एक कमीनी पटकथा

सवाल पूछे जाएंगे कि सोहराबुद्दीन शेख को किसने मारा?

मुझे उनका नाम पता मालूम नहीं, लेकिन मेरी जांच इतना बताती है कि उसे जन्नत भेजने वाले बेहद आला दर्जे के कमीने हैं।

उन्होंने एक पटकथा लिखी… पहले इसे मारेंगे, फिर हल्ला मचाएंगे, फिर जांच कराएंगे और अंत में फलां को फंसाएंगे।

ठसक नहीं गया हूं मैं। मेरे बारे में राय बनाने से पहले विशेष सीबीआई अदालत के जज ने फैसले में क्या कहा है, उसे पढ़ लें । ज्यों का त्यों प्रस्तुत है :

“मेरे समक्ष पेश किए गए तमाम सबूतों और गवाहों के बयानों पर करीब से विचार करते हुए मुझे यह कहने में कोई हिचक नहीं है कि सीबीआई जैसी शीर्ष जांच एजेंसी के पास एक पूर्व निर्धारित थ्योरी और पटकथा थी जिसका मकसद राजनीतिक नेताओं को फंसाना था। जांच के दौरान सीबीआई ने सच्चाई को सामने लाने के बजाय कुछ और चीज़ पर काम किया।

यह स्पष्ट रूप से ज़ाहिर है कि सीबीआई सच्चाई का पता लगाने के बजाय पहले से सोचे समझे गए एक खास और पहले से तय चीज़ को स्थापित करने के लिए कहीं अधिक व्याकुल थी।

सीबीआई ने कानून के अनुसार जांच करने के बजाय अपने ‘लक्ष्य’ पर पहुंचने के लिए काम किया। पूरी जांच का मकसद उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए एक पटकथा पर काम करना था।

राजनीतिक नेताओं को फंसाने की प्रक्रिया में सीबीआई ने सबूत गढ़े और आरोप-पत्र में गवाहों के बयान डाले। इस तरह सीबीआई ने उन पुलिसकर्मियों को फंसाया जिन्हें किसी साज़िश के बारे में कोई जानकारी नहीं थी।”

सोहराबुद्दीन के कथित फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने का मामला 2005 से चल रहा है। हल्ला ब्रिगेड की ताकत देखिए।

2010 में सुप्रीम कोर्ट ने मामले की सीबीआई जांच का आदेश दिया। त्याग की इतालवी देवी और रेनकोट पहन कर नहाने वाले डॉक्टर साहब के प्रोत्साहन से सीबीआई ने एक धमाकेदार खोज की… अमित शाह फिरौती वसूलने वाले गिरोह के सरगना थे। उनके रहते न्याय नहीं मिल पाएगा।

सो मामला गुजरात से मुंबई ट्रांसफर हो गया। गुजरात के गृह मंत्री पर अपने प्रदेश में घुसने पर ही रोक लगी, सो अलग।

समूचे प्रकरण से दो बातें साबित हो जाती हैं। पहली कि मोदी-शाह कितनी भी मेहनत कर लें, हाई-वे और वाटर-वे बना लें, लेकिन कमीनेपन में परिवार से कई प्रकाशवर्ष पीछे हैं।

परिवार के पास सुपारी लेकर काम करने वालों का एक सुसंगठित गिरोह हर जगह तैयार है। चाहे वो कचहरी हो, पुलिस हो, प्रशासन हो, सीबीआई हो, मीडिया या विश्वविद्यालय हो।

अमित शाह गुजरात बदर हुए और और कई पुलिस अफसरों ने जेल काटी। दूसरी ओर चिदंबरम के खिलाफ भ्रष्टाचार के ठोस मामले हैं लेकिन उसकी गिरफ्तारी पर रोक की अवधि बढ़ती ही जाती है।

दूसरा, यह कि अगर मोदी सत्ता में नहीं आते तो अब तक मोदी और शाह शायद सलाखों के पीछे भी भेज दिए जाते। सोहराबुद्दीन और इशरत जहां के बहाने। ‘भगवा आतंक’ की लपटें भागवत जी को भी लपेटे में लेने वाली थीं।

न्याय तो हो गया। ये न सोच लेना कि कोर्ट ने भिगो कर जूता मारा। ये जूता-वूता जैसे शब्द उनके लिए हैं जिनमें कोई लाज शर्म बाकी हो।

उनके भांड़ नगाड़ाकारों ने अब ठीकरा पुलिस और जज पर फोड़ दिया है। कहना शुरू कर दिया है कि यह क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की नाकामी है। लेकिन यह क्रिमिनल जस्टिस सिस्टम की विफलता नहीं इतालवी माफिया की सफलता है।

उनकी कठपुतलियों का कमाल है कि लश्कर की एक आत्मघाती हमलावर को ठोके जाने को वे मानवाधिकार का मुद्दा बना देते हैं और मोदी की गर्दन तक पहुंचने की कोशिश में सीबीआई के अफसर आईबी के अफसरों को जेल भेज देते हैं।

यह देखकर किसी फिल्म के विलेन का वह डायलॉग याद आता है जिसमें वह कहता है : मेरे जितना कमीनापन कहां से लाओगे?

हम इतना कमीना बनने के इच्छुक नहीं हैं। लेकिन इतना तो कर ही सकते हैं कि 2019 में मोदी को फिर से जिताकर लाएं, ताकि कम से कम ‘लूटो खाओ और टुकड़े करो’ ब्रिगेड के कुछ सरदार तो जेल भेजे जा सकें।

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