मेघालय कोयला खदान बचाव अभियान : राजनीति और वास्तविकता

मेघालय के जयंतिया हिल्स इलाके में 15 मजदूर 370 फुट गहरी एक कोयला खदान में 13 दिसंबर से फंसे हुए हैं। इस खदान में बारिश और समीपवर्ती नदी में बाढ़ के पानी से फ्लड के कारण लगभग 70 फुट पानी भर चुका है।

इस घटना पर राजनीति भी शुरू हो गयी है और इस घटना की तुलना थाईलैंड में फंसे बच्चों के लिए चले रेस्क्यू आपरेशन से कर शासन को लानत-मलानत भेजी जा रही है। कल राहुल गांधी ने ट्वीट कर नरेंद्र मोदी को बागाबील पुल पर सेल्फी लेने की बजाय “खनिकों” की जान बचाने के लिए कोशिश करने का तंज किया है। मामला चूंकि तकनीकी है इसलिये मित्रों के सामने कुछ जरूरी तथ्य मैं स्पष्ट करना चाहूंगा।

सबसे पहली बात.. नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल और कोर्ट 4 वर्ष पहले इन इलाकों में कोयला खनन को अवैध और असुरक्षित करार देते हुए इसे दंडनीय अपराध घोषित कर चुका है। राहुल गांधी के “खनिक” वास्तव में वे अपराधी तत्व हैं जो पैसे के लालच में वहां “रैट माइनिंग” द्वारा अवैध खनन में लिप्त हैं। रैट माइनिंग में अवैज्ञानिक तरीकों से मात्र 2-3 फुट चौड़ी अवैध और खतरनाक सुरंगे खोदी जाती हैं जिनमें एक आदमी बैठ तक नहीं सकता।

बिना किसी सेफ्टी सिस्टम और पिलर सपोर्ट के कभी भी ढह सकने वाली इन संकरी सुरंगों में ये कोयला माफिया अक्सर बच्चों और मजदूरों को भेजते हैं जो जमीन के नीचे सैकड़ों फुट तक इन गुफाओं में रेंगते हुए कोयला इकट्ठा करते हैं। ये 15 मजदूर भी इसी प्रकार की संकरी सुरंगों में फंसे हुए हैं।

स्टेट गवर्नमेंट के अथक प्रयासों और 12 लाख लीटर पानी पंप करने के बावजूद पानी का स्तर कम नहीं हो रहा है। नेवी, एयरफोर्स, किर्लोस्कर आदि के सहयोग से बेहतर क्षमता के पम्प मँगवाये गए हैं जो वहां पहुंचने वाले हैं पर मेरे ख्याल से उनसे भी कोई फायदा नहीं होगा। वजह?

वजह यह है कि जब तक पानी की सप्लाई नहीं रुकेगी तब तक पानी निकालने का क्या फायदा? बारिश और बाढ़ का क्या किया जा सकता है? थाईलैंड में 40 से अधिक मशीनों द्वारा 16 लाख लीटर पानी प्रति घण्टे की रफ्तार से निकालने पर भी गुफाओं में जलस्तर एक बार भी कम नहीं हुआ था। अंतिम दिनों में जलस्तर 10 मिनट में 50 सेन्टीमीटर की दर से तेजी से बढ़ने लगा था। तब आनन-फानन में बच्चों को वहां से तैराकी द्वारा निकालने का बड़ा रिस्क लिया गया था।

तकनीक की अपनी सीमाएं होती हैं। थाईलैंड में दुनिया भर के हजारों टेक्निकल असिस्टेंट और गोताखोरों की मदद के बावजूद रेस्क्यू में 18 दिन लग गए थे (वो भी आनन-फानन में किया खतरनाक रेस्क्यू था अन्यथा कई महीने भी लग सकते थे)

ऐसा नहीं होता कि आप किसी भी गोताखोर को सैकड़ों फीट गहरी ऐसी सुरंगों में कूदने को कह दें। ऐसी सुरंगों में इंसान रास्ता भटक सकता है। ऑक्सीजन सीमित होती है। दृश्यता शून्य होती है। तीन-चार फुट चौड़ी सुरंग में जगह-जगह पत्थर निकले होते हैं। कोई पत्थर सर पर टकरा जाने से गोताखोर अचेत हो सकता है। थाईलैंड रेस्क्यू में भी एक गोताखोर ने अपनी जान गंवा दी थी। कोई भी सरकार एक जान बचाने के लिए दूसरी जान को खतरे में नहीं डालती।

इसके अलावा अगर उन मजदूरों तक पहुंच भी जाएं तो तीन फुट चौड़ी सुरंग में उन्हें ऊपर लाने के लिए कैसे कॉस्ट्यूम पहनाई जाए? कैसे यंत्र फिट किये जायें? किसी को तैरना नहीं आये तो उसे ऊपर कैसे लाया जाए। थाईलैंड में कुछ पैसेज संकरे थे पर कम से कम बच्चे जहां मौजूद थे वहां उनसे बात करने और प्रशिक्षित करने लायक स्पेस था। तीन फुट की अंधेरी, संकरी सुरंग में आप क्या-क्या कर सकते हैं?

सवाल काफी सारे हैं। नेवी, एयरफोर्स की टीम वहां हैं। उम्मीद करता हूँ कि मजदूरों के प्राण बच सकें। आपसे भी अनुरोध है कि तकनीक की सीमाओं और वस्तुस्थिति की विषमताओं को ठीक से समझकर स्थिति का मूल्यांकन करें।

मन थोड़ा व्यथित इसलिए भी हो जाता है कि कोर्ट, NGT के बार-बार कहने के बावजूद लोग क्यों अपनी जान खतरे में डाल इन सुरंगों में कूद रहे हैं? सिर्फ आजीविका इसका कारण नहीं है। दुनिया में करने के लिए बहुत कुछ है और कोई भूखे पेट नहीं मरता। वास्तव में अपेक्षाकृत अधिक दिहाड़ी इस तरह के अपराध करने के लिए मजदूरों को प्रेरित करती है। कोई भी सरकार सैकड़ों किमी क्षेत्र की निगरानी नहीं कर सकती। जान आपकी है। जिम्मेदारी आपकी भी बनती है।

चाहते हुए भी ना जाने क्यों मैं जानबूझ कर मौत के मुंह में छलांग लगाने पर तुले लोगों के लिए सहानुभूति महसूस नहीं कर पाता।

Comments

comments

loading...

LEAVE A REPLY