सोचिए, आपके राज्य में कौन सा है आपका ‘सबरीमला’

उपरोक्त चित्र गत 2 जनवरी को राजस्थान के तथाकथित सबसे बड़े अखबार के जोधपुर संस्करण का है।

पहले पेज पर सबसे ऊपर (कोई भी और खबर – तीन तलाक राज्यसभा में पेश होना या मोदी का इंटरव्यू- से भी ऊपर) कम्युनिस्ट सरकार द्वारा ‘wall of women’ का गर्वोन्नत होकर जिक्र है। 620 किलोमीटर लंबी इस मानव श्रृंखला को दुनिया में सबसे बड़ी बताया गया है।

खैर, ये सिर्फ इस अखबार की ही बात नहीं, लगभग हर एक हिंदी भाषी अखबार में इस ख़बर को इसी तरह पहले पेज पर हर दूसरी खबर पर तरजीह दी गयी है।

कुछ बातें, जो कोई भी अखबार बताना नहीं चाहता –

  • चार रोज़ पहले ही हाथों में प्रज्ज्वलित दीप लिए इससे ज्यादा औरतें खड़ी थीं। अगर ये कासरगोड से त्रिवेंद्रम तक 620 किलोमीटर खड़ी थी, तो वो कासरगोड से ही तमिलनाडु में कन्याकुमारी तक 798 किलोमीटर खड़ी थी। अगर ये 30 लाख है, तो वो इससे ज्यादा ही होंगी।
  • कम्युनिस्ट सरकार की इस ‘women wall’ का चर्च ने खुले तौर पर समर्थन किया। लगभग एक लाख औरतें भी इस तथाकथित ‘मुहिम’ में शामिल थी। एक लाख औरतें मतलब आधे मीटर के हिसाब से 50 किलोमीटर।

एक नन के साथ 13 बार रेप करने वाले बिशप फ्रैंको मुलक्कल को चर्च ने क्लीन चिट दी थी। यहां तक कि चर्च का जो सालाना कैलेंडर निकलता है, उसमें ‘मार्च’ 19 के महीने में बिशप आपको दिखाई देंगे। नन के समर्थन में खड़ी होने वाली 5 और ननों को चर्च ने अपनी सेवाओं से बेदखल कर दिया है।

केरल के ही एक विधायक पी सी जॉर्ज ने उस नन को ये कहते हुए ‘वेश्या’ करार दिया है कि उसने पहली बार में ही क्यों नहीं बताया, 13 बार होने के बाद तो उसे खुद को मज़ा आने लग गया होगा।

बिशप फ्रैंको मुलक्कल को 3 हफ्ते की कस्टडी के बाद जब ज़मानत पर रिहाई मिली तो फूलों से स्वागत हुआ।

मुझे अब भी आश्चर्य है, ‘gender equality’ यानि लैंगिक समानता की बात करने वाली इन एक लाख औरतों के मन में चर्च का आदेश तो रहा, पर बार बार बलात्कार झेलने वाली उस नन की दुर्दशा, चर्च की धूर्तता और उस विधायक का कमीनापन नहीं आया। वे ये नहीं समझ पाईं कि जो तकलीफ उस नन को शोषण के बाद हुई है, वैसा किसी भी ‘दुर्घटना’ के बाद इनके साथ भी हो सकता है।

  • प्रकाशित फोटो में अखबारों ने बड़े चालाकी से साड़ी पहने संभावित हिन्दू औरतों को ही दिखाया है (संभावित इसलिए क्योंकि केरल में ईसाई औरतें भी साड़ी पहनती हैं)। पग से शिख तक काला बुर्क़ा पहने औरतें नहीं दिखाई गई। क्योंकि ऐसी बातों से हिंदू मज़बूत और ‘लोकतंत्र’ कमजोर हो जाता है।

सोशल मीडिया की सच्चाई के कारण ये भी पता चला कि लाखों की तादाद में वो भी खड़ी थीं, जो हमेशा दूध में गिरी मक्खी की तरह निकाल फेंके जाने के डर में जीती हैं। कब शौहर तलाक़ दे दे, और फिर पति की गलती के बावजूद मौलवी से अपने शरीर की ज़मानत करानी पड़े।

आज तक जो देश की 3 लाख से ज्यादा मस्जिदों में कदम नहीं रख पाईं, जो हाज़ी अली और हज़रत निज़ामुद्दीन जैसे कितनी ही दरगाहों में नहीं जा सकतीं, वो हिन्दू औरतों को उनका हक़ दिलाने आयी थीं।

क्या कारण है कि कम्युनिस्ट सरकार ने लाखों के विरोध के बावजूद यह सब किया, ये सब होने दिया। 27% मुस्लिम और 18% ईसाई के सामने 54% हिन्दू नायर, इज़्हावा, ब्राह्मण और दलित में बंटा हुआ है। आज तक बंटा हुआ था, अब चाह के भी एक नहीं हो सकता। एक हो भी जाये तो नेताओं को भरोसा है कि आपको वापस कैसे तोड़ना है।

अब आप सोचिएगा, आपके राज्य में आपकी जाति का ‘सबरीमला’ कौन सा है, जहां की परंपरा को खण्ड खण्ड कर कोई अखबार किसी ‘शक्ति की लंबी दीवार’ का गुणगान करेगा।

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