क्या हम जानते हैं कि आज़ादी के बाद भी बंदी बनाए गए थे वीर सावरकर!

क्या हम जानते हैं कि ब्रिटिश सरकार ने वीर सावरकर को एक नहीं, दो बार आजन्‍म कारावास की सजा दी थी? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर काला पानी (अंडमान) की कालकोठरी में दस साल बंद रहे? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर की तंग कोठरी की छोटी सी खिड़की से सिर्फ जेल का फांसी घर दिखाई देता था? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर को प्रतिदिन बैल की तरह कोल्हू में जोत कर तेल निकालना होता था? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर जिस दिन पर्याप्त मात्रा में तेल नहीं निकाल पाते थे उस दिन उन्हें कोड़े मारे जाते थे? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर को कैद में हाथों में हथकड़ियां और पैरों में बेड़ियाँ जकड़ी रहती थीं? नहीं!

क्या हम जानते हैं कि वीर सावरकर को कागज़ व लेखनी से वंचित कर दिए जाने पर उन्‍होंने अंडमान जेल की दीवारों को ही कागज़ और अपने नाखूनों व कीलों को अपना पेन बना लिया था? नहीं!

वीर सावरकर से संबंधित ऐसे अनगिनत सच हम नहीं जानते।

हममें में से अधिकांश तो सिर्फ इतना जानते हैं कि उन्होंने अंग्रेजों से माफी मांग ली थी। ऊपर के अनगिनत भयावह सच को दबा कर इस एक झूठ को जिस तरह से सफलतापूर्वक फैलाया गया वो भी एक ऐतिहासिक आश्चर्य ही है।

आज़ाद भारत का दुर्भाग्‍य देखिए कि हम इस एक ऐतिहासिक झूठ के पीछे के बौद्धिक षड्यंत्र को नहीं जानते। क्यों? क्योंकि हमें यह जानने नहीं दिया गया।

हमे क्यों नहीं जानने दिया गया? सिर्फ इसलिए कि स्वतंत्रता प्राप्ति का श्रेय लेकर उसको कुछ लोग भोग सकें। और उसे एक परिवार और उनकी पार्टी ने पीढ़ियों तक भोगा भी।

क्या हम जानते हैं कि आज़ादी के बाद भी वीर सावरकर को बंदी बनाया गया? नहीं!

हम शायद यह कभी नहीं जान पाएंगे कि वीर सावरकर भारत के कुछ चुने हुए उन स्वतंत्रता वीरों में से एक हैं जो पराये और अपनों, दोनों के द्वारा बंदी बनाये गए।

यहां यह समझना कोई मुश्किल नहीं होगा कि उन्हें दोनों में से कब अधिक दुःख हुआ होगा।

दुःख तो इस बात का अधिक है कि उपरोक्त सभी सच को छुपा कर कुछ लोभी लोगों ने अपना फायदा तो ले लिया मगर देश का अधिक नुकसान कर दिया है।

यह इस षड्यंत्र से भरे हुए झूठ का ही दुष्परिणाम है जो आज की पीढ़ी गुलामी की पीड़ा और आज़ादी की कीमत नहीं जानती।

वो तो इस काल्पनिक सफ़ेद झूठ के साथ ही मदमस्त है कि हमें चरखे और अहिंसा से आज़ादी मिली थी।

ऐसे अनेक झूठ गढ़े गए। और हम उन्हें ही सच मानते आये हैं।

उन्ही में से एक झूठ अंग्रेजों द्वारा रचा गया था 1857 को लेकर। वीर सावरकर ने इसी 1857 को प्रथम स्वतंत्रतता संग्राम प्रमाणित करते हुए, सनसनीखेज़ व खोजपूर्ण इतिहास लिखकर ब्रिटिश शासन को हिला कर रख दिया था, वरना तब तक उसे एक सैनिक विद्रोह ही माना जाता था।

हम में से अधिकांश यह तक नहीं जानते कि वीर सावरकर को आखिरकार दो जन्‍मों के कालापानी की सज़ा क्‍यों मिली थी? इस संदर्भ में भी अनेक झूठ रचे गए।

जबकि वीर सावरकर की मूल गलती मात्र यह थी कि उन्‍होंने कलम उठा ली थी और अंग्रेजों के उस समय के अनेक झूठ का पर्दाफाश कर दिया था, जिनमें से ही एक 1857 भी था, जिसे दबाए रखने में न केवल अंग्रेजों को, बल्कि उनके पाले हुए भारतीय राजनेताओं का भी भला हो रहा था।

काला पानी की सज़ा, एक तरह से वीर सावरकर की अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता की लड़ाई लड़ने की कीमत थी, जिसके चक्कर में फिर उन्हें अनेक केस में फंसाया गया। वैसे भी उन्होंने जो कुछ भी क्रांतिकारी संघर्ष किये या करवाए, वो सब कोई व्यक्तिगत लाभ नहीं बल्कि देश की आज़ादी के लिए ही थे।

कटु सच तो यह है कि वीर सावरकर को 50 साल की सज़ा देकर भी अंग्रेज नहीं मिटा सके थे, लेकिन आज़ाद भारत के राजनेताओं और बुद्धिजीवियों व इतिहासकारों ने उन्‍हें मिटाने की पूरी कोशिश की।

कल जब देश के प्रधानमंत्री ने उस कालकोठरी में जा कर, झुक कर उस धरती को नमन किया, यकीनन वीर सावरकर की आत्मा अनेक बंधन से मुक्त हुई होगी।

और साथ ही वो समय भी उस अपराधबोध से मुक्त हुआ होगा जिसमें उसने एक देशभक्त वीर को तिल तिल यातनाएं सहते देखा था, मगर उसी के देशवासियों ने उसका मज़ाक बनाया था।

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