मानसिक दिवालिया हैं, हिन्दुत्व के नाम पर नरेंद्र मोदी को कोसने वाले

हिन्दुत्व के नाम पर नरेंद्र मोदी का विरोध करने वालों को देखता हूँ तो पाता हूँ कि इन लोगों के पास विधर्मियों के विद्वेष के अलावा कोई रचनात्मक सोच है ही नहीं। कभी थी भी नहीं।

विधर्मियों की ताकत क्या है इसके बारे में जानकारी अब लगभग सार्वजनिक है, लेकिन हिंदुओं की ऐसी ताकत बनाने के बारे में इनकी सोच तो छोड़िए, इच्छा भी नहीं है।

धन सब की नींव है, इस पर कोई असहमत हो ही नहीं पाता लेकिन वृहद हिंदुओं के लिए ये नींव कैसे बने इस पर कोई विचार इनके पास कभी नहीं होता। बस गिरोह के पास बाहर से चंदा आता है यही इनकी तोता रटंत होती है।

‘प्रबोधिनी’ के एक कार्यक्रम में गया था, वहाँ दक्षिण के एक वक्ता आए थे। C Surendranath नाम था। गंभीरता से बात रखते थे, उनका प्रेजेंटेशन सुंदर था और डाटा से भरा हुआ था। उन्होने बताया कि बाहर से आता हुआ फंड 2 बिलियन डॉलर आंका गया है।

देखने को तो यह दो बिलियन आंकड़े के शून्य, आम आदमी की मति सुन्न कर सकते हैं, लेकिन उसके ऊपर उठकर भी सोचना आवश्यक है। जिस तरह NGO-बाज़ अपना घर भर देते हैं, इसमें से एक तिहाई या हो सकता है आधा, स्वयं खा जाते होंगे।

बाकी में से ये लोगों को नौकरियाँ देते हैं जिनको चन्दा जमा करने का टार्गेट होता है। ये धर्म का नाम कहीं नहीं लगाते और इनके यहाँ हिन्दू युवा भी पढ़ लिखकर नौकरियाँ करते हैं, केवल ईसाई नहीं। बिलकुल प्रोफेशनल टर्म्स पर नौकरियाँ करते हैं, टार्गेट पर काम करते हैं। इनका टार्गेट कनवर्ज़न का नहीं होता, पैसे कमाना होता है।

इनके मेथड्स पर अलग से बात करेंगे कभी, लेकिन यह वर्क फोर्स उनके लिए भारत में ही कमाई कर के देता है जो काम में दिखती है। सब धन बाहर से नहीं आता। जो आता है वह यहाँ रोज़गार का निर्माण करता है।

बाकी फर्क उनकी मानसिकता का भी है। प्रचुर धन कमा कर देने वाला कोई काम उनके लिए छोटा नहीं। हरा, लाल को अपने में मिक्स होने नहीं देता, भले ही अपने आदमी वहाँ मॉनिटरिंग के लिए घुसाता अवश्य है – ताकि क्रांति न हो, इंकलाब हो, बात मानवता की नहीं, इंसानियत की हो।

अस्तु, लाल को बाहर रखने का उनको ठोस फायदा यह फायदा है कि वहाँ काम की कमाई को समझा जाता है और वह मुफ्त में मिलना उनके लिए हक़ की बात नहीं मानी जाती। नौकरी नहीं करते तो अगर बेरोज़गार भत्ता मिले तो लेंगे ज़रूर लेकिन खाली नहीं बैठेंगे कि सरकारी नौकरी अपने स्टेटस की दो या बेरोजगार भत्ता दो।

अपने यहाँ वामियों ने जो हाल कर रखा है, काम के लिए लोग नहीं मिलते, और लोग बैठे हैं और सरकार को कोस रहे हैं कि काम नहीं मिलता। दो सवाल पूछने पर सत्य सामने आता है और सत्य सामने आ जाने पर इनकी खीझ और गालियां भी। उद्योग समाप्त कर के भी इन parasite पार्टियों ने यूं ही राज नहीं किया।

