भारत और बिहार : अपना ग़म ले के कहीं और ना जाया जाये, घर की बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये

आज से 14-15 साल पहले की बात है, पालम का इलाका…. पेय जल के संकट से रूबरू आम औरतों की जमात। अचानक सरकारी पानी का टैंकर आता है और महिलाओं की भीड़ अपने परिवार के लिये जीवन रक्षक पेयजल संचित करने के लिये कतारों में सज जाती हैं।

जैसाकि संभव है कि अपनी बारी में देरी और पानी के पहले समाप्त होने की झल्लाहट कुछ देवियों को सब्र का बाँध तोड़ने पर मज़बूर कर देती है। अनुशासित कतार कब विप्लवी भीड़ में तब्दील हो जाती है कोई नहीं जान पाता।

लेखक भी अपने किराये के मकान की तीसरी मंजिल पर चढ़ कर इस तमाशे का दुःखद नज़ारा देखता है, पता चलता है। जल संग्रह पात्र को हथियार बना कर किसी देवी ने अपने प्रतिद्वंद्वी का सिर फ़ोड़ दिया। स्थानीय बोलियों में गालियों का दौर चालू हो जाता है और एक गाली लेखक के दिलो दिमाग पर आज तक हावी है जो उस वक्त गूँजी थी “बिहारन”।

मुम्बई हो या सूरत, कोलकाता हो या गुवाहाटी, दिल्ली हो या देहरादून, घर बनाने वाले मज़दूरों द्वारा की गई चोरी हो या निर्भया तक से हुआ दुष्कर्म हो, बाँग्लादेश से पाकिस्तान भागते मुसलमान हो या मुम्बई में पिटते उत्तर भारतीय सबमें बिहार-कनेक्शन ढूँढ़ना शेष भारत का शगल बन चुका है।

आइएएस, आइ पीएस, सीए, वकील, इलेक्ट्रोनिक और प्रिंट मीडिया के समाचार खोजी, बैंक कर्मचारी, रेल कर्मी, शिक्षक, भवन निर्माण में लगे मज़दूर, रत्नों की घिसाई में लगे कारीगर, कैटेरिंग सर्विस के खानसामे और वेटर, गैर राज्यों में फ़सल कातने वाला मज़दूर, घर घर ट्यूशन पढ़ाने वाला, आटो रिक्शा या हाथ रिक्शा चालक या आखिर में बस में ट्रेन में मेट्रो में और ट्राम में हर किसी को आप से संबोधित करने वाले यात्री के रूप में…. ऐसी और कितनी जानी अनजानी भूमिकाओं में स्थानीय जनता जनार्दन की सेवा में रत हाथ किसी ना किसी बिहार वासी के मिल ही जाते हैं पर यह तबका उन स्थानीय लोगों के बीच पापुलर है दबंग, गँवार, उजड्ड और चोर के नाम से।

एक बात और काबिल ए ज़िक्र होगा कि जिस दिन झारखंड बिहार से अलग हुआ उस रात बिहार के पटना से चली बस जब धनबाद पहुँची तो एक आवाज़ नफ़रत भरी गूँजी थी ” लो आ गये बिहारी “। बाकी शहरों से भी जब बसें पहुँची होंगी शायद प्रतिक्रिया समतुल्य ही रही होगी ये मेरा विश्वास है।

एक बड़ा चर्चित मगही गाना था जो बना था बिहार झारखंड विभाजन के काल खंड में। इसके बोल कुछ यूँ थे कि
“मीसरी मलाई खैलू कैलू तन बुलंद
अऽब खैहऽ शकरकंद
अलग होलो झारखंड
अऽब खैहऽ शकरकंद॥”

मतलब माना जा रहा था कि झारखंड के हिस्से का मलाई बिहार खा रहा था। बिहार से नफ़रत अखंड बिहार के कई हिस्सों में भी थी।

पर घबड़ाइये नहीं …. यत् पिण्डे तत् ब्रह्माण्डे

एक और दृश्य कौंध उठता है इसी के साथ लेखक के मन में वह है फ़िल्म काँटे का। स्वयंभू टीम लीडर की भूमिका में अमिताभ एक पात्र के रूप में हैं और कहलाते हैं कर्नळ या मेजर। ज़िक्र कर रहे हैं अमेरिकियों के भारतीयों के प्रति स्वाभाविक ईर्ष्या का कि जब कोई अपराध होता हुआ दूर से किसी अमरिकी पुलिस को अनुमानित होता है और चाहे धुँध इतनी हो कि हाथी और हथौड़े में कोई फ़र्क पता न चले तो भी वह चिल्लाता है “हे इण्डियन “।

यह तो बात रही आभासी दुनिया की पर यथार्थ में भी एक बार बराक ओबामा ने अमेरिकी युवाओं को और अधिक दक्ष होने का आह्वान करते हुए ये आशंका जताई थी कि काबिल बनो वरना भारतीय आ जायेंगे। भारतीय उपमहाद्वीप के पर्यटकों का स्वागत तो अमरीका में इतने पलक पाँवड़े बिछा कर किया जाता है कि हमारे महामहिम कलाम साहिब ने सादगी दिखा कर उसे बर्दाश्त कर लिया और एक फ़िल्मी बादशाह आज भी उस बेइज़्ज़ती को पचा नहीं पा रहे हैं और डालर के लोभ में बार बार अपना चीर हरण करवा रहे हैं और ये आलम तब है जब हमारी ह्वाट्सएप यूनिवर्सिटी के शोधपत्रों में कई राष्ट्रवादी मित्र लिखते हुए फूले नहीं समाते कि नासा का हर 6ठा कर्मचारी भारतीय है, विण्डोज़ की खिड़कियाँ भारतीय उँगलियों से ही खुली हैं, गूगल का लगाम हमारे बच्चे के हाथ में है, हमारी आइआइटी, आइआइएम, एम्स, आइएसआइ आदि के गेट के सामने अमेरिकी कंपनियाँ छाता खोल कर अपना योग्य कर्मचारी कैम्पस सेलेक्शन से चुनने के लिये बैठी रहती हैं।

