देवत्व की राह पशुत्व से होकर है…

तंत्र साधना में तीन भाव माने जाते हैं, – पशु, वीर और देव भाव। मनुष्य अपनी यात्रा पशुता से शुरू करता है, तांत्रिक भी। कुछ पशुत्व से मुक्त होकर वीर भाव तक ही पहुंच पाते हैं, विरले ही देवत्व को पाते हैं, अधिकांश पशुत्व में लीन रहते हैं। आहार, निद्रा, मैथुन की चिंता करते-करते आखिर में चिता पर चढ़ते हैं- भस्मीभूतस्य देहस्य…

तंत्र-साधना को इसकी सहजता की वजह से ही भ्रष्ट भी किया गया और आज तो यह हालत है कि यह विलुप्त ही हो गया।

यहीं इस प्रश्न का भी जवाब मिलता है कि आखिर पंच-मकार की तंत्र में क्यों इतनी प्रधानता है? तंत्र वाममार्ग क्यों है, वामाचार क्यों है…

…क्योंकि, समाज का जो भी हीन था, त्याज्य था, गुह्य था, गोपन था, उसे तंत्र खम ठोंक कर करता है। मांसाहार से लेकर मैथुन तक।

मैथुन में भी उसे तथाकथित उच्च वर्ग की स्त्रियां नहीं चाहिए, जितने भी बड़े औघड़ या तांत्रिक हुए, सबको निम्नवर्गीय स्त्रियां ही ‘भैरवी’ बनाने के लिए चाहिए। वज्रयानी साधकों की धोबिन, चमइन, नाइन आदि स्त्रियां ही साधना में सहायिका हुईं।

…इसकी दो वजहें समझ में आती हैं। पहली, तो यह कि शायद मैथुन में ये स्त्रियां अधिक मुखर, समानता के स्तर पर व्यवहार करने वाली और ऊर्जावान होती होंगी।

दूसरे, तत्कालीन समाज में जिन स्त्रियों को वर्जित या अ-कुलीन समझा गया, तंत्र ने उसी की प्रतिष्ठा की, निम्न से उच्च की ओर गया। संभोग से समाधि की ओर, तंत्र से पराशक्ति की ओर, सेक्स से ऊर्जा की ओर..।।

…भारतीय दर्शन का एक अंग यह भी है कि जो गहराइयों को छूता है, वही ऊंचे उड़ता है. गज़ब है। पतन की सीढ़ियां चढ़कर भी कोई महानतम उपलब्धि पा सकता है।

इसीलिए, सनातन में कुछ भी त्याज्य नहीं, कुछ का भी बहिष्कार नहीं, कुछ भी एक्सक्लूडेड नहीं, संभावना हरेक में है, बीज ही बरगद हो सकता है, यही मूल भाव है।

…इसीलिए, यहां रत्नाकर वाल्मीकि बन सकता है, और कहीं यह सुविधा नहीं।

पशु भाव को जिसने पूर्णता पर जी लिया, वही पलट सकता है, जिसने चरम पर जाकर भोग किया, वही योगीराज हो सकता है,… जो परम मोहांध रहा, वह भी विरक्त हो सकता है, जो यौन में आकंठ डूबा, वह चरम ब्रह्मचर्य जी सकता है…

देवत्व की राह पशुत्व से भी खुलती है…
अनहोनी के द्वार कहीं से भी खुलते हैं…

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