मोदी विरोधी लोग जो हिन्दुत्व का झण्डा उठाए हैं उनसे चर्चा कीजिये तो दो मुद्दे निकल आते हैं – मुस्लिम तुष्टिकरण और दलित तुष्टिकरण। यहाँ एक किस्सा याद आता है।

मेरे परिचितों में एक पुलिस ऑफिसर हैं। एक बार बातों में उन्होने कहा था कि हम तो राह देखते हैं कि हिन्दू ढंग से कम्प्लेंट लिखवाये तो सही ताकि हम एक्शन ले सकें। खुद संज्ञान लेना संभव नहीं होता हमारे लिए, नौकरी की मजबूरियां आप जानते ही हैं।

मेरा सवाल था कि फिर पुलिस हिंदुओं के कार्यक्रमों को रुकवाने स्वयं कैसे पहुँच जाती है? उनका जवाब था कि स्वयं नहीं, कम्प्लेंट होती है और अक्सर किसी सेक्युलर हिन्दू की ही होती है। पता चलता है कि उसको इस्तेमाल किया जा रहा है लेकिन वो भी कोई मजबूरी में नहीं बल्कि उत्साह से कम्प्लेंट लिखवाता है।

अब कम्प्लेंट आ ही जाये रेकॉर्ड पर तो एक्शन भी लेना पड़ता है क्योंकि इगनोर नहीं कर सकते, जवाब देना पड़ता है। लेकिन हिंदुओं से कम्प्लेंट रेकॉर्ड पर नहीं आती, बस हम लोग कहीं सामाजिक फंक्शन में गए तो वहीं कम्प्लेंटस की बौछार होती है कि आप लोग हिंदुओं के ही घाती हैं, विधर्मियों को निर्बाध उत्पात करने देते हैं।

मुस्लिम तुष्टीकरण की बात आती है तो इन झंडाबरदारों को समस्या यह है कि मुसलमानों के लिए सरकारी योजनाएँ घोषित हो रही हैं। इनको यह प्रश्न गवारा नहीं कि हिंदुओं के लिए इनके पास क्या योजना है। कोई है तो उसका budgetary outlay और उससे कौन कितने लाभान्वित होंगे इसका कोई विश्लेषण है?

अक्सर बात यही खत्म होती है – जवाब कुछ यूं होता है। इन सब कामों के लिए अपने पास टाइम नहीं, सरकार हिन्दू वोटों से आई है, सरकार को यह सब करना चाहिए।

मुस्लिम हो या ईसाई, अपने लोगों से गहरा होमवर्क करवाते हैं ताकि योजनाओं को नकारना मुश्किल हो जाये। घनी लॉबीइंग करता है। प्रशासन में पैठ इसी के लिए तो बनाई है इतने सालों से। और हाँ, देश के वे भी नागरिक हैं तो उनकी मांगें भी सुननी पड़ती ही है। सभी पास नहीं होती लेकिन क्या आप मोदी जी से लाल किले से ऐसी घोषणा की अपेक्षा रखते हैं कि बहनों और भाइयों, …?

और आप के पास कोई योजना पर सोचने, होम वर्क करने का समय नहीं है, बस सोशल मीडिया पर मोदी जी को कोसने के लिए समय है कि वे मुस्लिम तुष्टिकरण में लगे हैं। हिन्दू प्रशासनिक अफसरों को क्या आप ने कभी हिन्दू होने का अहसास कराकर हिंदुओं के लिए कोई काम करवाए हैं भी या बस उनसे पहचान है तो… जाने दीजिये, बाकी लिखने की इच्छा नहीं है।

