ऋण माफ़ी, साम्यवाद और भारतीय किसान

आज भी याद आता है स्वतंत्रता की स्वर्ण जयंती के अवसर पर कामरेड चतुरानन मिश्र का वह भाषण जिसमें उन्होंने कहा था कि भले ही हम भूगोल की किताबों में ज़िन्दगी भर पढ़ते रहें कि भारत एक कृषि प्रधान देश है पर आज़ादी से लेकर आज तक सरकारों का ज़ोर टेक्नोलाजी के विकास पर है।  

और आज हम कम्प्यूटर साफ़्टवेयर के बेहतरीन नौकर हैं पर अपनी खेती किसानी के साहब नहीं। फिर भारत का विकास कैसे होगा? अगर कम्यूनिस्ट पार्टियों के पोलित ब्यूरो पर ध्यान दें तो कामरेड चतुरानन मिश्र और भोगेन्द्र झा अकेले किसान दिखते हैं या कहें कि थे।

बाकी सारे सारे साम्यवादी विचारक बुद्धिजीवी, इतिहासकार, समाजशास्त्री, पुस्तक लेखक (पर मात्र इतिहास और राजनीति के न कि  भाषा, भूगोल, दर्शन, मनोविज्ञान, अर्थशास्त्र { मार्क्स अपवाद हैं पूँजी लिखते हैं और श्रम का दुखड़ा रोते हैं } , विज्ञान, अभियान्त्रिकी या गणित के ) प्रेशर ग्रुप, छात्र संघ पूर्व अध्यक्ष ( आम तौर पर केन्द्रीय वि.वि. के हास्टल निवासी), क्रान्तिकारी, बुर्जुआ वर्ग के प्रति असंतोष से भरे सेनानी, गरीबों- पिछड़ों-वंचितों के मसीहा ( पर खुद लगभग अमीर और संभ्रान्त ), निजी दायित्वबोध से कोसों दूर पर , सत्ता की हर नीति के निंदक, चीन में प्रजातान्त्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के विरोधी पर भारत में प्रजातान्त्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों में ह्रास के लिये हर मंच पर मशाल जलाने वाले और लगभग भारत में इस्लाम के हितैषी पर अपने पोलित ब्यूरो में एक भी इस्लामी विशेषज्ञ नहीं रखनेवाले…. मनुवाद के विरोधी पर लगभग सनातनियों के वंशजों खासकर ब्राह्मणों से सदस्यता का कोरम पूरा करते हुए।

और आप जानते हैं कि सनातन धर्मानुसार  ब्राह्मण के लिये हल की मूठ छूना भी अपराध है फिर ये सनातनी सवर्णों से भरी कार्यकारिणी कृषि संबंधित फ़रमान जारी करती रहती है तो इनके कृषि संबंधित जमीनी हकीकतों से वाकफ़ियत पर सवाल उठने चाहिये। सिंगूर ही काफी है साम्यवाद का कृषकप्रेमी चरित्र को दिखाने के लिये।

एक प्रसिद्ध चैनल के न्यूज एंकर कहा करते हैं कि दंगे होते नहीं हैं बल्कि प्रायोजित किये जाते हैं और मैं पूरा सहमत भी हूँ। किसानों का शान्तिपूर्ण मार्च मुंबई और देहली में देखकर मैं उस एंकर के बयान में यह जोड़ना चाहता हूँ कि मोर्चा भी स्वतः स्फूर्त निकलता नहीं है निकलवाया जाता है। फ़सलों की गुड़ाई कटाई छोड़ कर दिल्ली और मुम्बई की सड़कों पर शान्तिपूर्ण पदसंचालन का नमूना पेश करने वाले सक्रिय ये रैली में आये लोग किसान तो नहीं हो सकते या फिर बेटे के हाथ में हल की मूठ या ट्रैक्टर का स्टेयरिंग थमा कर वानप्रस्थी किसान हों तो ज्यादा संशय नहीं होना चाहिये।

गरीबी बिहार, उत्तर प्रदेश में ज्यादा है और किसानों की ऋणग्रस्तता,  भुखमरी और आत्महत्या की खबरें अन्य राज्यों से आयें तो थोड़ा अचरज तो होता ही है। दरअसल नारियों का करियर ड्रिवन कम्प्रोमाइज़ की हाइप, एक आध चर्चित शील हरण का मोमबत्ती के प्रकाश में महिमा मंडन, गौ-रक्षकों के बहाने से निजी झगड़ों के हिंसक तब्दीलियों पर इलेक्ट्रानिक मीडिया रोदन, गो-माँस के नाम पर अल्पसंख्यकों की दुःखद ह्त्याओं पर असहिष्णुता उत्थान का शंखनाद ( पर बहुसंख्यक की मौतों पर युधिष्ठिरीय मौन ) , वि.वि. में एक आध दलित, पिछड़े तबके के छात्र की नैराश्यपूर्ण आत्महत्या पर हंगामा ( पर कोटा में आइ आइ टी की प्रवेश परीक्षा की तैयारी में लगे निराश छात्र की आत्महत्याओं पर खामोशी )  आज के धर्मनिरपेक्ष सनातनियों का बौद्धिक शगल बन चुका है। हर भारतीय ऐसी हर घटना के खिलाफ़ है।

