आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो

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आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड,

आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, याकि जान का हो दान,

आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड,

आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, याकि जान का हो दान,

आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!

आरम्भ है प्रचंड……..

मन करे सो प्राण दे, जो मन करे सो प्राण ले, वही तो एक सर्वशक्तिमान है,
कृष्ण की पुकार है, ये भागवत का सार है कि युद्ध ही तो वीर का प्रमाण है,

ये समय है एक हाथ में गीता और दूसरे में गांडीव धारण करने का

कौरवों की भीड़ हो या पांडवों का नीड़ हो जो लड़ सका है वो ही तो महान है!
जीत की हवस नहीं, किसी पे कोई वश नहीं, क्या ज़िन्दगी है, ठोकरों पे वार दो,

मौत अंत है नहीं, तो मौत से भी क्यों डरें, ये जाके आसमान में दहाड़ दो!

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो,

आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!
वो दया का भाव, याकि शौर्य का चुनाव, याकि हार का ये घाव तुम ये सोच लो,

रावण के दस सिर पर तीर चलाने से कुछ नहीं होगा, नाभि में तीर लगने की प्रतीक्षा करो

याकि पूरे भाल पे जला रहे विजय का लाल, लाल यह गुलाल तुम ये सोच लो,
रंग केसरी हो या, मृदंग केसरी हो याकि केसरी हो ताल तुम ये सोच लो!

बोलो जुबां केसरी : बस, अब सुबह होने ही वाली है…

जिस कवि की कल्पना में ज़िन्दगी हो प्रेम गीत, उस कवि को आज तुम नकार दो,
भीगती नसों में आज, फूलती रगों में आज, आग की लपट का तुम बघार दो!

लहर नहीं अब प्रभंजन चाहिए, माँ भारती के चरणों में वंदन चाहिए

आरम्भ है प्रचंड, बोले मस्तकों के झुंड, आज जंग की घड़ी की तुम गुहार दो,
आन बान शान, याकि जान का हो दान, आज एक धनुष के बाण पे उतार दो!

‘जय’ से कम कुछ भी हुआ तो भारत और हिन्दुओं को दोबारा नहीं मिलेगा कोई अवसर

आरम्भ है प्रचंड…
आरम्भ है प्रचंड…
आरम्भ है प्रचंड…

— पीयूष मिश्रा


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