मेरे कतिपय संबंधी अखंड रशिया के कई भागों में पढ़ने जाते रहे पर वहाँ भी भारतीय उपमहाद्वीप सारे छात्रों का छात्रावास एक ही जगह बनाया जाता रहा है…. ये उन्हें अपने लोगों के साथ रखने की कोशिश भी हो सकती है पर मुख्य मामला उनपर एक साथ निगरानी रखने का ही है। हो सकता है कि ये मेरी निजी सोच हो सकती है पर यूरोपीय या अमेरिकी देशों के छात्रों के साथ यही दयालुता क्यों नहीं?

आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों के साथ की बदसलूकी काफ़ी चर्चित है जिस पर हमारे प्रधान मंत्री भी चुप हैं भले ही परमाणु रियेक्टर के लिये ईंधन की बातचीत सफल बना कर लौटे हों पर अपने पिटे हुए बच्चों के सुखद भविष्य के लिये एक सार्थक पहल करने से उसी तरह वंचित ही रहे लगभग जिसतरह गाँधी पर भगत सिंह आदि की फ़ाँसी की माफ़ी की बात गोलमेज सम्मेलन में नहीं उठाने का आरोप लगभग उन्हीं की पार्टी लगाती रही है।

याद कीजिये मारीशस, फ़िजी, साउथ अफ़्रिका के गिरमिटिया मज़दूरों को जिन के कई वंशज आज वहाँ की सत्ता शीर्ष पर आसीन हो चुके हैं पर मारीशस को छोड़ कर इन भारतीयों को वहाँ के स्थानीय लोगों द्वारा दुर्व्यवहार की खबर अगर आपने सुनी न हो तो शायद आप अखबार में फ़िल्मी खबरें ही पढ़ रहे हैं ये मान लिया जाये तो ये गलत बात नहीं होगी। मारीशस का भी भीतरी हालत वैसी ही हो तो कोई अचरज की बात नहीं।

आपको ये जान कर आश्चर्य नहीं होना चाहिये कि जिस नेल्सन मंडेला को भारत सरकार ने भारत रत्न से नवाज़ा उन्हीं महानुभाव को साउथ अफ़्रिका के पहले स्वतंत्र चुनाव में भारतीयों के मत नहीं मिले। और ये मत इसीलिये पूर्व प्रिटोरिया सरकार के प्रतिनिधियों को इसीलिये मिले कि अगर मंडेला की पार्टी पूर्ण बहुमत पा जायेगी तो दक्षिण अफ़्रिका के मूल निवासी हमें अपने घरों से बेघर कर देंगे और ऐसा हुआ भी था मतलब बापू की कामयाबी का बिगुल हम भले फ़ूँकते रहें पर भारतीयों के लिये नफ़रत तो थी और है भी।

सवाल है कि ये नफ़रत है क्यों बिहार के लिये शेष भारत में और भारत के लिये शेष विश्व में? तो इसका जवाब है ये डर, आशंका और सच्चाई भी कि ये बाहरी लोग हमारा हक़ अपनी मेहनत के बदौलत हड़प रहे हैं। अगर ये ना होते तो जो पैसा इनकी जेब में जा रहा है वह हमारे कब्ज़े में होता । बस आपको करना ये है कि जब बिहार का सोचें तो भारत को न भूलें और जब भारत की बात सोचें तो विश्व को ध्यान में रखें। बाकी बातें समान रहेंगी। फिर शुरू होता है बहुसंख्यकों द्वारा इन अल्पसंख्यकों का अपमान और प्रताड़ना और उसके बदले पनपता है इन अल्पसंख्यकों का अख्खड़पन। फिर शुरू होता है बड़े पैमाने पर इनका अपमान और सामूहिक दमन। आप को याद करना हो तो याद कर लीजिये चाहे गांधी की ट्रेन से धक्का खाना या भारतीय छात्रों की आस्ट्रेलिया में पिटाई और एक दबंग पार्टी के कार्यकर्ताओं द्वारा बिहारियों की पिटाई ( चाहे मुंबई हो या सूरत ) ।

अब कारण के बारे में मत पूछिये। आप भी जानते हैं कि शेष भारत की तुलना में बिहार गरीब, दयनीय, असहाय और साधनहीन दिखता है और शेष विश्व में भारत। बस एक हीं पूँजी होती है इनके पास वह है हिम्मत और ज्ञान कि हम टिक जायेंगे चाहे हालत कितनी भी दूभर क्यों न हो। और यही हिम्मत तथाकथित सम्पन्न वर्ग चुभती है और शुरू होता है एक अंतहीन अनावश्यक सुनियोजित वैचारिक महासंग्राम जो विश्वगुरु को विश्वसेवक और बिहार वासी को बिहारी नामक गाली से संबोधित होने को विवश कर देता है।
और इसका इलाज़ है बस इस एक शेर में कि
अपना ग़म ले के कहीं और ना जाया जाये
घर की बिखरी हुई चीजों को सजाया जाये॥

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