मैं खुद की ब्राण्ड एम्बेसेडर हूँ


Ma Jivan Shaifaly, Making India Saptahiki Editorial, December (Fifth)


कई बार .. लगभग रोज़ ही कोई न कोई मुझसे पूछता है आप अपनी तस्वीरें रोज़ क्यों बदलती हैं? या अपनी कविताओं के साथ अपनी तस्वीर क्यों लगाती हैं… आप तो संन्यासन हैं फिर अपनी तस्वीरों से इतना मोह… अरे आप भी दुखी होती हैं, अरे आप भी उदास होती हैं… संन्यासी तो सारी मोह माया से ऊपर हो जाते हैं..

सबसे पहली बात – अब MBA तो किया नहीं है मैंने जो उनकी व्यावसायिक भाषा में समझा सकूं… फिर भी जब भी आप किसी प्रोडक्ट का प्रचार प्रसार करना चाहते हैं तो उसकी पञ्च लाइन और तस्वीर ऐसी होनी चाहिए कि किसी के सामने जब भी उसका नाम लिया जाए तो प्रोडक्ट और उसकी पञ्च लाइन तुरंत याद आ जाए… or Vice Versa

तो यहाँ पर जब भी मेकिंग इंडिया का ज़िक्र होता है तो सबसे पहले आपके दिमाग में मेरा नाम और तस्वीर बन जाती होगी… यह इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि अब यहाँ बहुत सारी websites की बाढ़ आ चुकी है और सच कहूं उनमें से अधिकतर के संस्थापक कौन है मुझे पता तक नहीं है. यही मेरे साथ न हो इसलिए इस तरीके को अपनाया है.

ताकि यदि वेबसाइट के सन्दर्भ में किसी को मुझसे बात करनी हो तो वो सीधे मुझ तक पहुँच सके. मैं अपनी वेबसाइट की खुद ही ब्राण्ड एम्बेसेडर हूँ.

दूसरी बात संन्यास लिया है तो इसलिए नहीं कि जीवन से भागकर जंगल में बैठ जाऊं… ये स्वीकार का संन्यास है… और वैसे भी जंगल में जाने वालों को संन्यास नहीं लेना पड़ता… जो जंगल में बैठे हैं हमारे लिए नैपथ्य में वही लोग काम कर रहे हैं… हम फ्रंट में दुनिया के सामने यानी सांसारिक हो कर काम कर रहे हैं…

हम वो प्रिज़्म हैं जिनके माध्यम से वो अध्यात्म की किरण गुज़रती है और हम उसे जीवन के सात रंगों में विभाजित कर लोगों को प्रकाशमान करते हैं… यहाँ ‘हम’ का तात्पर्य किन्हीं विशेष व्यक्तियों की बात नहीं कर रही, हम अर्थात हम सब…

यहाँ कोई आध्यात्मिक जगत के बाहर नहीं है, सबकी अपनी अपनी आध्यात्मिक यात्रा है और संसार में सबकी भूमिका तय है. बस सबकी ग्रहणशीलता अलग अलग है, कुछ इस किरण को ग्रहण कर अपनी गुणवत्ता में सुधार कर रहे हैं, कुछ मेरे जैसे भी हैं जो जितना आता है उसमें अपने हिस्से का भी डालकर लोगों में बाँट देते हैं… और खुद खाली हो जाते हैं…

यह कहने में भी मुझे कोई गुरेज़ नहीं कि मुझे उतना ज्ञान नहीं जितना मैं दर्शाती हूँ… लेकिन मुझे इतना पता है कि जितना मैं शब्दों में व्यक्त करती हूँ उससे कहीं अधिक लोगों तक ऊर्जा रूप में पहुँचता है… उद्देश्य ब्रह्माण्डीय ऊर्जा को लोगों तक पहुँचाना है, यहां माध्यम अलग अलग होते हैं, हम मात्र उपकरण है इस प्रयोगशाला के… जैसे भोजन को खाने के लिए आपको उसे थाली में रखना आवश्यक है आप उसे हवा से उठाकर नहीं खा सकते… इसलिए थाली के गुण भी उसमें सम्मिलित तो होंगे. यदि भोजन स्टील की थाली में परोसा जाएगा तो स्टील के गुण भोजन में आएँगे, सोने, चांदी की थाली के गुण अलग होंगे, लकड़ी या मिट्टी के बर्तन के गुण अलग होंगे…

मैं तो बस केले का एक पत्ता हूँ जंगल से तोड़ा हुआ, प्रकृति का सीधा उपकरण, इसमें किसी मानव निर्मित धातु के गुण नहीं है… लेकिन फिर भी मानव तो हूँ ही, वो भी एक स्त्री, तो मुझे स्त्री रूप में जन्म देने का भी ईश्वर का उद्देश्य रहा होगा… वरना मुझमें पुरुष चित्त के गुण अधिक है. स्त्रीयोचित वह कोमलता मुझमें उतनी नहीं है जितनी होती है. लेकिन जितनी भी है अपने पूर्ण स्वरूप में है. तो मानव शरीर में जन्म लिया है तो मानवीय भाव के साथ उसे व्यक्त करना भी अनिवार्य है, बस फर्क इतना है कि यह भाव व्यक्त करते समय आप कितने सजग रहते हैं, आपके व्यवहार को आप कितने साक्षी भाव से देखते हैं इस पर सारा कुछ निर्भर है…

हाँ मैं भी रोती हूँ, हंसती हूँ क्रोधित होती हूँ, ईर्ष्या, कुंठा, अभिमान, प्रेम सारे लक्षण (गुण अवगुण नहीं कहूंगी यह हमारी भाषा है, प्रकृति की नहीं) मुझमें भी व्यक्त होते हैं, लेकिन मैं अपने एक एक भाव को साक्षी भाव से देखती हूँ, यानी मैं अपनी फिल्म की अभिनेत्री भी हूँ और दर्शक भी. तो बात यह है कि तस्वीर लगाने से बात आप तक सम्वाद रूप में पहुँचती है जैसे हम सामने बैठकर बात कर रहे हैं. सिर्फ लिखा हुआ कई बार हम नज़र अंदाज़ कर जाते हैं, तस्वीर साथ में हो तो सामने वाला एक क्षण को रुकता अवश्य है.

तो इतनी लम्बी चटाई इसलिए बिछाई है कि भाई, मेरी तस्वीर पर ही ना अटक जाइए उद्देश्य मेरा आप तक अधिक से अधिक पठनीय सामग्री जुटाना है… तो एक बार फिर मैं “मेकिंग इंडिया साप्ताहिकी” का नया अंक लेकर आई हूँ… इसे क्लिक कीजिये, पढ़िए, आलोचना कीजिये कि हुंह क्या बकवास अंक है इस बार का… या पसंद आया तो शेयर कीजिये… नहीं आया तो सुझाव दीजिये कि मैं इसे और बेहतर तरीके से कैसे प्रस्तुत कर सकती हूँ… प्रकाशन योग्य सामग्री दीजिये…

और ये ना पूछियेगा कि क्यों करें हम ऐसा… वो इसलिए कि मैं जानती हूँ आप सब लोग मुझसे बहुत प्रेम करते हैं… उतना ही जितना मैं… कुछ लोग व्यक्त कर देते हैं कुछ लोग छुपा जाते हैं… लेकिन प्रेम तो प्रेम है… वो कहाँ किसी आवरण में छुपता है… लीजिये तेरा तझको अर्पण इस बार का लिंक – www.makingindia.co

माँ जीवन शैफाली

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