गुणवत्ता से बहुत उन्नत थी।

43 पुस्तकों के पढ़ाये जाने का रिकॉर्ड दर्ज़ है इंडिया ऑफिस लाइब्रेरी लंदन में।

उसी में ये डेटा भी उपलब्ध है कि इन पाठशालाओं और गुरुकुलों में शूद्र छात्रों की संख्या ब्राह्मण छात्रों से ज्यादा थी।

संघ के विद्वान और भाजपाई इस किताब को इतने वर्ष से पढ़ रहे हैं और दूसरों को पढ़ने की सलाह भी देते आये हैं, लेकिन वे स्वयं पुस्तक को आज तक डिकोड नहीं कर पाए।

ऊपर प्रदर्शित चित्र धरमपाल कृत ‘The Beautiful Tree’ से का स्नैप शॉट है।

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