कभी विधर्मी हाकिमों को देखिये उनके धार्मिक कार्यक्रमों में शामिल होते हुए। अरे, ये कॉन्वेंटिये तो सभी ओल्ड बॉय्ज़ नेटवर्किंग इसलिए ही कराते हैं कि उनके काम आसानी से हो सकें, हाकिम हिन्दू हो तो भी अपने स्कूल के फादर को आसानी से नकारता नहीं। और उनका प्रेजेंटेशन तो तगड़ा रहता ही है, बहाने सभी बहुत ही तगड़े रहते हैं।

यहाँ फिर से वही सवाल – हिन्दू प्रशासनिक अफसरों को क्या आप ने कभी हिन्दू होने का अहसास कराकर हिंदुओं के लिए कोई काम करवाए हैं भी? मंदिर मेरी प्रायोरिटी नहीं कहने वाला लाइन में प्रायोरिटी मांगकर मंदिरों में दर्शन लेता है, हमारे कानों पर जूं नहीं रेंगती।

दलित तुष्टिकरण का आरोप लगाने वालों के लिए इतना ही – हिन्दू की इनकी परिभाषा कितनी वृहद है या कितनी संकीर्ण है? अगर आप को उनको हिन्दुत्व से बराबरी में जोड़ने में एतराज़ है तो क्या आप को उनका विधर्मी की ताकत बनना गवारा है?

अभिजीत सिंह जी को पढ़ते होंगे तो उन्होंने सावरकर जी लिखित ‘मोपला’ पढ़ने पढ़ाने का यज्ञ चलाया था। आशा है आप ने भी पढ़ा है। बाकी ‘हिन्दुत्व’ शब्द ही परिभाषा सहित सावरकर जी की ही देन है यह तो आप जानते ही होंगे? अगर ‘सावरकर मुक्त हिन्दुत्व’ की आप की अपनी कोई व्याख्या है तो अवश्य बताएं।

अपने हिन्दुत्व के झंडाबरदारों को सभी काम सरकार से चाहिए, वह भी सरकार उनको बुला कर करे, क्योंकि उन्होंने तो वोट दिया है। ये वही लोग हैं जो कहते हैं कि हिन्दू के लिए कर्तव्य की इतिश्री मोदी को वोट देना थी अब अगर मोदी हिंदुओं की इच्छाएं पूरी न करे तो उसे सत्ता में रहने का हक़ नहीं। बाकी ये ही वो व्यक्ति है जिसने कहा कि एक्सिटेंडल प्राइम मिनिस्टर ने दस साल के लिए देश को जीएसटी, आधार, राफेल जैसे आफतों से बचाकर रखा।

कितनों से बात कर चुका हूँ यह बताने की मेरी इच्छा नहीं, ऐसी घड़ी में सब को साथ लेकर ही चलना अनिवार्यता है। जैसी भी है, यही सेना उपलब्ध है। कुल मिलाकर बात ज़मीनी सत्ता की है। मोदी वर्तमान है, स्थायी नहीं। एक और टर्म बनाकर रखोगे तो अपनी ही आनेवाली पीढ़ियों के लिए विकल्प खड़ा करने का मौका मिलेगा।

ये टर्म तो कोसते ही गुज़री लेकिन सभी निठल्ले कोसोवादी नहीं हैं, कहीं न कहीं काम भी हो रहा है। यह फले फूले इसलिए भाजपा कंटिन्यू रहे यह हम सब के लिए आवश्यक है। अन्यथा काँग्रेस ही आएगी, और आते ही क्या करेगी यह तो रंग दिख ही रहे हैं।

अभी अभी एक मित्र मध्य प्रदेश की यात्रा से लौटे हैं। सम्पन्न परिवार के व्यक्ति हैं, पारिवारिक प्रसंगों में मध्य प्रदेश के काफी जगहों हो आए। एक जगह एक लोकल काँग्रेसी नेता के श्रीमुख से मोती झरे – अब तो जम के खाएँगे, पंद्रह सालों से भूखे हैं।

माँ काली रक्षा करें हमारी आनेवाली पीढ़ियों की।

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