एक संदिग्ध मसला आज कल के किसानों के विरोध के तरीके पर भी है। ये किसान अपनी फ़सलों का कम खरीद मूल्य देख कर उसे सड़क पर फ़ेंक कर या दूध भरे टैंकर सड़क पर उलट कर विरोध प्रकट करते हैं । मेरे विचार से ये विरोध का साम्यवादी या कहें तो वामपंथी तरीका है। यह तरीका देश के प्राकृतिक सम्पदा और मानव संसाधन का नाश करने वाला है। यह तरीका विरोध करने वाले और जिसका विरोध करना है उसे; दोनों को बर्बाद कर देता है।

एक किसान अपनी उपज का सही मूल्य ना पाकर उसे सड़क पर नष्ट कर दे ये मेरा मन नहीं मानता। हाँ विरोधस्वरूप मुफ़्त में बाँटना एक तरीका हो सकता है जिसे लेखक ने अपने छात्रजीवन में देखा था। नालन्दा ( बिहार )  के गाँवों एक बार धान की फ़सल नष्ट होने के बाद गेहूँ की फ़सल बहुत अधिक होने पर उस की उचित कीमत नहीं मिलने लगी तो सारे ग्रामीणों ने पूरे साल चावल का प्रयोग छोड़ कर रोटी खाना शुरू किया और इस तरह गेहूँ को सस्ते दाम पर बिकने से रोका न कि सड़क पर इसे नष्ट होने के लिये बिखेर कर विरोध प्रकट किया था।

फ़सलों व अन्य कृषि उत्पादों को सड़कों पर बिखेर कर विरोध प्रकट करने वाले किसान तथा सबरीमला- सिंगणापुर मे नारी प्रवेश के हिमायती योद्धाओं और बीफ़ मुद्दे पर अल्पसंख्यक सहानुभूति दोहक समूह में ज्यादा फ़र्क नहीं दिखाई देता है। ये सब इस मुद्दे से अप्रभावित लोग हैं जिन्हें इस के मुख्य प्रभावित  समूह से कोई हमदर्दी नहीं है पर वर्तमान सत्ता पर  दबाव बनाने के लिये इनके असंतोष का इस्तेमाल हथियार के तौर पर करते हैं।

फिर एक बार कृषि ऋण माफ़ी की ओर लौटते हैं। इस आलेख को लिखने से पहले लेखक ने कोशिश की कि वाम शासित राज्यों के किसानों के लिये कल्याणकारी योजनाओं और ऋण माफ़ी जैसी आकर्षक योजनाओं का विवरण गूगल पर देखा जाये तो एक भी सार्थक सूचना नहीं मिली। इस संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता है कि या तो वाम शासित राज्यों की सरकारें ये विवरण इन्टरनेट पर नहीं डालती हैं या सारा काम मैनुअल  करती हैं अथवा ऐसी कोई योजना चलाती हीं नहीं हैं ।

ये भी हो सकता है कि लेखक अपने साम्यवादी विरोधी सोच में शायद ज्यादा उतावला हो गया है और २ – ४ लाख वेब साइट सर्च करने का धैर्य खो चुका है। पर खासकर बीजेपी शासित राज्यों की सरकारों की कृषक विरोधी नीति के विरोध के लिये रैलियाँ आयोजित करने की वाम शक्ति सचमुच प्रणम्य है। खैर कांग्रेस की बात क्या करें । उस पार्टी को आज तक एहसास नहीं हो पाया कि वह सत्ता से बाहर है और अभी की सरकार खुद को भारत के 70 सालों की जवाहरीय डीएनए की गुलामी से आज़ादी के लिये क्रान्ति की मशाल हाथ में लिये देख रही है।

कृषि ऋण की माफ़ी वास्तव में किसानों की बेहतरी के बदले बैंकों की बेहतरी के लिये ज्यादा उपयुक्त दीखती है। समर्थ ऋण-कर्ता किसानों का ट्रैक्टर, घर , खेत आदि की कुर्की कर ये बैंक अपनी रकम वसूल ही लेते हैं पर मुद्दा उन गरीब किसानों का है जो बैंक अधिकारियों को थोड़ी साँठ गाँठ कर या  घूस देकर अपनी पात्रता में  ढील लेकर  ऋण पास करवा लेते हैं और उसका इस्तेमाल कृषि कार्यों और कभी कभी अपने अन्य संकटों के निवारण में भी कर लेते हैं।

प्राकृतिक आपदा/ बाजारीय विषमता के कारण फ़सलों की क्षति या कम मूल्य पर बिक्री के कारण हानि से ये ऋण की किश्तें जमा नहीं कर पाते हैं या अपने निजी मद में इस ऋण के पैसे का उपयोग हो जाने से भी कर्ज़ नहीं चुका पाते हैं। दोनों स्थिति में बैंक की ये रकम एनपीए में तब्दील हो जाती है जिसे ये बैंक कभी  भी वसूल नहीं सकते अगर उस किसान का खून, किडनी, लीवर या दिल निकाल कर बेचने का निश्चय ना ले लें।

