वामपंथी ही क्यों उठाते हैं किसानों के प्रश्न

एक युवा मित्र ने कल उपरोक्त सवाल पूछा। उत्तर मज़ेदार है।

क्योंकि वे सरकार में कभी होते नहीं। जो पक्ष सरकार में है उसे इन मुद्दों पर काम करना पड़ता है और जो पहले सरकार में था उसे अपने कार्यकाल का जवाब देना पड़ता है। वामी छोड़कर हर पक्ष को यह जवाब देना पड़ेगा अपने कार्यकाल का।

वामियों ने सरकार चलायी नहीं, वे सवाल ही उठाते हैं। बंगाल, केरल में क्या किया इसका जवाब वे देते नहीं। वहाँ के किसान को कितना सम्पन्न बनाया अपने पॉलिसीज़ से इसपर वे कभी जवाब नहीं देंगे।

अगर ये सवाल उठाए भी तो किसान आंदोलन चलाने वाले उनके संगठन सरकार चलाने वाली पार्टियों से अलग हैं, कम से कम दिखावे के लिए। इसलिए उनसे कन्नी काटना उनके लिए आसान रहता है, और बेशर्मी से तीखे सवाल को अनदेखा करना तो कम्युनिस्ट होने की पहली शर्त होती है।

उनके प्रश्न भी ऐसे होते हैं कि जिनका व्यावहारिक समाधान असंभव होता है, जो सब को संतुष्ट करें, क्योंकि मूल मांग ही अव्यवहारिक होती है। आखिर जाकर उनके हर आंदोलन की परिणति क्या होती है यह जानिए।

पहला, उद्योजक का दीर्घकालीन नुकसान होता है और अंत में वो उद्योग बंद करके चला जाता है, मजदूर बेरोज़गार होते हैं और वामी कहते हैं कि सरकार उनकी ज़िम्मेदारी उठा ले।

याने पहले जो लोग खुद कमाकर अपने परिवार का पोषण करते थे, अपनी क्रयशक्ति द्वारा अर्थव्यवस्था में योगदान देते थे, वे अब पूरे परिवार के साथ अर्थव्यवस्था पर बोझ बन जाते हैं। दो कमाने वाले हाथ अब चार खाने वाले मुंह बन जाते हैं। यह सरकार पर बोझ बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को ढहा देना भी वामियों का लक्ष्य है यह न भूला जाये।

दूसरा, किसी असंगठित क्षेत्र जैसे किसान की आवाज़ उठाने का बहाना कर के अव्यवहारिक मांगें करना, कानून और व्यवस्था का संकट पैदा करना और अंत में समाधान के रूप में सरकार को बीच में ला कर सरकार पर बोझ लादना, याने अंततोगत्वा करदाता का ही बोझ बढ़ाना या inflation कराना।

अगर आप सोचते हैं कि उनको ये सवाल पूछे जा सकते हैं, तो आप को गलतफहमी है। वामियों को बोलने के लिए मुख होता है, सवाल सुनने के लिए कान नहीं होते। उनकी चर्चा वाली मीटिंग्स की कोई सूचना सार्वजनिक नहीं होती। वे आप के लिए होती नहीं, आप वहाँ जा नहीं सकते, घुस गए तो अपने रिस्क पर।

उनकी सार्वजनिक सभायेँ केवल वक्ताओं के भाषण और आदेश सुनने के लिए होती हैं, वहाँ कोई सवाल उठा ही नहीं पाता, कोई गुंजाइश ही नहीं होती। लेकिन वे आप की सदाशयता को अपनी ढाल बनाकर आप की सभाओं में व्यत्यय या बात बिगाड़ने पहुंचेंगे। वहाँ आएंगे भी तो ऐसे लोग जो शक्ल से निरीह लगते होंगे और बेचारे सी सूरत बनाकर एक-दो सवाल की अनुमति मांगेंगे जिससे ऑडियन्स को लगेगा कि हाँ उसे बोलने देना चाहिए।

ज़हीन तो होते हैं कामरेड, लेकिन उससे ज्यादा ज़हरीले होते हैं। साँप को बख्श देना चाहिए, वो आप का नुकसान करने का इरादा नहीं रखता। और कामरेड… समझ तो गए ही होंगे!

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