हम पश्चिमी देशों की प्रसन्नता का साथ देंगे लेकिन उस प्रसन्नता का चिह्न होंगी हमारी परम्पराएँ

कल लिखा था कि पारपंरिक पंचांग में जन्मतिथि के हिसाब से जन्मदिन मनाया जाए तो इस पर प्रतिक्रियाएं आईं कि फेसबुक बार-बार डेट ऑफ बर्थ परिवर्तित करने की सुविधा नहीं देता।

सही बात है, लेकिन एक साल ऐसा करने से क्या बिगड़ जाएगा? फेसबुक कोई गज़ेटेड ऑफिसर की मुहर या सरकारी पंजीयन कार्यालय थोड़े है कि आपका जन्मदिन एक बार यहाँ दर्ज हो गया तो आजीवन वही रहेगा। यहाँ तो पता नहीं कितने लोग अपना वास्तविक जन्मदिन लिखते ही नहीं हैं।

मेरा आग्रह तो उनसे था जो विक्रमी संवत के महीनों के नाम तक नहीं जानते। आपको क्या लगता है कि आप तिथि, पक्ष, मास, नक्षत्र आदि जानते हैं तो आपकी तरह सभी लोग जानते होंगे? नहीं साहब, आज भी ऐसे लोग हैं जो मेरे जनेऊ धारण करने का उपहास करते हैं और वो भी हिंदी भाषी हैं और जन्म से पुरबिया हैं।

अस्तु, मूल विषय यह है कि कैलेंडर अथवा पंचांग किसी संस्कृति की ज्ञान परम्परा से उपजा ऐसा दस्तावेज़ है जो उस सभ्यता के क्रमिक विकास को दिखाता है। जब सुशील पण्डित यह कहते हैं कि कश्मीरी पंडितों का पंचांग पाँच हजार वर्ष पुराना है तो वे यह बता रहे होते हैं कि आज से पाँच हजार वर्ष पूर्व काश्मीर देश के विद्वान कालगणना करना जानते थे। यह उनकी ज्ञान परम्परा का द्योतक है।

पंचांग के अनुसार पर्व उत्सव मनाये जाते हैं। पर्वों पर उस ऋतु विशेष में उत्पन्न होने वाले अनाज से विविध प्रकार के व्यंजन बनते हैं। ऋतु विशेष में कुछ मास तक खाये जाने वाले उन व्यंजनों से शारीरिक संरचना पुष्ट होती है। शारीरिक संरचना के आधार पर उस क्षेत्र विशेष के लोग विभिन्न प्रकार के काम कर पाते हैं। उन कार्यों से व्यवसाय और व्यापार आधारित अर्थव्यवस्था खड़ी होती है। यही अर्थव्यवस्था राज्यव्यवस्था के साथ मिलकर दीर्घकाल में सभ्यता का विकास करती है।

जब हम न्यू ईयर मनाने में 31 दिसम्बर की रात को दारू-मुर्गा पी-खा रहे होते हैं तो हम अनजाने में अपनी संस्कृति के कई अंगों से खिलवाड़ कर रहे होते हैं। दारू-मुर्गा उतना खराब नहीं है जितना इसका प्रचलन में आ जाना। यह चीज़ें पहले इतनी अधिक प्रचलन में नहीं थी। आज परम्पराओं का स्थान ‘फ़ैशन’ और ‘ट्रेंड’ ने ले लिया है। बचपन में हम लोग ग्रेगोरियन न्यू ईयर को भी अपने तरीके से मनाते थे। परिजनों को ग्रीटिंग कार्ड भेजते थे, टीवी पर कवि सम्मेलन देखते थे और घर पर पकवान खाते थे।

आज जो समस्या दिख रही है वह यह है कि 31 दिसंबर की रात को दारू-मुर्गा पीने-खाने का चलन बड़ी तेज़ी से गाँवों की ओर बढ़ रहा है। ये हमारे वही गाँव हैं जहाँ नव संवत्सर के मास चैत्र के नाम पर चैती गाने की परंपरा विकसित हुई थी। यह शास्त्रीय संगीत में एक विशिष्ट शैली के रूप में समाविष्ट हुई।

भोजपुरिया परम्पराएँ अपने आप में इतनी मधुर और विकसित हैं कि उन्हें किसी विदेशी ट्रेंड को अपनाने की आवश्यकता ही नहीं है फिर भी युवा वर्ग दारू-मुर्गा की ओर आकृष्ट होता है यह चिंताजनक है। जब आप 31 की रात को दारू-मुर्गा की पार्टी में सम्मिलित हो रहे होते हैं तो न चाहते हुए भी आप ईसाई परम्पराओं का अनुसरण कर रहे होते हैं।

यह वैसा ही है जैसे हमारे पास पहले से बढ़िया वस्तु हो फिर भी हम दूसरे की वाहियात चीज़ों को देखकर लार टपकाएं। मांस-मदिरा का भोजन के रूप में सेवन करना यह पश्चिमी सभ्यता की खाद्य परम्परा है। किसी दूसरी सभ्यता की परम्पराओं को अपना कर हम अपनी संस्कृति के साथ कितना न्याय कर रहे हैं यह विचारणीय है।

आज विश्व में जब भी सुपरपॉवर बनने की बात होती है तो यही कहा जाता है कि वही देश सुपरपॉवर बन सकता है जो विश्व को अपने तरीके से सोचने पर बाध्य कर दे। उदाहरण के लिए हम जब भी देश की नीतियों का निर्धारण करते हैं तो अपने समक्ष अमेरिका का मॉडल खड़ा करते हैं। अमेरिका में विज्ञान ऐसा है तो हमारे यहाँ भी वैसा ही हो, रक्षा प्रतिष्ठान अमेरिका में ऐसे हैं तो हमारे यहाँ भी वैसे ही हों, यहाँ तक की कला क्षेत्र में भी हमें प्रायः बॉलीवुड की तुलना में हॉलीवुड अधिक पसंद है।

पश्चिमी परम्पराओं को धीरे-धीरे अपनाते हुये हम भी आधे अमरीकन हो चुके हैं और गाहे बगाहे अमरीकन ड्रीम में जीने लगे हैं। ग्रेगोरियन कैलेंडर को अपनाने की उपयोगिता इतनी ही है कि हम विश्व के साथ कदमताल मिलाकर चल सकें। कदमताल मिलाकर चलने का अर्थ यह नहीं है कि हम पश्चिमी परम्पराओं को ओढ़ कर सोएं, पहने और बिछाएँ।

ईसाई पहली जनवरी को मांस मदिरा इसलिए खाते हैं क्योंकि ईसा मसीह के ज़माने में वही खाद्य परम्परा थी। लेकिन हम तो कृषि आधारित सभ्यता रहे हैं। हम पहली जनवरी को घर में कोई विशेष पूजा कर के मिठाई और व्यंजन खाकर भी सेलिब्रेट कर सकते हैं क्योंकि हमारी सभ्यता कहीं अधिक विकसित और सर्वग्राही है।

हम पश्चिमी देशों की प्रसन्नता का साथ देंगे लेकिन उस प्रसन्नता का द्योतक वह ‘symbolism’ हमारी परम्पराएँ होंगी न कि दारू-मुर्गा। यह प्रत्येक सभ्यता के विकास क्रम का स्थापित सत्य है। बाजार की चकाचौंध में हमें बस इसका भान नहीं है। जिस दिन भान हो जायेगा उस दिन हम विश्वगुरु हो जाएंगे।

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