पर राजनीतिक दलों की लोक लुभावन चुनावी घोषणाओं में कृषि ऋण माफ़ी अति उल्लेखनीय और आकर्षक योजना है जो बैंकरों के हित में जाती है और पार्टियों को दिये गये चुनावी चंदों  की अच्छी भरपाई भी है। पार्टियाँ इस का भरपूर उपयोग करती हैं कारण हर्र लगे ना फ़िटकरी और रंग चोखा। पैसा कर दाताओं का, घोषणा पार्टियों की, फ़ैसला सरकार का और फ़ायदा बैंकरों का और एक बात चन्दा नेताओं की जेब में।

इसी गैर दूरदर्शी दृष्टि के कारण यह घोषणा कृषिक्षेत्र में दी गई सब्सीडियों को भी किसानों के लिये भीख ही बना देती है कर-दाता मध्यवर्ग की नज़रों में। जबकि ये सर्वथा अनुचित है। कृषि क्षेत्र को दी गई सब्सीडी तो मानव जाति के लिये मेडिक्लेम पालिसी है। मेडिक्लेम का रिटर्न पाने के लिये बेवज़ह आपरेशन करवाने वाला बेवकूफ़ आपने कहीं देखा है क्या? अगर आप स्वस्थ हैं तो मेडीक्लेम  फ़ायदा मत देखिये?  इसे सामान्य जीवन बीमा के सावधिक रिटर्न की तरह मत देखिये। जब कोई खेती करेगा तभी तो आप अनाज खायेंगे। कम्यूटर की फ़्लापी, पेट्रोल, ट्रक, सोना – चान्दी, किताबें, शोधपत्र, चन्द्रयान,  और संचार उपग्रह खाद्यसामग्रियाँ नहीं हैं। पेट भरेगा तभी आइडियाज़ आयेंगे और ह्वाट्सएप मैसेज़ से मेमोरी फ़ुल होती है पेट फ़ुल नहीं होता।

इसलिये अगर कृषि क्षेत्र में सरकार अनुदान देती है तो इसे किसानों को दी गई भीख मानना छोड़िये ये तो आपकी साँसों की कीमत है। आप खायेंगे पीयेंगे तभी तो आप जीयेंगे । और भले ही कहावत है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम पर कोई उपजायेगा तभी तो आप का नाम उस पर लिखा जायेगा। और अगर उपजाने वाला ही भूखा मर जायेगा तो उपजायेगा कौन और खायेंगे क्या?

फिर भी यह ऋण माफ़ी गले नहीं उतरती। क्या किसानों को सबल नहीं बनाया जा सकता है उनकी फ़सलों का उचित सरकारी मूल्य देकर या कोल्ड स्टोरेज़ बना कर उनके उत्पादों को संरक्षित रखकर ताकि समय आने पर वे उस्र बाज़ार के हवाले कर के उचित कीमत पाकर अपना ऋण खुद चुका सकें। ऋण देते समय उनका प्राकृतिक अपदाओं और असमय मृत्यु के बाबत बीमा करवाया जा सकता है कि किसी प्राकृतिक आपदा या किसान की असामयिक निधन पर ऋण चुकाने की जिम्मेदारी बीमा कंपनी की हो न कि उस किसान की।

अगर किसानों को उचित संरक्षण के बदले तात्कालिक ऋण माफ़ी जैसी फ़ौरी राहत देकर वोटखींचू कोशिश जारी रही तो वह दिन दूर नहीं जब किसान अपनी जमीन बिल्डरों के हवाले करके अपनी ज़मीनों में फ़सलों के बजाय कंक्रीट के जंगल उगाना शुरू कर देंगे। फ़सलों की बिक्री छोड़ कर अपार्टमेण्ट का किराया वसूलना शुरू कर देंगे और अपनी एक दो पीढ़ी को आर्थिक सुदृढता दे देंगे पर आने वाले दिनों में हम आप पालीथीन की रोटी और थर्मोकोल का चावल खाने की आदत डाल लें क्योंकि खेती योग्य जमीन पर तो कंक्रीट के जंगल उग जायेंगे तो खेती कहाँ होगी। किसान हैं तो आप और हम हैं  और हम सब हैं तो देश है। हमारे पूर्वज पहले ही कह चुके हैं –

उत्तम खेती मध्यम वान
अधम चाकरी भीख निदान॥

इसके मर्म को समझें वरना सत्ता कर्ज़ लेकर उन्नति को उत्तम मान रही है, पढ़े लिखे नौजवान अधम चाकरी को शिक्षा का उद्देश्य मान रहे हैं, मध्यम कोटि में गिने जाने वाले व्यापारी सत्ता में घुस चुके हैं और उत्तम खेती बर्बाद होने की कगार पर है। खेती किसानी बचाइये, देश को बचाइये॥

जागिये।

उत्तिष्ठ_भारत


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